*• यज्ञ प्रकाशक विद्वान् और विज्ञान-सम्मत प्रगति का आदर्श •* -------------------------------- *यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितमग्निं नरस्त्रिषधस्थे समीधिरे।* *इन्द्रेण देवैः सरथं स बर्हिषि सीदन्नि होता यजथाय सुक्रतुः॥* -- ऋग्वेद मंडल 5, सूक्त 11, मन्त्र 2; सामवेद 909 *• अर्थ* : हे (नरः) श्रेष्ठ कार्यों में अग्रणी विद्वान् लोगो ! जैसे आप लोग (त्रिषधस्थे) तीन पदार्थों के सहित स्थान में (यजथाय) मिलने के लिये (यज्ञस्य) उत्तम ज्ञान की (केतुम्) बुद्धि को तथा (प्रथमम्) प्रथम वर्त्तमान (पुरोहितम्) प्रथम इसको धारण करें ऐसे (अग्निम्) अग्नि के समान प्रकाशमान को (सम्, इधिरे) उत्तम प्रकार प्रकाशित करें, वैसे (सः) वह (सुक्रतुः) उत्तम बुद्धि वा उत्तम कर्मवाले (होता) दाता आप (इन्द्रेण) बिजुली और (देवैः) पृथिवी आदिकों के साथ (बर्हिषि) अन्तरिक्ष में (सरथम्) वाहनों के समूह के सहित (नि, सीदत्) स्थित हूजिये। भावार्थ : जो विद्वान् जन विद्या, धर्म और पुरुषार्थ में स्वयं वर्त्ताव करके अन्यों का उसके अनुसार वर्त्ताव कराते हैं, वे ही सब को बोध देनेवाले होते हैं। (महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेद भाष्य) *• अर्थ-चिंतन* : यह मन्त्र अग्नि की स्तुति के माध्यम से आदर्श विद्वान्, समाज-नेतृत्व और विज्ञान के लोकहितकारी उपयोग - इन तीनों का अत्यन्त सुन्दर समन्वय प्रस्तुत करता है। यहाँ "अग्नि" का प्रधान अर्थ तेजस्वी, ज्ञानवान् और समाज का अग्रणी विद्वान् है। साथ ही, पूरक रूप में इसका सम्बन्ध भौतिक अग्नि तथा परमात्मा से भी जोड़ा गया है। मन्त्र कहता है कि श्रेष्ठ पुरुष ऐसे विद्वान् को प्रतिष्ठित करें जो "यज्ञस्य केतु" अर्थात् यज्ञ का प्रकाशक हो। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं है। वेदों में ज्ञान, शिक्षा, परोपकार, सहयोग और लोकमंगल से युक्त समस्त श्रेष्ठ कर्म को यज्ञ के रूप में ग्रहण किया गया है। "केतु" का अर्थ है - प्रकाश देने वाला, मार्ग दिखाने वाला या प्रेरणा देने वाला। इसलिए यज्ञ का केतु वही है जो अपने ज्ञान और आचरण से समाज को उन्नति की दिशा दिखाए। ऐसे पुरुष को मन्त्र "प्रथमं पुरोहितम्" कहता है। पुरोहित शब्द का वास्तविक आशय उस व्यक्ति से है जो सबसे आगे रहकर समाज का मार्गदर्शन करे और लोकहित का नेतृत्व संभाले। वैदिक दृष्टि में समाज का नेतृत्व जन्म, वंश या बाह्य प्रतिष्ठा के कारण नहीं मिलता; वह ज्ञान, चरित्र, निष्पक्षता और लोकहित के आधार पर प्राप्त होता है। जो स्वयं श्रेष्ठ जीवन जीता है, वही दूसरों का मार्गदर्शन करने का अधिकारी है। उसे "अग्नि" कहा गया है, क्योंकि अग्नि स्वयं प्रकाशित होती है और दूसरों को भी प्रकाश देती है। उसी प्रकार विद्वान् अपने ज्ञान से अज्ञान का अन्धकार दूर करता है, समाज में जागृति लाता है और लोगों में पुरुषार्थ का उत्साह उत्पन्न करता है। मन्त्र आगे कहता है - "नरः... समीधिरे"। अर्थात् विद्वान् पुरुष ऐसे तेजस्वी व्यक्ति का सम्मान करें, उसके ज्ञान का प्रसार करें और उसे समाज में प्रतिष्ठित करें। इसका उद्देश्य गुणों को प्रतिष्ठा देना है, व्यक्ति-पूजा करना नहीं। जहाँ योग्य व्यक्तियों को आगे बढ़ाया जाता है, वहाँ समाज की