Dinesh Nishad
आखिर क्यों एक ऋषि ने भगवान शंकर को क्यों दिया था श्राप और कैसे मिली थी उस श्राप से शंकर जी को मुक्ति - सम्पूर्ण कथा
यह कथा शिवमहापुराण, पद्मपुराण और श्रीमद् भागवत के एक अत्यंत गूढ़ प्रसंग से ली गई है। यह केवल श्राप की कथा नहीं है, यह अहंकार, परीक्षा, मर्यादा और अंत में करुणा की कथा है।
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1. सृष्टि के आरंभ में महान यज्ञ
सत्ययुग के आरंभ की बात है। नैमिषारण्य में सभी महान ऋषि एकत्रित हुए थे। वहाँ अठासी हजार ऋषि-मुनि तप कर रहे थे। पृथ्वी पर अधर्म बढ़ रहा था और देवताओं में यह चर्चा थी कि त्रिदेवों - ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे श्रेष्ठ कौन है? कौन सा देव सबसे अधिक सात्विक, धैर्यवान और भक्तवत्सल है?
नैमिषारण्य के ऋषियों ने भी यही प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा, हम एक महान यज्ञ करेंगे और इस यज्ञ का फल हम त्रिदेवों में जो सबसे श्रेष्ठ होगा, उसे अर्पित करेंगे। पर श्रेष्ठता का निर्णय कैसे हो?
तब सभी ने सर्वसम्मति से महर्षि भृगु को चुना। भृगु ऋषि ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, अत्यंत तेजस्वी, पर उनके भीतर अपने तप का सूक्ष्म अहंकार भी था। उन्हें कहा गया, "हे भृगु, आप त्रिलोक में जाइए और तीनों देवों की परीक्षा लीजिए।"
भृगु ऋषि ने यह दायित्व स्वीकार किया।
2. ब्रह्मलोक और वैकुंठ की परीक्षा
सबसे पहले भृगु ऋषि ब्रह्मलोक गए। वहाँ भगवान ब्रह्मा अपनी पत्नी सरस्वती के साथ विराजमान थे और वेदों का पाठ कर रहे थे। भृगु के आने पर ब्रह्मा जी ने उनका अभिवादन नहीं किया, क्योंकि वे वेदपाठ में लीन थे। भृगु को क्रोध आ गया। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया, "आपने अपने ही पुत्र का सम्मान नहीं किया, आपमें ज्ञान का अहंकार है, इसलिए पृथ्वी पर आपका कोई मंदिर नहीं होगा और आपकी पूजा नहीं होगी।" ब्रह्मा जी ने शांत भाव से श्राप स्वीकार कर लिया।
फिर भृगु वैकुंठ गए। वहाँ भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। भृगु ने देखा कि विष्णु उठे नहीं। क्रोध में आकर भृगु ने विष्णु जी की छाती पर, जहाँ लक्ष्मी जी का निवास है, अपने पैर से प्रहार कर दिया।
संसार थम गया। लक्ष्मी जी क्रोधित हो गईं। पर भगवान विष्णु जागे, और उन्होंने भृगु के पैर को पकड़ लिया और सहलाने लगे। बोले, "हे महर्षि, आपका पैर कोमल है, मेरी कठोर छाती पर चोट लगने से आपको कष्ट हुआ होगा। आपके चरण चिन्ह मेरे हृदय पर सदा रहेंगे।"
भृगु की आँखों से आँसू आ गए। उन्होंने कहा, आप ही सबसे सात्विक हैं, आप ही श्रेष्ठ हैं। विष्णु की यह क्षमा ही उनकी श्रेष्ठता थी।
पर अब बारी थी कैलाश की।
3. कैलाश में घटित वह घटना जिसने श्राप दिया
भृगु ऋषि कैलाश पर्वत पर पहुँचे। उस समय भगवान शंकर माता पार्वती के साथ एकांत में विराजमान थे। उनके गण - नंदी, श्रृंगी, भृंगी बाहर पहरा दे रहे थे। भृगु ने भीतर प्रवेश करना चाहा तो नंदी ने रोक दिया, "अभी महादेव एकांत में हैं, आप प्रतीक्षा कीजिए।"
