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#मां दुर्गा
सनातन परंपरा में माँ दुर्गा को आदिशक्ति, जगतजननी और समस्त सृष्टि की मूल शक्ति माना जाता है। वे वही दिव्य शक्ति हैं जो सृष्टि की रक्षा करती हैं, भक्तों पर करुणा बरसाती हैं और जब अधर्म अपनी सीमा पार कर जाता है, तब प्रचंड रूप धारण करके उसका अंत करती हैं। माँ दुर्गा की महिमा अनंत है, लेकिन उनकी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में महिषासुरमर्दिनी की कथा विशेष रूप से पूजनीय है। यह केवल एक देवी और असुर के बीच हुए युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि अहंकार और धर्म, अत्याचार और न्याय तथा अंधकार और प्रकाश के बीच हुए उस सनातन संघर्ष की कथा है, जिसमें अंततः सत्य की विजय होती है।
बहुत प्राचीन समय की बात है। रंभासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर था, जिसके वंश में महिषासुर का जन्म हुआ। महिषासुर जन्म से ही अत्यंत बलवान था, लेकिन उसके मन में शक्ति से भी बड़ी इच्छा थी—अजेय बनने की इच्छा। वह चाहता था कि तीनों लोकों में कोई भी उसका सामना करने का साहस न कर सके। इसी उद्देश्य से उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या आरंभ कर दी। वर्षों तक वह तप करता रहा। उसकी तपस्या इतनी कठिन थी कि तीनों लोकों में उसकी चर्चा होने लगी। अंततः भगवान ब्रह्मा उसके सामने प्रकट हुए और बोले, “महिषासुर, तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूं। वर मांगो।” महिषासुर ने तुरंत अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने समझाया कि जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है और अमरता का वरदान नहीं दिया जा सकता। तब महिषासुर ने चतुराई से ऐसा वरदान मांगा कि किसी देवता, दानव या पुरुष के हाथों उसकी मृत्यु न हो। यदि उसका अंत हो तो केवल किसी स्त्री के हाथों हो। महिषासुर को विश्वास था कि संसार में कोई स्त्री इतनी शक्तिशाली नहीं होगी जो उसे युद्ध में पराजित कर सके।
वरदान प्राप्त होते ही महिषासुर के भीतर का अहंकार और अधिक बढ़ गया। उसे लगा कि अब उसे कोई पराजित नहीं कर सकता। उसने एक विशाल असुर सेना तैयार की और पृथ्वी तथा पाताल लोक पर अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी दृष्टि स्वर्गलोक पर जा पहुंची। उसने देवराज इंद्र और अन्य देवताओं को चुनौती दी। देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन महिषासुर को मिले वरदान के कारण देवता उसे पराजित नहीं कर सके। अंततः महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को वहां से बाहर कर दिया। देवराज इंद्र सहित अनेक देवता अपना अधिकार और सम्मान खोकर भटकने लगे। चारों ओर महिषासुर के अत्याचार की चर्चा होने लगी। ऋषि-मुनि भयभीत हो गए, यज्ञ बाधित होने लगे और धर्म का प्रकाश कमजोर पड़ने लगा।
पराजित देवता एकत्र होकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। उन्होंने अपनी पीड़ा बताई और फिर ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु तथा भगवान शिव की शरण में गए। देवताओं ने कहा, “प्रभु, महिषासुर के अत्याचार ने तीनों लोकों का संतुलन बिगाड़ दिया है। हम उसके सामने असहाय हैं। हमारी रक्षा कीजिए और धर्म की पुनः स्थापना कीजिए।” महिषासुर के अत्याचारों का वर्णन सुनकर भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्मा जी के भीतर प्रचंड दिव्य तेज प्रकट हुआ। देवताओं का क्रोध भी उसी दिव्य ऊर्जा में बदलने लगा। देखते ही देखते ब्रह्मांड में असंख्य प्रकाश पुंज एक स्थान पर एकत्र होने लगे। वह प्रकाश इतना प्रचंड था कि देवता भी उसकी चमक के सामने अपनी आंखें नहीं खोल पा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे स्वयं सृष्टि की समस्त शक्ति एक नए स्वरूप को जन्म देने के लिए एकत्र हो रही हो।
