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धर्म बड़ा या कर्म? वेदों, पुराणों और गीता के आलोक में सनातन सत्य! 🚩✨
आज के समय में अक्सर यह वैचारिक बहस छिड़ती है कि मनुष्य के लिए 'कर्म' बड़ा है या 'धर्म'? जब हम समस्त सनातन शास्त्रों—वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता—का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं, तो यह अकाट्य सत्य सामने आता है कि कर्म अपनी जगह आवश्यक है, किंतु 'धर्म-युक्त कर्म' ही सर्वोपरि और श्रेष्ठ है।
यदि कर्म से धर्म को अलग कर दिया जाए, तो वह कर्म मात्र एक यांत्रिक क्रिया बनकर रह जाता है, जो अंततः विनाश, अधर्म और अहंकार का मार्ग प्रशस्त करता है। आइए शास्त्रों के साक्ष्यों के आधार पर इस तात्विक सत्य को समझें:
* कर्म की तटस्थ प्रकृति: 'कर्म' का अर्थ है कोई भी भौतिक क्रिया या कार्य करना। संसार का प्रत्येक प्राणी कर्म करने के लिए विवश है। परंतु केवल कर्म करना ही श्रेष्ठ नहीं है, क्योंकि एक चोर भी चोरी करने का 'कर्म' करता है और अपराधी भी हिंसा का 'कर्म' करता है। कर्म अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं होता, उसे सही दिशा 'धर्म' देता है।
* धर्म की नियंता शक्ति: संस्कृत के 'धृ' धातु से बने 'धर्म' शब्द का अर्थ है—"जो धारण करे और कल्याण करे।" धर्म वह नैतिक, सत्य, न्याय और कर्तव्य की धुरी है जो यह तय करती है कि मनुष्य का कर्म समाज के लिए हितकारी है या विध्वंसकारी।
* जब कर्म से धर्म छूट जाता है (पौराणिक उदाहरण): त्रेता और द्वापर युग के इतिहास इसके साक्षी हैं। रावण के पास वेदों का ज्ञान और अपार पराक्रम था, तथा दुर्योधन के पास भी असीम क्षमता थी—वे दोनों महान कर्मवीर थे। परंतु चूँकि उनके उन कर्मों से 'धर्म' का साथ छूट गया था (उन्होंने अहंकार और अन्याय को चुन लिया था), इसलिए उनके वे बड़े-बड़े कर्म भी उनके संपूर्ण विनाश का कारण बने।
* श्रीमद्भागवत गीता का शाश्वत संदेश: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध भूमि में केवल अंधाधुंध कर्म करने का उपदेश नहीं देते, बल्कि वे 'स्वधर्म' के अंतर्गत कर्म करने पर बल देते हैं। गीता सिखाती है कि कर्म वही सार्थक और मोक्षदायी है जो सत्य और धर्म की मर्यादा में बंधा हो।
कर्म यदि शरीर है, तो धर्म उसकी आत्मा है। बिना आत्मा के शरीर केवल एक निष्प्राण ढांचा है, ठीक वैसे ही बिना धर्म के किया गया कर्म समाज और व्यक्ति दोनों के लिए घातक होता है। इसलिए जीवन में हमेशा धर्म के अनुशासन में रहकर ही कर्म करना चाहिए।
श्रीमते नारायणाय नमः 🙏