भृगु को लगा, यह तो मेरा अपमान है। मैं ब्रह्मा का पुत्र हूँ, मैंने विष्णु की परीक्षा ली है, यह शिव मुझे रोक रहा है? वे बलपूर्वक भीतर चले गए।
भीतर देखा तो भगवान शिव पार्वती जी को अपनी गोद में बैठाकर उन्हें आत्मज्ञान का उपदेश दे रहे थे। शिव का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने भृगु की ओर देखा, पर उठकर स्वागत नहीं किया। शिव का स्वभाव ही वैरागी है, वे किसी औपचारिकता में नहीं पड़ते। पार्वती जी भी लज्जा के कारण उठ गईं।
भृगु को यह अपनी तपस्या का घोर अपमान लगा। उनका अहंकार जाग उठा। उन्होंने क्रोध में काँपते हुए कहा,
"हे शिव! तुम सदा श्मशान में रहते हो, भूत-प्रेत तुम्हारे साथी हैं, तुम अमंगल वेश धारण करते हो, तुम्हें सभ्यता का ज्ञान नहीं। तुमने एक ऋषि का, एक ब्राह्मण का अपमान किया है। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि आज से तुम्हारी पूजा लिंग के रूप में होगी। तुम्हारा यह सुंदर शरीर रूप में पूज्य नहीं रहेगा, तुम केवल लिंग रूप में ही पूजे जाओगे और तुम्हें यज्ञ में कोई भाग नहीं मिलेगा। दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भी तुम्हारा अपमान होगा।"
यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं। उन्होंने भी पलटकर भृगु को श्राप देना चाहा, पर भगवान शिव ने उन्हें रोक दिया।
शिव मुस्कुराए। वह मुस्कान ऐसी थी जिसमें करुणा थी। उन्होंने कहा,
"हे भृगु, मैं तुम्हारा श्राप स्वीकार करता हूँ।"
सभी चकित रह गए। शिव ने कहा, यदि मेरी पूजा लिंग रूप में होगी तो इससे बड़ा वरदान क्या हो सकता है? लिंग का अर्थ है प्रतीक। मैं निराकार हूँ, मेरा कोई आकार नहीं। मनुष्य मुझे आकार में बाँध नहीं सकता। इसलिए लिंग के रूप में मेरी पूजा होना ही उचित है। लिंग ही सृष्टि का आधार है। यह सृजन और संहार दोनों का प्रतीक है। तुमने मुझे श्राप नहीं, वरदान दिया है।
पर भृगु का श्राप तो लग चुका था। शिव जी लिंग रूप में पूजित होने लगे।
4. श्राप का दूसरा भाग और दक्ष यज्ञ
भृगु के श्राप का दूसरा भाग था - तुम्हें यज्ञ में भाग नहीं मिलेगा। यही आगे चलकर दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सत्य हुआ। दक्ष ने शिव को बिना बुलाए यज्ञ किया, माता सती ने आत्मदाह किया, फिर वीरभद्र ने यज्ञ विध्वंस किया।
पर यहाँ एक गूढ़ बात है। शिव को श्राप से दुख नहीं हुआ, दुख हुआ ऋषियों को। क्योंकि जब शिव लिंग रूप में पूजित होने लगे, तो ऋषियों को लगा कि हमने तो अनजाने में शिव का अपमान कर दिया। नैमिषारण्य के ऋषियों ने भृगु से कहा, आपने जल्दबाजी में श्राप दे दिया। अब प्रायश्चित कैसे होगा?
भृगु को भी पश्चाताप हुआ। उन्हें अपने अहंकार का बोध हुआ कि मैंने विष्णु की क्षमा देखी, पर शिव की सहजता को अहंकार समझ बैठा।
5. श्राप से मुक्ति कैसे मिली?
