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- 💕V.I.P.jatin Narang 🐅काल हर, कष्ट हर, दुख हर, दरिद्र हर, सर्व रोग हर, सर्व पाप हर, नमः पार्वती पतये, हर हर महादेव" #bhole #sawanspecial #shiv #शिवलिंग #शिवलिंग दर्शन7487
- sn vyas#शिवलिंग #शिवलिंग दर्शन #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱शिवपुराण कथा📖 #🔱हर हर महादेव शिवलिंग की अद्भुत कथा - शिव पुराण के अनुसार ॐ नमः शिवाय। शिव पुराण में कहा गया है - आकाशं लिंगमित्याहुः पृथ्वी तस्य पीठिका। आलयः सर्व देवानां लयनात् लिंगमुच्यते।। अर्थात आकाश ही लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। समस्त देवताओं का आलय और सबका लय जिसमे होता है, इसीलिए उसे लिंग कहते हैं। आज हम शिव महापुराण के प्रथम खण्ड, विद्येश्वर संहिता के अध्याय 5 से लेकर 10 तक में वर्णित उस परम गोपनीय और अद्भुत कथा को विस्तार से जानेंगे, जिसमे स्वयं बताते हैं कि पहला शिवलिंग कैसे प्रकट हुआ। यह कथा केवल कथा नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड के सृजन का रहस्य है। अध्याय 1 - सृष्टि के आरंभ में विवाद यह उस समय की बात है जब सृष्टि का निर्माण अभी-अभी हुआ था। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में थे। उनके नाभि कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने अपने आप को सृष्टि का रचयिता समझा और विष्णु जी को पालनहार। एक बार दोनों में संयोग से भेंट हुई। ब्रह्मा जी ने विष्णु जी से कहा - "हे विष्णु! तुम कौन हो? मैं ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ। तुम मेरी नाभि से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम मेरे पुत्र हो।" विष्णु जी मुस्कुराए और बोले - "हे ब्रह्मन! आप भ्रम में हैं। मैं ही इस चराचर जगत का पालनहार, परमात्मा हूँ। आप मेरी नाभि कमल से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए मैं आपका पिता हूँ। आप तो मेरे ही अधीन हैं।" बस, यही से विवाद शुरू हो गया। "मैं बड़ा - मैं बड़ा" का अहंकार। दोनों ही अपने आप को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने लगे। विवाद इतना बढ़ा कि दोनों के बीच दिव्यास्त्रों का युद्ध छिड़ गया। ब्रह्मा जी ने ब्रह्मास्त्र चलाया और विष्णु जी ने नारायणास्त्र। सम्पूर्ण सृष्टि डोलने लगी। देवता भयभीत हो गए। ऋषि-मुनि कांपने लगे। सभी देवता दौड़े-दौड़े भगवान शिव के पास कैलाश पर गए और प्रार्थना की - "हे महादेव! यदि इन दोनों का युद्ध ऐसे ही चलता रहा तो सृष्टि का प्रलय हो जाएगा। आप ही कुछ कीजिए।" देवताओं की प्रार्थना सुनकर भोलेनाथ, जो सदा निष्पक्ष हैं, ने एक लीला रची। अध्याय 2 - अनंत अग्नि स्तम्भ का प्राकट्य - पहला शिवलिंग जैसे ही ब्रह्मा और विष्णु अपने-अपने अस्त्र चलाने वाले थे, तभी उनके बीच आकाश और पाताल को चीरता हुआ एक विशाल, अनंत अग्नि का स्तम्भ प्रकट हो गया। वह स्तम्भ कैसा था? शिव पुराण कहता है - वह न तो आग का था, न लोहे का, न पत्थर का। वह शुद्ध प्रकाश का पुंज था। उसका कोई आदि नहीं था, कोई अंत नहीं था। वह हजारों सूर्यों के समान चमक रहा था, परन्तु उसकी चमक शीतल थी, आँखों को जलाती नहीं थी। उसमे से "ॐ" की ध्वनि निकल रही थी। वह निराकार होते हुए भी साकार था। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला हुआ था। उस अग्नि स्तम्भ को देखकर ब्रह्मा और विष्णु दोनों का युद्ध रुक गया। दोनों आश्चर्यचकित हो गए। तभी आकाशवाणी हुई - "हे ब्रह्मा! हे विष्णु! तुम दोनों अपने आप को श्रेष्ठ समझते हो। यह जो अग्नि स्तम्भ तुम्हारे सामने है, यह मेरा ही निराकार रूप है - लिंग रूप। तुम दोनों में से जो भी इसका आदि या अंत खोज लेगा, वही बड़ा माना जाएगा।" दोनों ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। अध्याय 3 - ब्रह्मा और विष्णु की अनंत की खोज भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण किया। वराह अर्थात जंगली शूकर, जो पृथ्वी को खोद सकता है। वे उस अग्नि स्तम्भ के नीचे, पाताल की ओर, उसका अंत खोजने के लिए चले गए। वे हजारों वर्षों तक खोदते रहे, पाताल से भी नीचे, शेषनाग के लोक तक चले गए, परन्तु उन्हें उस स्तम्भ का अंत नहीं मिला। उधर ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण किया। हंस आकाश में सबसे ऊँचा उड़ सकता है। वे उस अग्नि स्तम्भ के ऊपर, आकाश की ओर, उसका आदि खोजने के लिए उड़ने लगे। वे ब्रह्मलोक, तपलोक, सत्यलोक तक चले गए, परन्तु उन्हें भी उस स्तम्भ का आदि नहीं मिला। हजारों दिव्य वर्ष बीत गए। दोनों थक गए। विष्णु जी ने अपनी हार मान ली। वे वापस उसी स्थान पर आ गए जहाँ से चले थे और हाथ जोड़कर उस स्तम्भ को प्रणाम करते हुए बोले - "हे परम शक्ति! मैं हार गया। आप अनादि हैं, अनंत हैं। आपका कोई आदि-अंत नहीं है। आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं।" परन्तु ब्रह्मा जी के मन में अहंकार आ गया। वे सोचने लगे - यदि मैं भी हार मान लूँगा तो विष्णु के सामने छोटा हो जाऊँगा। मुझे कुछ छल करना चाहिए। तभी आकाश से एक केतकी का फूल नीचे गिर रहा था। वह फूल उस अग्नि स्तम्भ के ऊपर से गिर रहा था। ब्रह्मा जी ने उस फूल को पकड़ लिया। उन्होंने केतकी के फूल से कहा - "हे केतकी! तुम मेरे साथ चलो और साक्षी बनो कि मैंने इस स्तम्भ का अंत देख लिया है।" केतकी का फूल भय से उनकी बात मान गया। ब्रह्मा जी नीचे आए और झूठ बोलने लगे - "हे विष्णु! देखो, मैंने इस स्तम्भ का आदि खोज लिया है। यह केतकी का फूल इसका साक्षी है। यह फूल उस आदि स्थान पर ही था।" अध्याय 4 - सत्य का उद्घाटन और शिव का साकार रूप जैसे ही ब्रह्मा जी ने यह झूठ कहा, वैसे ही वह अग्नि स्तम्भ फट गया और उसमें से साक्षात् भगवान शिव अपने साकार रूप में प्रकट हो गए। उनका रूप कैसा था? शिव पुराण में वर्णन है - नीलकंठ, जटाओं में गंगा, मस्तक पर अर्धचन्द्रमा, भस्म से लिपटा शरीर, गले में रुद्राक्ष और सर्पों की माला, दस भुजाएँ, हाथ में त्रिशूल, डमरू, अभय मुद्रा। उनके साथ ही "ॐ नमः शिवाय" की ध्वनि गूंज रही थी। शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्मा जी की ओर देखा। शिव बोले - "हे ब्रह्मा! तुमने असत्य बोला है। तुम सृष्टि के रचयिता होकर झूठ बोलते हो! जो असत्य बोलता है, उसकी पूजा कभी नहीं होगी। आज से इस संसार में तुम्हारी कहीं भी मूर्ति पूजा नहीं होगी। तुम्हारा कोई मंदिर नहीं बनेगा।" और केतकी के फूल की ओर देखकर बोले - "हे दुष्ट केतकी! तूने झूठी साक्षी दी है, इसलिए आज से तू मेरी पूजा में वर्जित होगी। कोई भी भक्त मुझे केतकी का फूल नहीं चढ़ाएगा।" ब्रह्मा जी भय से कांपने लगे और शिव के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने क्षमा मांगी। शिव दयालु हैं, उन्होंने क्षमा कर दिया, परन्तु अपना श्राप वापस नहीं लिया। आज भी ब्रह्मा जी का केवल एक ही मंदिर है पुष्कर में और केतकी का फूल शिव पूजा