उस दिव्य प्रकाश से धीरे-धीरे एक अद्भुत नारी स्वरूप प्रकट हुआ। उनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान था, लेकिन उनके मुख पर करुणा और मातृत्व की शांति भी थी। उनके दर्शन मात्र से देवताओं के भीतर आशा जाग उठी। यही थीं माँ दुर्गा, आदिशक्ति, जगदंबा और समस्त देव शक्तियों का दिव्य स्वरूप। उनके प्रकट होते ही वातावरण में एक अलौकिक कंपन फैल गया। देवताओं को समझ आ गया कि जिस शक्ति की उन्हें आवश्यकता थी, वह स्वयं उनके सामने प्रकट हो चुकी है। माँ दुर्गा केवल किसी एक देवता की शक्ति नहीं थीं, बल्कि सभी दिव्य शक्तियों का समन्वित स्वरूप थीं।
माँ को युद्ध के लिए तैयार करने के लिए देवताओं ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र अर्पित किए। भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल प्रदान किया, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र दिया, वरुण देव ने शंख दिया, अग्निदेव ने दिव्य शक्ति प्रदान की, वायु देव ने धनुष और बाण दिए, देवराज इंद्र ने वज्र अर्पित किया और अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने दिव्य अस्त्र तथा आभूषण माँ के चरणों में समर्पित किए। पर्वतराज हिमालय ने माँ को एक शक्तिशाली सिंह वाहन के रूप में प्रदान किया। देखते ही देखते माँ दुर्गा दिव्य अस्त्रों से सुसज्जित होकर सिंह पर आरूढ़ हो गईं। उनका स्वरूप इतना तेजस्वी था कि तीनों लोकों में आशा की नई किरण फैल गई।
माँ दुर्गा ने जब पहली बार सिंह पर बैठकर प्रचंड गर्जना की, तो उसकी गूंज तीनों लोकों में फैल गई। धरती कांप उठी, पर्वतों में कंपन होने लगा और समुद्र की लहरें उफान मारने लगीं। महिषासुर ने जब उस दिव्य गर्जना को सुना तो वह समझ गया कि कोई नई शक्ति उसके सामने चुनौती बनकर खड़ी हो गई है। उसने अपनी विशाल सेना को आदेश दिया कि उस देवी को तुरंत पराजित करके उसके सामने लाया जाए। असुर सेनापति चिक्षुर, चामर, बाष्कल और अनेक शक्तिशाली योद्धा अपनी विशाल सेना लेकर रणभूमि में पहुंच गए।
रणभूमि में माँ दुर्गा शांत खड़ी थीं। उनके चेहरे पर भय का कोई चिन्ह नहीं था। असुरों ने चारों ओर से आक्रमण किया, लेकिन माँ ने अपने दिव्य अस्त्रों से उनके हर आक्रमण को विफल कर दिया। माँ के सिंह ने भी असुर सेना के बीच ऐसी गर्जना की कि बड़े-बड़े योद्धाओं के मन में भय उत्पन्न होने लगा। युद्ध धीरे-धीरे इतना भयंकर हो गया कि रणभूमि असुरों के लिए विनाश का मैदान बन गई। माँ दुर्गा ने अपनी दिव्य शक्ति से असंख्य असुरों को परास्त किया और उनकी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
जब महिषासुर ने अपनी विशाल सेना को पराजित होते देखा तो उसका अहंकार क्रोध में बदल गया। उसने स्वयं रणभूमि में उतरने का निर्णय लिया। महिषासुर ने माँ को देखकर उनका उपहास किया और कहा, “तुम एक स्त्री होकर मेरे सामने युद्ध करने आई हो? क्या तुम्हें अपनी शक्ति का अहंकार है?” माँ दुर्गा ने शांत स्वर में कहा, “अहंकार शक्ति का प्रमाण नहीं होता। शक्ति का उद्देश्य धर्म की रक्षा करना है। तुम्हारे अत्याचारों का अंत अब निश्चित है।” यह सुनकर महिषासुर क्रोधित हो उठा और उसने अपना भैंसे का विशाल रूप धारण कर लिया।
महिषासुर अपने विशाल शरीर से धरती को रौंदता हुआ आगे बढ़ा। उसकी गर्जना से वातावरण कांपने लगा। उसने अपने सींगों से पर्वतों को हिलाने का प्रयास किया और अपनी पूंछ के प्रहार से चारों ओर धूल का तूफान उठा दिया। माँ दुर्गा ने बिना विचलित हुए उसका सामना किया। महिषासुर कभी भैंसे का रूप धारण करता, कभी सिंह बन जाता, कभी हाथी और कभी एक विशाल योद्धा का स्वरूप ले लेता। हर बार वह अपनी माया से माँ को भ्रमित करने का प्रयास करता, लेकिन आदिशक्ति उसकी प्रत्येक चाल को समझ रही थीं।
एक समय महिषासुर ने विशाल हाथी का रूप धारण किया और माँ के सिंह पर आक्रमण कर दिया। माँ ने अपने दिव्य अस्त्र से उसका सामना किया। महिषासुर फिर अपने भैंसे के रूप में लौट आया और अत्यंत क्रोध में रणभूमि को रौंदने लगा। माँ दुर्गा ने उसे चुनौती देते हुए कहा, “महिषासुर, तुम्हारा बल चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अधर्म के साथ खड़ा बल कभी स्थायी नहीं होता।” यह सुनकर महिषासुर और भी क्रोधित हो गया। वह पूरी शक्ति से माँ की ओर दौड़ा।
