@Nikesh Singh
यह चित्र भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य (जन्म) की पौराणिक कथा को दर्शाता है, जब वे मथुरा के कारागार में माता देवकी और पिता वसुदेव के सामने अपने चतुर्भुज विष्णु रूप में प्रकट हुए थे।📜 पौराणिक कथा का सारांशकंस का अत्याचार: मथुरा का राजा कंस अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को एक आकाशवाणी के कारण जेल में बंद कर देता है। आकाशवाणी के अनुसार देवकी की आठवीं संतान कंस का वध करेगी। कंस देवकी के पहले छह बच्चों को बेरहमी से मार देता है। सातवें गर्भ में शेषनाग (बलरामजी) आते हैं, जिन्हें योगमाया द्वारा रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया जाता है।भगवान का प्राकट्य: भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात के समय, रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु स्वयं देवकी के आठवें पुत्र के रूप में प्रकट होते हैं।चतुर्भुज रूप के दर्शन: जन्म लेते ही शिशु रूप में आने के बजाय, भगवान अपने दिव्य चतुर्भुज रूप (चार भुजाओं वाले रूप) में प्रकट होते हैं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) होते हैं, और वे दिव्य आभूषणों तथा मुकुट से सुशोभित होते हैं।माता-पिता की प्रार्थना: जेल की कोठरी में भगवान के इस अलौकिक और प्रकाशमान रूप को देखकर देवकी और वसुदेव भाव-विभोर हो जाते हैं और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करते हैं।शिशु रूप और गोकुल प्रस्थान: देवकी और वसुदेव की प्रार्थना पर, भगवान कंस के भय को दूर करने के लिए एक सामान्य नवजात शिशु का रूप ले लेते हैं। इसके बाद, भगवान की माया से जेल के पहरेदार सो जाते हैं, बेड़ियां खुल जाती हैं और वसुदेव जी शिशु कृष्ण को सूप में रखकर, उफनती यमुना नदी को पार कर गोकुल में नंदबाबा के घर छोड़ आते हैं।
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