sn vyas
_कहेहु तात अस मोर प्रनामा।_
_सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।_
_दीन दयाल बिरिदु संभारी।_
हरहु नाथ मम संकट भार।।
*( सुंदरकांड 26/2 )*
हनुमान जी ने लंका जलाकर अपनी पूँछ बुझाई है और सीता माँ के सम्मुख उपस्थित हुए हैं, निशानी माँगी है, माँ चूड़ामणि देतीं हैं और कहती हैं कि हनुमान! राम जी से मेरा प्रणाम कर कहना कि आप पूर्णकाम हैं, दीनों पर दया करना आपका विरद है, उस विरद को याद कर मुझ दीन पर पड़े भारी संकट को दूर कीजिए।
मित्रों ! दीन दुखियों के संकट दूर करना राम जी का गुण है । ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने दुःख की बात उन तक पहुँचा पाएँ । वही अपनी बात राम जी तक पहुँचा सकता है जिसके जीवन में हनुमान जी हो , हनुमान जी उसी के पास जाते हैं जो राम राम रटता है । अतः राम रटें और अपनी बात हनुमान जी के माध्यम से राम जी तक पहुंचाएं और बड़े बड़े संकट से निजात पाएँ । अथ ! जय जय राम , जय जय हनुमान🚩
आध्यात्मिक ज्ञान
## सुंदरकांड