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Vasu bapu official - Author on ShareChat
Vasu bapu official
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#geeta #name #mhadev
= geeta = geeta
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  • Vasu bapu official - Author on ShareChat
    Vasu bapu official
    #geeta #name #--- #हरहर महादेव #mhadev
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  • ajit patel - Author on ShareChat
    ajit patel
    #geeta updesh
    ०७ थग२२ ४ ४नभ ढे छे तेनुं Hg Gfad 9 அld ४ भृत्थु पाभे छे तेनो %नभ निशित छे, तेथी ४ डाथभी थने खनिवार्थ छे तेनो I& dHI& 2ilS எ seqi %iSol. श्रीभ६ भगवध्ट गीता ajit patel ०७ थग२२ ४ ४नभ ढे छे तेनुं Hg Gfad 9 அld ४ भृत्थु पाभे छे तेनो %नभ निशित छे, तेथी ४ डाथभी थने खनिवार्थ छे तेनो I& dHI& 2ilS எ seqi %iSol. श्रीभ६ भगवध्ट गीता ajit patel
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  • ડો અબ્દુલ ગની મહેસાણીયા - Author on ShareChat
    ડો અબ્દુલ ગની મહેસાણીયા
    #points to ponder #*આપણે વિચારીશું ખરા?* #सोचने वाली बात #Gita and We #જાણવા જેવું
    श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग) का १०वां श्लोक इस प्रकार 8: *्योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः I* *एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः Il १० II* "योग साधना में लगे हुए साधक (योगी) को चाहिए कि वह निरंतर अपने मन, बुद्धि और शरीर को लिए परमात्मा में लगाए। इसके वह अकेले में, एकांत स्थान पर रहे और अपने मन व इंद्रियों को पूरी तरह वश में रखते हुए सभी प्रकार की सांसारिक इच्छाओं (वस्तुओं को बटोरने) तथा संग्रह की भावना से सर्वथा मुक्त रहे।" 77OA श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग) का १०वां श्लोक इस प्रकार 8: *्योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः I* *एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः Il १० II* "योग साधना में लगे हुए साधक (योगी) को चाहिए कि वह निरंतर अपने मन, बुद्धि और शरीर को लिए परमात्मा में लगाए। इसके वह अकेले में, एकांत स्थान पर रहे और अपने मन व इंद्रियों को पूरी तरह वश में रखते हुए सभी प्रकार की सांसारिक इच्छाओं (वस्तुओं को बटोरने) तथा संग्रह की भावना से सर्वथा मुक्त रहे।" 77OA
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  • ડો અબ્દુલ ગની મહેસાણીયા - Author on ShareChat
    ડો અબ્દુલ ગની મહેસાણીયા
    #*let us understand our religion #सोचने वाली बात #💐 દેશ પ્રેમ #Gita and We #*આપણે વિચારીશું ખરા?*
    17/7/26 भगवद्गीता - अध्याय ६, श्लोक १६ नात्यश्नतस्तु योगोडस्ति न चैकान्तमनश्नतः न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव স্রাতুন || अनुवादः हे अर्जुन! योग न तो उनके लिए है जो अत्यधिक भोजन करते fg हैं, और न ही उनके जो पूर्णतः লিৎ भोजन नहीं करते; न तो उनके जो अत्यधिक शयन करते हैं, और न लिए ही उनके जो सदा जाग्रत रहते 81 BG 616: 0 Arjuna! Yoga is not for one who overeats;| nor for one who does not eat at all; neither for one who oversleeps nor for one who is always awake 10:51 17/7/26 भगवद्गीता - अध्याय ६, श्लोक १६ नात्यश्नतस्तु योगोडस्ति न चैकान्तमनश्नतः न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव স্রাতুন || अनुवादः हे अर्जुन! योग न तो उनके लिए है जो अत्यधिक भोजन करते fg हैं, और न ही उनके जो पूर्णतः লিৎ भोजन नहीं करते; न तो उनके जो अत्यधिक शयन करते हैं, और न लिए ही उनके जो सदा जाग्रत रहते 81 BG 616: 0 Arjuna! Yoga is not for one who overeats;| nor for one who does not eat at all; neither for one who oversleeps nor for one who is always awake 10:51
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  • ડો અબ્દુલ ગની મહેસાણીયા - Author on ShareChat
    ડો અબ્દુલ ગની મહેસાણીયા
    #*આપણે વિચારીશું ખરા?* #points to ponder #सोचने वाली बात #Gita and We
    Bhagavad Gita Daily अध्याय १७ श्लोक ८-१० भगवद्वीता మ आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः 4 रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः || कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः 1 दुःखशोकामयप्रदाः || आहारा राजसस्येष्टा यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् | उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् || अनुवादः सात्त्विक व्यक्ति आयु, सद्नगुण, शक्ति, स्वास्थ्य, प्रसन्नता तथा संतोष बर्धक भोजन पसंद करते हैं। ऐसे भोज्य पदार्थ रसयुक्त, स्निग्ध (चिकनाई से युक्त), पौष्टिक तथा हृदय को प्रिय लगने वाले होते हैं। राजासिक व्यक्ति कड़वे , खट्टे, नमकीन, बहुत गर्म, तीखे, सूखे और दाहकारक भोजन पसंद करते हैं। ऐसे भोज्य पदार्थों के सेवन से ಗತ, शोक तथा रोग उत्पन्न होते हैं। तामसिक व्यक्ति अधपका , स्वादरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट तथा अपवित्र भोजन पसंद करते हैं। BG 17.8-10: Sattvic people prefer foods that enhance life virtue strength health, happiness, and satisfaction. Such foods are succulent, oleaginous wholesome and pleasant to the heart: Rajasic people prefer foods that are bitter sour salty, and burning Such dry; very hot; pungent, foods produce pain; and disease grief; _1 [ e Bhagavad Gita Daily अध्याय १७ श्लोक ८-१० भगवद्वीता మ आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः 4 रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः || कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः 1 दुःखशोकामयप्रदाः || आहारा राजसस्येष्टा यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् | उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् || अनुवादः सात्त्विक व्यक्ति आयु, सद्नगुण, शक्ति, स्वास्थ्य, प्रसन्नता तथा संतोष बर्धक भोजन पसंद करते हैं। ऐसे भोज्य पदार्थ रसयुक्त, स्निग्ध (चिकनाई से युक्त), पौष्टिक तथा हृदय को प्रिय लगने वाले होते हैं। राजासिक व्यक्ति कड़वे , खट्टे, नमकीन, बहुत गर्म, तीखे, सूखे और दाहकारक भोजन पसंद करते हैं। ऐसे भोज्य पदार्थों के सेवन से ಗತ, शोक तथा रोग उत्पन्न होते हैं। तामसिक व्यक्ति अधपका , स्वादरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट तथा अपवित्र भोजन पसंद करते हैं। BG 17.8-10: Sattvic people prefer foods that enhance life virtue strength health, happiness, and satisfaction. Such foods are succulent, oleaginous wholesome and pleasant to the heart: Rajasic people prefer foods that are bitter sour salty, and burning Such dry; very hot; pungent, foods produce pain; and disease grief; _1 [ e
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