Jagdish Sharma
।। ॐ ।।
यस्मान्नोद्विजतेलोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१२/१५॥
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्विग्न नहीं होता एवं हर्ष, सन्ताप, भय और समस्त विक्षोभों से मुक्त है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
साधकों के लिये यह श्लोक अत्यन्त उपयोगी है। उन्हें इस ढंग से रहना चाहिये कि उनके द्वारा किसी के मन को ठेस न लगे। इतना तो साधक कर सकते हैं; किन्तु दूसरे लोग इस आचरण से नहीं चलेंगे। वे तो संसारी हैं ही, वे तो आग उगलेंगे, कुछ भी कहेंगे; किन्तु पथिक को चाहिये कि अपने हृदय में उनके द्वारा (उनके आघातों से) भी उथल-पुथल न होने दे। चिन्तन में सुरत लगी रहे, क्रम न टूटे। उदाहरण के लिये आप स्वयं सड़क पर नियमानुकूल बायें से चल रहे हैं, कोई मदिरा पीकर चला आ रहा है, उससे बचना भी आपकी जिम्मेदारी है। #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता