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#शिवलिंग_की_उत्पत्ति_की_कथा
एक बार ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच यह विवाद उत्पन्न हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है।
विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों अपने-अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन करने लगे। तभी उनके बीच अचानक एक विशाल अग्निस्तंभ प्रकट हुआ, जिसका न कोई आदि दिखाई दे रहा था और न अंत।
दोनों ने निश्चय किया कि जो इस स्तंभ का छोर खोज लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा।
भगवान विष्णु वराह रूप धारण करके उसके नीचे का अंत खोजने चले गए और ब्रह्मा जी हंस रूप लेकर ऊपर की ओर उसके आदि को खोजने निकल पड़े।
बहुत दूर तक जाने के बाद भी भगवान विष्णु उस अग्निस्तंभ का अंत नहीं खोज सके। वे लौट आए और अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली।
ब्रह्मा जी भी उसका आदि नहीं खोज पाए, लेकिन उन्होंने सत्य स्वीकार करने के स्थान पर यह कह दिया कि उन्होंने उसका ऊपरी छोर देख लिया है।
तभी उस अनंत अग्निस्तंभ से भगवान महादेव प्रकट हुए।
उन्होंने ब्रह्मा जी के असत्य को प्रकट किया और विष्णु जी की सत्यनिष्ठा की प्रशंसा की।
यही दिव्य अग्निस्तंभ ज्योतिर्मय शिवलिंग के रूप में भगवान शिव के अनंत और निराकार स्वरूप का प्रतीक माना गया।
इस कथा की सीख:
अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो, सत्य के सामने टिक नहीं सकता।
और जहाँ मनुष्य अपनी सीमा स्वीकार कर लेता है, वहीं से वास्तविक ज्ञान का आरंभ होता है।
#🌹 सुविचार 🌹 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #🌹🙏 श्री हरि 🙏🌹 ॐ नमः शिवाय। 🔱
संदर्भ: श्री शिव महापुराण, विद्येश्वर संहिता के संबंधित अध्याय।