श्राप से मुक्ति की कथा और भी सुंदर है।
शिव जी ने भृगु से कहा था, मैं इस श्राप को वरदान के रूप में लेता हूँ, पर तुम्हें भी इस श्राप से मुक्त होना होगा, क्योंकि श्राप देने वाला भी बंधता है।
मुक्ति के लिए भगवान शिव ने स्वयं उपाय बताया।
उन्होंने कहा, हे भृगु, तुमने मुझे लिंग रूप में पूजित होने का श्राप दिया। अब इस श्राप की मुक्ति तब होगी जब तुम स्वयं उसी लिंग की सबसे पहले पूजा करोगे और संसार को बताओगे कि लिंग पूजा ही सबसे पवित्र है।
दूसरा उपाय, भगवान विष्णु ने दिया। विष्णु जी ने कहा, हे भृगु, आपने मेरे हृदय पर चरण प्रहार किया, मैंने उसे चिन्ह के रूप में धारण किया। इसी प्रकार शिव के लिंग पर जो जल, बेलपत्र चढ़ेगा, वह आपके ही द्वारा पवित्र माना जाएगा। आप शिवलिंग पर जलाभिषेक की परम्परा प्रारंभ करो।
तब भृगु ऋषि ने कठोर तप किया। उन्होंने काशी में, जहाँ स्वयं शिव विश्वनाथ के रूप में हैं, एक वर्ष तक पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जाप किया और अपने हाथों से एक शिवलिंग की स्थापना की। वह शिवलिंग आज भी काशी में भृगु-महेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है।
भृगु ने वहाँ रो रोकर शिव से क्षमा माँगी। उन्होंने कहा, हे महादेव, मैंने अज्ञानता में आपको श्राप दिया। आप तो निराकार हैं, आप तो दया के सागर हैं। मुझे क्षमा करें।
तब आकाशवाणी हुई। भगवान शिव प्रकट हुए और बोले,
"हे भृगु, तुम मेरे पुत्र समान हो। तुम्हारा श्राप मेरे लिए वरदान बन गया। देखो, आज से जो भी भक्त मुझे लिंग रूप में पूजेगा, उसे मेरी निराकार कृपा प्राप्त होगी। लिंग पूजा से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होंगे। और तुम्हें भी मुक्ति मिल गई। क्योंकि जिसने श्राप दिया था, उसी ने उसकी महिमा स्थापित की। आज से तुम भी भृगु-ऋषि के रूप में मेरे परम भक्त के रूप में पूजे जाओगे। जो भक्त भृगु द्वारा स्थापित लिंग की पूजा करेगा, उसे मैं कभी नहीं त्यागूँगा।"
और इस प्रकार शिव जी श्राप से मुक्त नहीं हुए, बल्कि उन्होंने श्राप को ही अमरत्व दे दिया। यही शिव की महानता है। वे विष को भी अमृत बना देते हैं, श्राप को भी वरदान बना देते हैं।
शिव पुराण में कहा गया है -
"लिंग रूप में मेरी पूजा करके भृगु ने जो मुक्ति पाई, वही मुक्ति संसार के हर जीव को मिलेगी जो अहंकार छोड़कर मेरी शरण में आएगा।"
भृगु ऋषि को भी बोध हुआ कि परीक्षा लेने वाला परीक्षार्थी से बड़ा नहीं होता। भक्ति में तर्क नहीं, समर्पण चाहिए।
इस कथा का सार यही है कि भगवान शंकर को श्राप इसलिए मिला क्योंकि मनुष्य का अहंकार कभी कभी भगवान की लीला को समझ नहीं पाता। और उन्हें मुक्ति इसलिए मिली, बल्कि उन्होंने मुक्ति दी, क्योंकि वे आशुतोष हैं। वे तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। वे श्राप को भी गले लगा लेते हैं यदि वह भक्त के मुख से निकला हो।
आज भी जब हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तो हम उसी भृगु के पश्चाताप और शिव की असीम करुणा को याद करते हैं।
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