*• वैदिक दर्शन की मूल आधारशिला - तीन अनादि सत्ताएं •* ------------------------------- *द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते।* *तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति॥* -- ऋग्वेद : मण्डल 1, सूक्त 164, मन्त्र 20 *• अर्थ* : हे मनुष्यो ! (सुपर्णा) सुन्दर पंखोंवाले (सयुजा) समान सम्बन्ध रखनेवाले (सखाया) मित्रों के समान वर्त्तमान (द्वा) दो पखेरू (समानम्) एक (वृक्षम्) जो काटा जाता उस वृक्ष का (परि, सस्वजाते) आश्रय करते हैं (तयोः) उनमें से (अन्यः) एक (पिप्पलम्) उस वृक्ष के पके हुए फल को (स्वादु) स्वादुपन से (अत्ति) खाता है और (अन्यः) दूसरा (अनश्नत्) न खाता हुआ (अभि, चाकशीति) सब ओर से देखता है अर्थात् सुन्दर चलने-फिरने वा क्रियाजन्य काम को जाननेवाले व्याप्यव्यापकभाव से साथ ही सम्बन्ध रखते हुए मित्रों के समान वर्त्तमान जीव और ईश-परमात्मा समान कार्यकारणरूप ब्रह्माण्ड देह का आश्रय करते हैं। उन दोनों अनादि जीव [और] ब्रह्म में जो जीव है वह पाप-पुण्य से उत्पन्न सुख-दुःखात्मक भोग को स्वादुपन से भोगता है और दूसरा ब्रह्मात्मा कर्मफल को न भोगता हुआ उस भोगते हुए जीव को सब ओर से देखता [है ]अर्थात् साक्षी है यह तुम जानो। भावार्थ : इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। जीव, परमात्मा और जगत् का कारण - ये तीन पदार्थ अनादि और नित्य हैं। जीव और ईश-परमात्मा यथाक्रम से अल्प अनन्त चेतन विज्ञानवान् सदा विलक्षण व्याप्यव्यापकभाव से संयुक्त और मित्र के समान वर्त्तमान हैं। वैसे ही जिस अव्यक्त परमाणुरूप कारण से कार्यरूप जगत् होता है वह भी अनादि और नित्य है। समस्त जीव पाप-पुण्यात्मक कार्यों को करके उनके फलों को भोगते हैं और ईश्वर एक सब ओर से व्याप्त होता हुआ न्याय से पाप-पुण्य के फल को देने से न्यायाधीश के समान देखता है। (संदर्भ ग्रन्थ : महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेद भाष्य) *• अर्थ-चिंतन* : ऋग्वेद का यह मन्त्र वैदिक दर्शन के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मन्त्रों में से एक है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इसी मन्त्र को आधार बनाकर स्पष्ट किया है कि ईश्वर, जीव और प्रकृति - ये तीनों अनादि, नित्य तथा परस्पर भिन्न तत्त्व हैं। यही वैदिक दर्शन की मूल आधारशिला है। इस मन्त्र में अत्यन्त सुंदर रूपक के माध्यम से इन तीनों अनादि सत्ताओं के पारस्परिक सम्बन्ध और उनके भिन्न-भिन्न स्वरूप का निरूपण किया गया है। मन्त्र में कहा गया है - "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते।" अर्थात् एक ही वृक्ष पर दो सुंदर पक्षी साथ-साथ, मित्रों के समान निवास करते हैं। यहाँ "दो पक्षी" कोई वास्तविक पक्षी नहीं हैं। यह एक रूपक है। इन दो पक्षियों में एक जीवात्मा (Soul) है और दूसरा परमात्मा (God)। "समानं वृक्षम्" से उस वृक्ष का बोध कराया गया है जो कार्य-कारणरूप संसार अथवा शरीर का आधार (Material cause) है। यह सम्पूर्ण जगत् जिस मूल कारण से प्रकट होता है, वही जड़ प्रकृति है। इस प्रकार मन्त्र में तीन अनादि तत्त्वों का संकेत है - जीव, परमात्मा और प्रकृति। जीव और परमात्मा - इन दोनों चेतन तत्त्वों को "सुपर्णा" कहा गया है। इसका अभिप्राय है कि दोनों चेतन, ज्ञानस्वरूप और क्रियाशील हैं। फिर भी दोनों सर्वथा समान नहीं हैं। जीव सीमित ज्ञान वाला, अल्पशक्तिमान्, एकदेशी और कर्मफल का भोक्ता है; जबकि परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमा्न, सर्वव्यापक और कभी कर्मफल का भोक्ता नहीं होता। इसी प्रकार उन्हें "सयुजा" कहा गया है, अर्थात् दोनों का अत्यन्त निकट सम्बन्ध है। परमात्मा प्रत्येक जीव के साथ अन्तर्यामी रूप से विद्यमान है। वह जीव से कभी पृथक् नहीं होता, किन्तु दोनों का अस्तित्व एक नहीं हो जाता - दोनों अभिन्न = एक नहीं हो जातें। उनके बीच व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है - जीव व्याप्य (Pervaded) है और परमात्मा व्यापक (Pervader)। इसलिए