sn vyas
👩❤️👩_*इतने सुन्दर मुख पर दुःख की यह कालिमा क्यों छायी हुई है? वसुदेव ने गवाक्ष पर खड़ी देवकी के एक कन्धे पर हाथ रखके पूछा।*_👩❤️👩
🤱यह कालिमा आप पुरषों की देन है! देवकी उनकी ओर देखे बिना बोलीं।🤱
🤹प्रथम तो वसुदेव को लगा कि देवकी कदाचित् हास्य कर रही है। परन्तु जब उन्होंने ध्यान दिया कि उसके स्वर में भी उतना ही दुःख है, तो वे किंचित् आश्चर्यचकित हुए, "क्या हुआ? तुम ऐसे क्यों कह रही हो?"🤹
🤱"तो कैसे कहूँ!" देवकी की वाणी में अब किंचित् आवेश और व्यंग्य का मिश्रण प्रकट हुआ, "एक पुरुष हैं—हमारे भ्राताश्री! वे हमारे विवाह के ही दिन सबके सम्मुख मुझ पर खड्ग उठा लेते हैं, केवल इसलिए कि किसी ने यह भविष्यवाणी कर दी कि हमारी आठवीं सन्तान ही उनकी मृत्यु का कारण बनेगी। जिस सम्भावित संकट के प्रस्तुत होने में अभी पर्याप्त समय शेष है, उसे लेकर ऐसा करना कहाँ से न्याय है! यदि सात सन्तान के जन्म ले लेने के बाद ऐसा कुछ किया जाता, तो समझ में भी आता; किन्तु अभी से ही हमें नगरबन्दी बना दिया गया है! अपने घर और पूरे मथुरा में कहीं भी आ-जा सकते हैं, परन्तु बाहर नहीं। और यहाँ भी तो चारों ओर पहरे बिठा दिये गये हैं।" उन्होंने कुछ क्षण रूककर पुनः कहा, "और एक पुरुष हैं—आप! आप उन्हें वचन दे देते हैं कि प्रत्येक सन्तान के जन्म लेते ही उसे उनके सम्मुख प्रस्तुत कर देंगे। किस लिए, उसे मृत्यु दिलाने के लिए ही न! क्या आपको मेरी, एक स्त्री एक माता की ममता का तनिक भी ध्यान नहीं रहा था; अथवा आप उनसे भयभीत हो गये थे??"🤱
🤹वसुदेव नितान्त आश्चर्यचकित रह गये। उनके नेत्र चौड़े हो गये; उनका मुख खुला का खुला रह गया। जब वे कुछ क्षणों तक कुछ नहीं बोले, तदनन्तर देवकी ने उनकी ओर पलटकर उनके नेत्रों में झाँकते हुए पूछा, "अब आप कुछ कहते क्यों नहीं हैं?"🤹
🤱"मुझे लगता था कि विवाह के पश्चात् पत्नी और पति एक ही पक्ष होते हैं। उनमें कोई भिन्नता नहीं होती है।" वसुदेव बोल तो रहे थे किन्तु मन्द स्वर में, "यदि तुमने मुझे द्वितीय या अपना विरोधी पक्ष माना होता, तो मुझे कदाचित् कोई अन्तर नहीं पड़ता। परन्तु तुम मुझे कंस जैसे अत्याचारी राजा की श्रेणी में देखती हो, यह सुनकर मेरे हृदय को अपार पीड़ा पहुंची है! देवकी, मुझे तुमसे इसकी तनिक भी आशा नहीं थी!" 🤱
🤱देवकी के मुख पर पश्चाताप की एक हल्की रेखा खींच गयी। उन्हें अनुभव हुआ कि वसुदेव सत्य ही कह रहे हैं। वे तो स्त्री-पुरुष करके अपना दुःख प्रकट कर रही थीं, किन्तु ऐसा करते-करते उनसे एक बड़ी भूल हो गयी। परन्तु जब वे कुछ क्षणों तक मौन ही रहीं, तो वसुदेव उनकी भावना को समझ गये। बहुत स्नेह से उनका एक हाथ पकड़कर बोले, "चलो, हम बैठकर वार्तालाप करते हैं।" वे दोनों पर्यंक पर बैठ जाते हैं। 🤱