में नहीं चढ़ता। फिर शिव ने विष्णु जी की ओर प्रेम से देखा। "हे विष्णु! तुमने सत्य बोला, तुमने अपनी हार स्वीकार की। तुम्हारी विनम्रता से मैं प्रसन्न हूँ। आज से तुम मेरी ही तरह पूज्य होओगे। सम्पूर्ण संसार तुम्हारी भी पूजा करेगा।" यह सुनकर ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने शिव की स्तुति की। अध्याय 5 - लिंग शब्द का वास्तविक अर्थ और महात्म्य तब ब्रह्मा और विष्णु ने हाथ जोड़कर पूछा - "हे महादेव! यह अग्नि स्तम्भ क्या था? आपने लिंग रूप क्यों धारण किया?" तब भगवान शिव ने लिंग के रहस्य को समझाया, जो शिव पुराण का सार है। शिव बोले - "हे ब्रह्मा, हे विष्णु! यह जो अग्नि स्तम्भ तुमने देखा, वही मेरा लिंग रूप है।" संस्कृत में 'लिंग' का अर्थ है - प्रतीक, चिन्ह, निशान। जैसे किसी पुरुष का चिन्ह उसकी मूंछ है, वैसे ही मेरा चिन्ह यह ज्योति स्तम्भ है। दूसरा अर्थ है - 'लयनात् लिंगम्' अर्थात जिसमें सब कुछ लय हो जाता है, प्रलय के समय सम्पूर्ण सृष्टि जिसमें समा जाती है, वही लिंग है। यह स्तम्भ निराकार है। मैं निराकार हूँ, अनादि हूँ, अनंत हूँ। मेरा कोई रूप नहीं है। परन्तु भक्तों को ध्यान करने के लिए, मुझे एक आकार की आवश्यकता थी, इसलिए मैंने यह लिंग रूप धारण किया। यह मेरे निराकार और साकार दोनों रूपों का प्रतीक है। यह अग्नि स्तम्भ ऊपर और नीचे दोनों ओर अनंत है, इसका अर्थ है मैं ही आकाश हूँ, मैं ही पाताल हूँ, मैं ही सब जगह हूँ। और जो तुमने इसका गोलाकार भाग देखा, जिसे योनि या पीठिका कहते हैं, वह मेरी शक्ति, माता पार्वती हैं। लिंग मेरे पुरुष रूप का प्रतीक है और योनि पीठिका मेरी प्रकृति रूपा पार्वती का प्रतीक है। जब तक पुरुष और प्रकृति नहीं मिलते, सृष्टि नहीं बनती। इसलिए मेरे लिंग और पार्वती की पीठिका का यह मिलन ही सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। इसी से ही सृजन होता है।" अध्याय 6 - ज्योतिर्लिंग और शिवलिंग के प्रकार भगवान शिव ने आगे कहा - "हे हरि, हे ब्रह्मा! आज मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, आर्द्रा नक्षत्र में मैं इस लिंग रूप में प्रकट हुआ हूँ। इसलिए आज का दिन महाशिवरात्रि के रूप में प्रसिद्ध होगा। जो भी इस दिन मेरे लिंग की पूजा करेगा, उसे अनंत फल मिलेगा।" "यह मेरा पहला लिंग, यह अग्नि स्तम्भ, अरुणाचल पर्वत पर स्थित होगा और 'अरुणाचलेश्वर' कहलाएगा। परन्तु मेरे तेज का अंश लेकर पृथ्वी पर बारह स्थानों पर मेरे बारह ज्योतिर्लिंग प्रकट होंगे।" शिव पुराण में वे बारह ज्योतिर्लिंग हैं - सोमनाथ - सौराष्ट्र में मल्लिकार्जुन - श्रीशैल पर महाकालेश्वर - उज्जयिनी में ओंकारेश्वर - नर्मदा तट पर केदारनाथ - हिमालय में भीमाशंकर - डाकिनी में काशी विश्वनाथ - वाराणसी में त्र्यम्बकेश्वर - गोदावरी तट पर वैद्यनाथ - चिताभूमि में नागेश्वर - दारुकावन में रामेश्वरम - सेतुबंध पर घुश्मेश्वर - शिवालय में इनके दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। शिवलिंग दो प्रकार के होते हैं - एक जो स्वयं प्रकट हुए हैं, जिन्हें स्वयंभू कहते हैं, जैसे अमरनाथ का बर्फ का लिंग। दूसरे जो भक्तों द्वारा बनाए जाते हैं - जैसे पार्थिव लिंग (मिट्टी का), जल लिंग, गंध लिंग, रत्न लिंग। शिव पुराण में कहा गया है कि कलियुग में पार्थिव लिंग की पूजा सबसे अधिक फलदायी है। मिट्टी से शिवलिंग बनाकर, उसकी पूजा करके विसर्जित करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है। अध्याय 