तभी माँ दुर्गा ने एक छलांग लगाई और महिषासुर के विशाल भैंसे वाले रूप को अपने चरणों के नीचे दबा दिया। महिषासुर अपने वास्तविक असुर स्वरूप में बाहर निकलने का प्रयास करने लगा। उसी क्षण माँ ने उसे अपने दिव्य त्रिशूल से परास्त किया और धर्म के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक बन चुके उस अहंकारी असुर का अंत कर दिया। महिषासुर के पतन के साथ ही तीनों लोकों में छाया भय समाप्त हो गया। देवताओं ने आकाश से पुष्पों की वर्षा की और ऋषि-मुनियों ने माँ की स्तुति की। स्वर्ग में फिर से धर्म का प्रकाश स्थापित हुआ और देवताओं ने अपने स्थान वापस प्राप्त किए।
देवताओं ने माँ दुर्गा के सामने हाथ जोड़कर कहा, “हे जगदंबे, आपने हमारे जीवन और धर्म की रक्षा की है। हम आपका यह उपकार कभी नहीं भूल सकते।” माँ ने मुस्कुराकर कहा, “मैं किसी एक युग या किसी एक लोक की माता नहीं हूं। जब-जब मेरे भक्त संकट में होंगे, जब-जब धर्म कमजोर होगा और जब-जब अधर्म अपनी सीमा पार करेगा, तब-तब मेरी शक्ति किसी न किसी रूप में प्रकट होगी। जो मुझे सच्चे मन से स्मरण करेगा, उसके हृदय में साहस का प्रकाश जागेगा।”
महिषासुर के वध के बाद माँ दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी के नाम से जाना जाने लगा। उनकी यह कथा केवल प्राचीन युद्ध की स्मृति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्ष का भी प्रतीक मानी जाती है। महिषासुर हमारे भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और अन्याय का प्रतीक है, जबकि माँ दुर्गा हमारे भीतर मौजूद साहस, विवेक, करुणा और धर्म की शक्ति का प्रतीक हैं। जब मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर विजय पाने का संकल्प करता है, तब वही आदिशक्ति उसके भीतर साहस बनकर जागृत होती है।
माँ दुर्गा का स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि करुणा और शक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक माता अपने बच्चों के लिए जितनी करुणामयी होती है, आवश्यकता पड़ने पर उनकी रक्षा के लिए उतनी ही प्रचंड भी हो सकती है। इसी कारण माँ दुर्गा को एक ओर जगतजननी और दूसरी ओर महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है। उनके हाथों में अस्त्र हैं, लेकिन उनके हृदय में करुणा है। उनके चेहरे पर तेज है, लेकिन भक्तों के लिए उनके हृदय में ममता है।
समय बीतता गया, युग बदलते गए, लेकिन माँ दुर्गा की यह दिव्य कथा आज भी लोगों के हृदय में विश्वास जगाती है। जब भी मनुष्य भय, निराशा या कठिनाई से घिरता है, वह माँ को स्मरण करता है और अपने भीतर एक नई शक्ति का अनुभव करता है। नवरात्रि के दिनों में जब भक्त माँ के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं, तो उसके पीछे यही भावना होती है कि जीवन के हर अंधकार पर शक्ति, सत्य और धर्म का प्रकाश विजय प्राप्त करे।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अधर्म चाहे कुछ समय के लिए कितना ही शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, उसका अंत निश्चित है। अहंकार चाहे कितनी भी बड़ी शक्ति प्राप्त कर ले, वह सत्य से बड़ा नहीं हो सकता। अन्याय चाहे कितना भी फैल जाए, धर्म की एक छोटी-सी ज्योति भी उसे चुनौती देने की क्षमता रखती है। माँ दुर्गा उसी शाश्वत शक्ति का प्रतीक हैं जो संसार को यह विश्वास दिलाती है कि अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य आता है और सत्य की विजय अंततः निश्चित होती है।
इसलिए जब भी जीवन में कठिन समय आए, केवल भय को मत देखिए, अपने भीतर मौजूद साहस को पहचानिए। माँ दुर्गा की कथा हमें याद दिलाती है कि शक्ति बाहर से आने वाली कोई दूर की वस्तु नहीं, बल्कि सत्य, करुणा, आत्मविश्वास और धर्म के रूप में हमारे भीतर भी विद्यमान है। यही आदिशक्ति का संदेश है, यही महिषासुरमर्दिनी की अमर गाथा है और यही सनातन सत्य है कि जब धर्म की रक्षा के लिए शक्ति उठती है, तो बड़े से बड़ा अहंकार भी उसके सामने टिक नहीं सकता। जय माता दी।