🤹तत्पश्चात् वसुदेव स्नेहपूर्ण वाणी में समझाने लगे, "देवकी, पक्ष केवल धर्म-अधर्म, उचित- अनुचित अथवा सत्य-असत्य का होता है। हम जो कुछ भी धर्म अथवा अधर्म करते हैं, उसके लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होते हैं। न कि किसी समूह, समाज आदि के आधार पर। संसार में घटित किसी भी घटना या किसी भी बात के लिए हम पूरे पुरुष अथवा स्त्री समूह को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं। और कोई एक भी ऐसा गुण नहीं है जो केवल पुरुषों अथवा स्त्रियों में पाया जाता हो। ऐसा ही अवगुणों के साथ भी है। अंगों की बनावट, प्रसव करने न करने रुपी जो एकाध अन्तर होते हैं; वे प्रकृति या ईश्वर की देन होते हैं। न कि स्वयं किसी स्त्री अथवा पुरुष के द्वारा उत्पन्न, अर्जित किये गये गुण होते हैं।" वसुदेव ने कुछ घड़ी मौन होकर पूछा, "और तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि हमारी भावी सन्तानों के प्रति केवल तुम्हें ही ममता है? क्या एक पिता के रूप में मुझ पुरुष के हृदय में उनसे कोई प्रेम नहीं है?"🤹
🤱तो आपने वह वचन क्यों दिया?🤱
🤹उसे वचन देना नहीं कहते हैं, देवकी! किसी के वक्ष पर खड्ग रखकर बलात् वचन नहीं लिया जाता है। वचन वह होता है; जो स्वेच्छा से, प्रसन्नतापूर्वक स्वयं प्रस्तुत होकर दिया जाये।"🤹
🤱"जो भी हो, आप हमारी होनेवाली सन्तानों को उस दुष्ट के सम्मुख प्रस्तुत करेंगे ही!"
देवकी का आवेश कम नहीं हो रहा था। 🤱
🤹"समझने का प्रयास करो। कंस मेरी नहीं, तुम्हारी हत्या करने जा रहा था। यह सोचकर कि तुम ही नहीं रहोगी तो सन्तान कैसे उत्पन्न होंगी, और वह अपने काल को टाल देगा। वैसे में, एक पति होने के नाते मेरा तात्कालिक धर्म यही था कि मैं कैसे भी तुम्हारी रक्षा करूँ। मैं अपना खड्ग लेकर उससे युद्ध कर सकता था; किन्तु वह बलिदान नहीं, आत्महत्या करने के समान होता। एक तो कंस और उसकी सेना के पीछे जरासन्ध, भौमासुर, बाणासुर और कालयवन की सेनाओं का भी साथ है। इतने बड़े संगठन से लड़ना तभी सार्थक होता है, जब अपना संगठन उससे भिड़ने के तुल्य हो। जबकि तुमने देखा था कि उस दिन कंस का विरोध मेरे अतिरिक्त किसी ने भी नहीं किया था।... और मैं यह भी जानता था कि मुझे मार देने के बाद भी कंस शान्त नहीं बैठता, तुम्हारी हत्या करता ही।"🤹
🤱देवकी के मुख पर से दुःख की कालिमा शनैः-शनैः उतरने लगी, आश्वस्ति का रंग चढ़ने लगा। यद्यपि वह वसुदेव की ओर देखती रहीं, बोली कुछ नहीं। तो वसुदेव पुनः बोले, "अभी तो प्रथम सन्तान के जन्म लेने में ही बहुत समय शेष है, तो सम्भावित कष्टों की कल्पना करके दुखी होना बुद्धिमानी नहीं है। हम दोनों प्रत्यक्ष न सही, अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध करते रहेंगे। जब जैसी परिस्थिति आयेगी, साथ मिलकर संघर्ष करते रहेंगे।... अन्यथा तुम, तुम्हारी सभी छह बड़ी बहनें, पिता समेत कई मथुरावासी कहते रहते हैं कि पूरे मथुरा में यदि सर्वाधिक सुन्दर, वीर, बुद्धिमान और चरित्रवान कोई है तो वह वसुदेव है। मुझे नहीं पता कि इसमें कितनी सच्चाई है। किन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि मैं आज भी वही वसुदेव हूँ, जो पूर्व में था! यदि तुम्हारी तनिक भी इच्छा हो तो तुम केवल संकेत-भर कर दो, मैं अभी के अभी कंस से युद्ध करके प्राणान्त करने को प्रस्तुत हूँ।"🤹
🤱देवकी का मुख दमक उठा। उनके नयनों में अपने स्वामी के प्रति और ऐसे स्वामी की भार्या होने का मान प्रकट होने लगा। वे स्वयं को रोक नहीं पायीं, उठकर उनके वक्ष से लग गयीं। वसुदेव उन्हें अपनी भुजाओं में समेटकर उनकी पीठ प्रेमपूर्वक थपथपाने लगे।🤱
🍀 आध्यात्मिक ज्ञान 🍀
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