UDAY KUMAR SONI
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तुम कितना डरते हो? तुम डरते हो, तुम कितना डरते हो! तुम वर्दी की आड़ में छिपते हो, तुम इतना क्यों डरते हो? तुम डरते हो, कि कहीं ये हुंकार तुम्हें सुनाई न पड़ जाए, कि कहीं ये ललकार तुम्हारे शीशमहलों तक न पहुँच जाए। शायद तुम भूल गए हो इस मिट्टी की ताक़त। इंटरनेट, मेट्रो, रेलगाड़ियाँ, ये तो आज के साधन हैं। कौन कहता है आंदोलन को इंटरनेट की ज़रूरत है? तुम डरते हो, तुम कितना डरते हो! आवाज़ तो गूँजेगी, तुम्हारे कानों तक पहुँचेगी। तुम रोकना चाहोगे, मगर रोक नहीं पाओगे। देखते रह जाओगे तुम, सिंहासन हिल उठेगा, ज़मीन भी गाएगी, इंक़लाब के नारों से दिल्ली गूँज जाएगी! तुम डरते हो, तुम कितना डरते हो! पूछ लूँ मैं आख़िर, तुम क्यों डरते हो? तुमने चोरी की? चलो, मान लेते हैं, नहीं की। तुमने कुछ छिपाया? चलो, मान लेते हैं, नहीं छिपाया। तो फिर ये पहरे क्यों? ये बंदिशें क्यों? ये ख़ामोशी का हुक्म क्यों? तुम डरते हो, तुम कितना डरते हो! जब कुछ किया ही नहीं, तो आख़िर इतना क्यों डरते हो? #📢 ताज़ा खबर 🗞️ #🌐 राष्ट्रीय अपडेट #🚇मेट्रो-ट्रेन पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त 🗞️ #🔊CJP को प्रोटेस्ट के लिए नहीं मिली इजाजत 🤔 ##ब्रेकिंग न्यूज़🙏
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