वे सदैव साथ रहते हुए भी अपने-अपने स्वरूप में भिन्न हैं। मन्त्र में उन्हें "सखाया", अर्थात् मित्र भी कहा गया है। मित्र वह होता है जो हित चाहता है। परमात्मा जीव का परम हितैषी है। वह उसे वेदज्ञान प्रदान करता है, धर्म का मार्ग दिखाता है, उसके कर्मों के अनुसार न्यायपूर्वक फल देता है और मोक्ष-प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। जीव भी परमात्मा का उपासक बनकर उसके निकट रहने का प्रयत्न करता है। यह मित्रता समानता के अर्थ में नहीं, बल्कि कल्याणकारी सम्बन्ध के अर्थ में है। इसके बाद मन्त्र कहता है - "तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति"। अर्थात् उन दोनों में से एक उस वृक्ष के मधुर फल का आस्वादन करता है। यहाँ "फल" से पाप और पुण्य के कर्मों से उत्पन्न सुख-दुःख रूपी कर्मफल का बोध कराया गया है। जीव स्वतंत्रतापूर्वक अपने कर्म करता है और उन्हीं के फल भोगता है। कभी सुख मिलता है तो वह प्रसन्न होता है, कभी दुःख आता है तो क्लेश अनुभव करता है। जन्म-मरण का चक्र, विविध योनियों में गमन, सुख-दुःख का अनुभव, कभी बन्धन कभी मोक्ष - ये सब जीव के ही भाग में आते हैं। इसलिए मन्त्र में भोग करने वाला पक्षी जीवात्मा है। इसके विपरीत मन्त्र कहता है - "अनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति"। दूसरा पक्षी स्वयं उस फल को नहीं खाता, केवल सब ओर से देखता रहता है। यह दूसरा पक्षी परमात्मा है। वह किसी कर्म के फल भोक्ता नहीं है। वह संसार के किसी पदार्थ का अपने लिए भोग नहीं करता है। उसे न सुख का स्पर्श होता है, न दुःख का। वह सदैव आनन्द-स्वरूप रहता है। वह निष्पक्ष साक्षी, सर्वज्ञ और न्यायकारी है। वह प्रत्येक जीव के कर्मों को पूर्ण रूप से जानता है और उसी के अनुसार उचित फल प्रदान करता है। इसीलिए महर्षि दयानन्द ने उसकी तुलना न्यायाधीश से की है। परमात्मा न्यायाधीश के समान सभी जीवों के प्रत्येक कर्म को यथावत् जानकर - साक्षी होकर - न्यायपूर्वक सुख-दुख रूप फल देता है। इस मन्त्र का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दार्शनिक निष्कर्ष यह है कि यदि जीव और परमात्मा वास्तव में एक ही सत्ता होते, तो एक के भोगने और दूसरे के केवल साक्षी रहने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। जो भोग रहा है और जो केवल देख रहा है, वे दोनों भिन्न ही हो सकते हैं। इसी प्रकार यदि जगत् का उपादान कारण भी परमात्मा ही होता, तो मन्त्र में "समानं वृक्षम्" के रूप में एक पृथक् आधार का उल्लेख करने की आवश्यकता न रहती। इसीलिए महर्षि दयानन्द ने स्पष्ट किया कि परमात्मा जगत् का निमित्त कारण (Efficient or Agental cause) है, अर्थात् वही सृष्टि का रचयिता, नियन्ता और संचालक है; किन्तु उपादान कारण (Material cause) प्रकृति है, जिससे यह जगत् निर्मित होता है। यह प्रकृति भी किसी समय उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि अनादि और नित्य है। सृष्टि के आरम्भ में अनादि परमात्मा अनादि जीवों के कल्याण के लिए उसी अनादि प्रकृति से जगत् की रचना करता है और प्रलय में वही जगत् पुनः कारणावस्था को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह मन्त्र वैदिक दर्शन का अत्यन्त गम्भीर सिद्धान्त प्रस्तुत करता है कि ईश्वर, जीव और प्रकृति - ये तीनों अनादि, नित्य तथा परस्पर भिन्न तत्त्व हैं। जीव कर्म करने और उनके फल भोगने वाला है; परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, न्यायकारी और कर्मफलों का साक्षी तथा दाता है; और प्रकृति वह जड़ उपादान कारण है जिससे यह जगत् निर्मित होता है। इन तीनों के भेद को समझना ही वेदसम्मत तत्त्वज्ञान का आधार है। यही ज्ञान मनुष्य को ईश्वर की उपासना, धर्ममय कर्म और अन्ततः मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है। वेदों की ओर लौटो सनातन धर्म की ओर लौटो 🚩🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #👩‍🎨WhatsApp प्रोफाइल DP
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