My Bite
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"वन्दन"
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मन करता है अपना भी प्रभु,
तुम्हरे चरणं में वंदन कर दूँ।
तुम अधिश्वर आत्मस्वरूप का,
आज मै भी अभिनन्दन कर दूँ।
प्राणवल्लभ तुम प्रेमी जनजन के,
तुम्हे अपने अश्रु से तर्पण कर दूँ।
कोमल हृदय के अंकुरित पुष्प भी,
प्रभु आज मै तुमको अर्पण कर दूँ
जगत रचयिता तुम पालनहार को,
अपना कुछ सरल प्रेम भी धर दूँ।
ब्रह्माण्ड नायक भाग्यविधाता को,
अपना सबकुछ समर्पण मै कर दूँ।
भावविभोर हे भक्तवत्सल प्रभु,
प्रफुल्लित मन का चन्दन कर दूँ।
अद्भुत संयोग से जो मिलते हो तुम,
आज भक्तिमय मैे कणकण कर दूँ।।1।।
आधारभूत हो तुम जनजन के,
तुम जगत संचालन करते हो।
डूबते हुए इस जगत मझदार से,
तुम ही बेड़ा पार भी करते हो।
जग वैभव हो जिसके अन्तः में,
चीत में सबके भी बसते हो।
प्रेम भावनाओं को प्रवाहित करते,
तुम प्रेम स्वभाव ही रहते हो।
भक्तवत्सल भक्तों के हो तुम,
सबको उपकृत करते हो।
स्नेह बरसाते बिन भेदभाव के,
फिर भी कुछ नही कहते हो।
प्रेमिवत्सल करुणा के सागर,
कणकण में ही तुम बसते हो।
हमने सुना है प्रभु तुम भी,
हरदम प्रेमविह्वल हो रहते हो।।2।।
देखा जब जनजन को मैन,
कुछ आभाष नही होता है।
और ज्ञात नही हमको प्रभु,
ये भाव भक्ति क्या होता है।
अतृप्त इच्छाओं के सनिध्य हो,
अपना अंतरमन भी खोता है।
तुम तो जानते ही हो प्रभु कि,
ये मन कितना चंचल होता है।
असामान्य इस जीवन में,
जनमानस विह्वल होता है।
संकुचित स्वभाव के अधीन हो
बस अपने से वंचित होता है।
छनिक उद्वेग हृदय वेग से,
मनुष्य ये भ्रमित होता है।
अब तुम्हे बताना क्या प्रभु,
सुलभ प्रेम न संचित होता है।।3।।
कुछ ज्ञान नही हमे बोध नही,
बोलो कैसे मै सुरुआत करूँ।
अनन्त सिंधु के बाँहों में,
कैसे शुक्ष्म सरिता का प्रवाह करूँ।
विवेकहीन ही हूँ मै इस जग में,
बुद्धिमत से कैसे तब बात करूँ।
अयोग्य होकर समक्ष तुम्हारे,
योग्य बन कैसे तब साथ करूँ।
अंतरात्मा के बोझ तले हो,
क्या-क्या अब विवाद करूँ।
कही वैरी ही न बन जाऊँ मै,
अब क्या-क्या मैं अपवाद करूँ।
मन कलुषित ये तन कलुषित,
बोलो कैसे तुम्हरे मै पास रहूँ।
जानबूझकर अंजान बनकर,
बोलो कैसे मै ये अपराध करूँ।।4।।
पर दूर नही रह सकता तुमसे,
बस मन से ही साथ मै रहता हूँ।
जप तप नही कर पाता कभी,
मै बस राम-राम ही कहता हूँ।
जीवन के इस पल-पल में से,
कुछ पल तुम्हारा ले लेेता हूँ।
बालक बन पितृ जान तुम्हे,
कुछ पुत्र भाव तुम्हे दे देता हूँ।
सोंचता हूँ इस सम्बन्ध प्रेम से,
कुछ पास तुम्हारे रह लेता हूँ।
अबोध जनों पर क्रोध न करते,
ये सोंच ही धृष्टता कर देता हूँ।
प्रेम तुम्हारा हरजन से है,
बिन मोलभाव बिन मापतौल,
बस यही जान हे करुणानिधान,
कुछ ऐसे अशिष्टता कर लेता हूँ।।5।।
प्रभु विनय भाव विनती है तुमसे,
कभी स्नेह से न विसराणा तुम।
दण्डित करना भले ही जितना,
पर हमपे विरल प्रित बरसाना तुम।
सम्बन्ध बना रहे ये तुमसे,
स्वामी-भक्त या पिता-पुत्र सा,
पर दीन-हीन पर कुपित होकर,
कभी दूर नही हो जाना तुम।
उदंड समझ ही भाग्यहीन,
या कर्महीन ही बना देना तुम।
पर कभी भी आवेश वश ही,
कभी भक्ति से न विचलाना तुम।
इस कुंठित मन के अनुबंध में भी,
कुछ सरस आस बढ़ाना तुम।
उचित-अनुचित का भाण न करना,
बस पुलकित प्रेम छलकाना तुम।।6।।
मै तुम्हरा तुम हो मेरे,
हृदय तुमपे विस्वास करे।
श्यामल तरुण श्याम प्रभु,
ये हृदय तुम्ही में वास करे।
गलत सही का मान छोर के,
ये जीवन ही तुम्हरे नाम करे।
भावनावों के संगम में बह,
बस तुमसे ही मन अनुराग करे।
राग विराग को पीछे करके,
ये मन प्रभु तुम्हरे पास रहे।
प्रेम-पूजा के माध्यम से ही,
हम तुम्हरा ही गुणगान करे।
अधरों से लेकर अंधियारों तक,
ये मनुज तुम्हे ही सन्धान करे।
जितना जनता हूँ अपने आप को,
बस उतने से ही तुम्हे प्रणाम करे।।7।।
मन करता है अपना भी प्रभु,
तुम्हरे चरणं में वंदन कर दूँ।
तुम अधिश्वर आत्मस्वरूप का,
आज मै भी अभिनन्दन कर दूँ।
प्राणवल्लभ तुम भक्तवत्सल प्रभु,
आज तुम्हरा मै अभिनन्दन कर दूँ।।💖🧞
......✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🚩
🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳
#🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान #❤️ आई लव यू #🙏🏻माँ तुझे सलाम #📿संतवाणी 🗣️ #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
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