7 - शिवलिंग पूजा का विधान और फल भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को शिवलिंग पूजा का विधान भी बताया। "हे विष्णु! मेरे लिंग की पूजा करने से पहले स्नान करना चाहिए। फिर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करते हुए गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से मेरा अभिषेक करना चाहिए। इसे पंचामृत अभिषेक कहते हैं।" "मुझे बिल्वपत्र सबसे अधिक प्रिय है। एक बिल्वपत्र चढ़ाने से एक हजार कमल चढ़ाने के समान फल मिलता है। परन्तु ध्यान रहे, मुझे केतकी, केवड़ा का फूल कभी मत चढ़ाना।" "मेरे लिंग पर जल की धारा सदा बहनी चाहिए। क्योंकि मैं अग्नि स्तम्भ हूँ, जल से मुझे शीतलता मिलती है और भक्त को शांति मिलती है। इसीलिए मेरे ऊपर जलाधारी लटकी रहती है।" जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता है, सुनता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता। उसके सारे पाप भस्म हो जाते हैं, जैसे काल भस्म हुआ था। उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। उपसंहार तो हे भक्तों! यही है शिवलिंग की अद्भुत कथा। शिवलिंग कोई साधारण पत्थर नहीं है। वह अनंत ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। वह निराकार से साकार होने की यात्रा है। वह पुरुष और प्रकृति के मिलन का प्रतीक है। वह सृजन, पालन और संहार - तीनों का आधार है। जब हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तो हम उस अनंत अग्नि स्तम्भ को शीतल कर रहे होते हैं, जो हमारे अहंकार का प्रतीक है - जैसे ब्रह्मा का अहंकार शांत हुआ था। Raksha Bharti जब हम शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं, तो हम इस अनंत ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करते हैं। इसीलिए शिव पुराण कहता है - एक बार शिवलिंग का दर्शन कर लेने से सैकड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। हर हर महादेव। इति शिव पुराणोक्त शिवलिंगोत्पत्ति कथा सम्पूर्णम्।1015
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- sn vyas#शिवलिंग #शिवलिंग दर्शन #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱शिवपुराण कथा📖 #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 *💫🔱 शिवलिंग पूजा की अचिंत्य महिमा 🔱💫* [ `शिव रहस्य महा-इतिहास – अंश ३ , अध्याय ४०` ] *शिवलिंग पूजा की महिमा , पूर्वकाल के ब्रह्मा विष्णु इन्द्र आदि देवताओं की मृत्यु के उपरांत शिवभक्त मुनियों को नये देवताओं का पद प्राप्त होना , नन्दीकेश्वर द्वारा धर्मरत नाम के मुनि को भगवान विष्णु का पद प्राप्त होना ।* `भगवान श्रीसदाशिव से नंदीकेश्वर जी से कहते है–` *नन्दिकेश महाशैव पश्य पश्य शिवार्चकान् ।* *शिवलिङ्गार्चने तेषां विश्वासः खलु वर्धते ॥५२॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 श्री सदाशिव बोले— हे महाशैव नन्दिकेश ! देखो , जरा इन शिव-आराधकों को देखो । शिवलिंग के अर्चन में इनका विश्वास एवं निष्ठा निश्चय ही निरंतर बढ़ रही है ।` *लिङ्गपूजनमेतेषां सर्वेषां व्रतमुत्तमत् ।* *तपस्या सफला नूनं लिङ्गार्चनसमन्वयात् ॥५३॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 इन सभी मुनियों का सर्वाधिक उत्तम व्रत शिवलिंग की पूजा करना ही है । शिवलिंग की अर्चना से जुड़ जाने के कारण ही इनकी यह तपस्या निश्चित रूप से सफल हुई है ।` *न केवलेन तपसा केवलैर्बहुभैरपि ।