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#🪔हल षष्ठी 🙏
षष्ठी माता (बेहमाता)
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क्या आप जानते हैं?
जन्म के छठे दिन एक देवी अदृश्य रूप से आकर शिशु का भाग्य लिखती हैं! उन्हें कहते हैं बेहमाता / षष्ठी माता, संतान की रक्षा करने वाली दिव्य मातृशक्ति के रूप में पूजा जाता है।
बेहमाता / षष्ठी माता जो शिशु का भाग्य लिखती हैं
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सनातन परंपरा में लोकमान्यता और पुराणों के अनुसार एक अत्यंत रहस्यमयी देवी का वर्णन मिलता है जिन्हें बेहमाता, षष्ठी माता या छठी माता कहा जाता है। माना जाता है कि जब किसी बालक का जन्म होता है तो जन्म के छठे दिन अर्थात षष्ठी तिथि को यह देवी अदृश्य रूप से आकर उस बालक के जीवन का भाग्य लिखती हैं।
इसी कारण भारत के अनेक क्षेत्रों में जन्म के छठे दिन “छठी” या “षष्ठी उत्सव” मनाया जाता है। इस दिन दीप जलाकर, कलम-दवात रखकर और प्रसाद अर्पित करके देवी का स्वागत किया जाता है। कई स्थानों पर लोकगीत गाकर माता का स्मरण भी किया जाता है।
पुराणों में उल्लेख
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पुराणों में षष्ठी देवी को संतान की रक्षा करने वाली मातृशक्ति माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड में षष्ठी देवी का उल्लेख मिलता है, जहाँ उन्हें भगवान कार्तिकेय की पत्नी देवसेना का स्वरूप बताया गया है। वे बालकों की रक्षा करने वाली और वंशवृद्धि प्रदान करने वाली देवी मानी जाती हैं।
पुराणों के अनुसार देवी षष्ठी प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न देवी हैं, इसलिए उनका नाम “षष्ठी” पड़ा।
कुछ ग्रंथों में उन्हें कार्तिकेय की पत्नी देवसेना का रूप भी माना गया है।
पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा राजा प्रियव्रत से जुड़ी है।
राजा प्रियव्रत धर्मात्मा और प्रतापी राजा थे, लेकिन उन्हें संतान नहीं थी। बहुत समय बाद उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया। यज्ञ के प्रभाव से उनकी पत्नी को पुत्र हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से बच्चा जन्म लेते ही मृत हो गया।
राजा अपने मृत पुत्र को गोद में लेकर श्मशान पहुँचे और अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगे। तभी आकाश से एक दिव्य रथ उतरा और उसमें से देवी षष्ठी प्रकट हुईं।
देवी ने कहा:👉🏻 “मैं बच्चों की रक्षक देवी हूँ। जो मेरी पूजा करता है उसे संतान सुख और बालकों की रक्षा का आशीर्वाद मिलता है।” राजा ने देवी की स्तुति की और उनसे कृपा माँगी। देवी प्रसन्न हुईं और उस मृत बालक को पुनः जीवित कर दिया। इसके बाद देवी ने कहा कि हर महीने की षष्ठी तिथि पर और बच्चे के जन्म के छठे दिन उनकी पूजा करनी चाहिए। तभी से छठी की पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई।
माता का वाहन
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लोकमान्यता के अनुसार बिल्ली को षष्ठी माता का वाहन माना जाता है। इसलिए कई स्थानों पर बिल्ली को भोजन कराना शुभ समझा जाता है।
वास्तव में षष्ठी माता उस दैवी शक्ति का प्रतीक हैं जो जीवात्मा के कर्मों के अनुसार जीवन का प्रारब्ध निर्धारित करती है। इसलिए छठे दिन भाग्य लेखन की परंपरा कर्म और प्रारब्ध के गहरे आध्यात्मिक सिद्धांत का प्रतीक मानी जाती है।
इस प्रकार बेहमाता केवल लोकविश्वास की देवी नहीं, बल्कि संतान की रक्षा, आयु और भाग्य की अधिष्ठात्री आदिशक्ति के रूप में पूजित हैं।
देवी षष्ठी के साथ बिल्ली का संबंध एक प्रसिद्ध लोक कथा से भी जुड़ा है, जो विशेष रूप से पूर्वी भारत में बहुत प्रचलित है। एक गाँव में एक स्त्री रहती थी जिसे चोरी-छिपे अच्छा भोजन खाने की आदत थी। जब भी घर में स्वादिष्ट भोजन बनता, वह थोड़ा-थोड़ा छिपाकर खा लेती लेकिन जब घर वालों को खाने की कमी दिखाई देती, तो वह झूठ बोल देती कि “यह सब बिल्ली खा गई।” घर वाले उस बिल्ली को डाँटते और मारते थे। वह बिल्ली वास्तव में देवी षष्ठी का वाहन थी। जब उसे बिना दोष के दंड मिला, तो उसने स्त्री को सबक सिखाने का निश्चय किया। जब भी उस स्त्री को बच्चा होता, बिल्ली चुपके से बच्चे को उठा ले जाती और देवी षष्ठी के पास ले जाती। इस प्रकार उसके कई बच्चे जन्म लेते ही गायब हो गए। दु:खी होकर वह स्त्री एक दिन जंगल में रोने लगी। तभी एक वृद्धा के रूप में स्वयं देवी षष्ठी प्रकट हुईं और उससे पूछा कि क्या उसने कभी किसी निर्दोष पर झूठा आरोप लगाया है।
तब स्त्री को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने स्वीकार किया कि वह बिल्ली पर झूठा दोष लगाती थी। उसने देवी से क्षमा माँगी।
देवी षष्ठी ने उसे बिल्ली का सम्मान करने और उनकी पूजा करने का व्रत करने को कहा।
कथा के अनुसार देवी ने उसके सभी बच्चों को उसे वापस दे दिया।
इसी मान्यता के कारण सनातन परंपरा में यह विश्वास है कि बच्चे के जन्म के छठे दिन (छठी) देवी षष्ठी आती हैं वे बच्चे के भाग्य का लेखन करती हैं।उस दिन माता विशेष व्रत और पूजा करती है।कई स्थानों पर बिल्ली को भी देवी का वाहन मानकर सम्मान दिया जाता है!
देवी षष्ठी बच्चों की रक्षा और उनके कल्याण की देवी मानी जाती हैं। उनकी पूजा से संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। बिल्ली को उनका वाहन मानने की परंपरा इसी लोक कथा और श्रद्धा से जुड़ी हुई है।
षष्ठी माता की स्तुति
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षष्ठी देवि नमस्तुभ्यं बालानां रक्षणप्रिये।
सौभाग्यं देहि मे नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धिनि॥
अर्थ 👉🏻 हे षष्ठी देवी! आपको नमस्कार है। आप बालकों की रक्षा करने वाली हैं। कृपया सौभाग्य और संतान की वृद्धि प्रदान करें।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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