प्रगति स्वाभाविक रूप से होती है। मन्त्र का उत्तरार्ध विशेष रूप से विचारणीय है। ऐसा "सुक्रतुः" अर्थात् उत्तम बुद्धि और श्रेष्ठ कर्मों वाला पुरुष "होता" - लोकहित का साधक और सुखों का प्रदाता - होकर "इन्द्र" अर्थात् विद्युत् तथा "देव" अर्थात् पृथ्वी आदि प्राकृतिक पदार्थों का समुचित उपयोग करे। "सरथम्" का अर्थ है विभिन्न वाहनों के साथ और "बर्हिषि" का अर्थ यहाँ अन्तरिक्ष है। इस प्रकार मन्त्र का आशय है कि मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों और विज्ञान का उपयोग करके विविध वाहनों का विकास करे तथा अन्तरिक्ष तक अपनी उपयोगी गतिविधियों का विस्तार करे। यह उल्लेख विशेष ध्यान देने योग्य है, क्योंकि महर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी में ही वेदों के आधार पर विद्युत्, प्राकृतिक शक्तियों और आकाशमार्गीय परिवहन के उपयोग की सम्भावना व्यक्त की थी। राइट बंधुओं द्वारा विमान का आविष्कार तो इसके लगभग दो दशक बाद हुआ। इसका अर्थ यह नहीं कि मन्त्र किसी विशिष्ट आधुनिक यन्त्र का नाम लेता है, बल्कि यह मनुष्य को प्रकृति के नियमों का ज्ञान प्राप्त कर उनका लोकहित में उपयोग करने की प्रेरणा देता है। वैदिक दृष्टि में विज्ञान और धर्म परस्पर विरोधी नहीं हैं; सत्य और कल्याण की दिशा में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। अन्तिम पद "यजथाय" यह स्पष्ट करता है कि यह सम्पूर्ण प्रयास लोकमंगल, सामाजिक व्यवस्था और श्रेष्ठ कर्मों की उन्नति के लिए होना चाहिए। विज्ञान का उद्देश्य विनाश नहीं, कल्याण होना चाहिए; शक्ति का उद्देश्य शोषण नहीं, सेवा होना चाहिए; और नेतृत्व का उद्देश्य अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व होना चाहिए। महर्षि दयानन्द के भाष्य के अतिरिक्त कुछ वेदभाष्यकार विद्वानों ने इस मन्त्र का एक पूरक अर्थ भी प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार यहाँ आदर्श अध्यक्ष या राष्ट्रनेता का वर्णन है, जिसे विद्वानों की सभा सर्वसम्मति से प्रतिष्ठित करती है और जो योग्य सहयोगियों के साथ समाज का संचालन करता है। यह अर्थ भी मन्त्र की मूल भावना के अनुकूल है। एक अन्य आध्यात्मिक व्याख्या में "अग्नि" परमात्मा का बोधक माना गया है। ज्ञान, कर्म और उपासना - इन तीनों का समन्वय होने पर परमात्मा मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शक बनता है और उसका जीवन यज्ञमय हो जाता है। यह अर्थ भी प्रेरणादायक है, किन्तु मन्त्र का प्रधान आशय विद्वान् नेतृत्व, ज्ञान के प्रसार और विज्ञान के लोकहितकारी उपयोग की शिक्षा देना है। इस प्रकार यह मन्त्र हमें सिखाता है कि समाज की वास्तविक उन्नति तब होती है जब ज्ञानवान् और चरित्रवान् व्यक्तियों को नेतृत्व मिले, विज्ञान का उपयोग मानव-कल्याण के लिए किया जाए और समस्त पुरुषार्थ लोकहित की भावना से प्रेरित हो। यही वैदिक संस्कृति का आदर्श है और यही इस मन्त्र का स्थायी संदेश है। वेदों की ओर लौटो सनातन धर्म की ओर लौटो सनातन संस्कृति जागरण संघ भीनमाल 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #📜 Whatsapp स्टेटस #🤟 सुपर स्टेटस #👩‍🎨WhatsApp प्रोफाइल DP
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