* *दानैर्वा केवलैः प्रीतिः मम लिङ्गार्चनं बिना ॥५४॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 शिवलिंग की पूजा के बिना , न तो केवल कठिन तपस्या से , न बहुत प्रकार के यज्ञों से तथा न ही केवल बड़े-बड़े दानों से मुझे वैसी प्रसन्नता ( प्रीति ) मिलती है ।` *तुल्लिङ्गार्चने प्रीतिः यथा मम सदा तथा ।* *प्रीतिस्तु न भवत्येव वेदपारायणैरपि ॥५५॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 जैसी मेरी अगाध प्रीति शिवलिंग के अर्चन में सदैव रहती है , वैसी प्रीति मुझे केवल वेदों का पाठ अथवा पारायण करने वालों से भी नहीं होती ।` *तुलाकोटिप्रदानैर्वा प्रीतिर्मम न सर्वथा ।* *लिङ्गार्चनाद्यथा प्रीतिः तथा प्रीतिने केनचित् ॥५६॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 करोड़ों स्वर्ण-तुलादान देने से भी मुझे वह प्रसन्नता सर्वथा नहीं मिलती , जो प्रसन्नता मुझे शिवलिंग की अर्चना से मिलती है ; वैसी प्रीति किसी अन्य साधन से संभव नहीं है ।` *भोगकामोऽपि यः पूजां शिवलिङ्गे करिष्यति ।* *तस्मिन्नपि मम स्नेहः स्नेहपालं यतः स मे ॥५७॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 यदि कोई मनुष्य किसी सांसारिक भोग की कामना/इच्छा से भी शिवलिंग की पूजा करता है , तो उस पर भी मेरा स्नेह रहता है , क्योंकि वह मेरी शरण में आकर मेरे स्नेह का पात्र बन जाता है ।` *भोगस्तावदभूतपूर्वविभवः संभावितः सर्वदा ।* *लिङ्गाराधनतः स लिङ्गमहिमा ज्ञातो न केनाप्यतः ॥* लिङ्गाराधनतत्पराः सुरपदं संप्राप्य तिष्ठन्त्यमी। कश्चिद्विष्णु रिहास्तु कश्चन विधिः कश्चिन्महेन्द्रोऽधुना ॥ ५८ ॥ शिवलिंग की आराधना से उस जीव को ऐसा अभूतपूर्व भोग और ऐश्वर्य प्राप्त होता है जिसकी सदा संभावना बनी रहती है। इस शिवलिंग की महिमा को पूरी तरह कोई नहीं जान सकता। जो भी शिवलिंग की आराधना में लीन रहते हैं, वे परम देव-पद को प्राप्त करके अमर हो जाते हैं; उन्हीं में से कोई इस समय विष्णु, कोई ब्रह्मा और कोई साक्षात् इन्द्र बनकर विराजमान है। *केचित् दिक्पतयो भवन्तु बहवो देवा भवन्तवाश्रमी* *तदाराः कमलादयोऽपि बहवः तावद्भवन्तु प्रियाः ।* *नक्षत्राणि भवन्तु केचन तथा केचित् ग्रहा एव ते* *तत्रत्यासुरसंसृतिप्रियतमास्तिष्ठन्तु केचित्तथा ॥५९॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 ( शिव जी कहते हैं— ) इस लिंग पूजा के प्रभाव से ही कुछ लोग दिक्पाल ( दिक्पति ) बनते हैं , बहुत से देवता अपने-अपने आश्रमों या पदों को पाते हैं , औऱ कमला ( लक्ष्मी ) आदि श्रेष्ठ देवियाँ उनकी प्रिय पत्नियाँ बनती हैं । कुछ लोग नक्षत्र बनते हैं , तो कुछ नवग्रहों के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं , एवं कुछ इस संसार चक्र में अपनी-अपनी श्रेष्ठ गतियों को प्राप्त करते हैं ।` *इत्युक्तः स महेशेन नन्दिकेशस्तथाऽस्त्विति ।* *प्रेषितः स महेशेन मुनिमण्डलमागतः ॥६०॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 शिवजी द्वारा ऐसा कहे जाने पर नन्दिकेश्वर ने "वैसा ही हो" तथास्तु कहा । तदोपरांत महादेव की आज्ञा पाकर वे उन तपस्या करने वाले मुनियों के मण्डल के पास/समक्ष आए ।` *विलोक्य नन्दिकेशं तं धर्मरूपं प्रणम्य ते ।* *तुष्टुवुः पूजयित्वा तं सर्वेऽपि मुनिपुङ्गवाः ॥६१॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 साक्षात् धर्म के स्वरूप नन्दिकेश्वर को आया हुआ देखकर , उन समस्त श्रेष्ठ मुनियों ने उन्हें प्रणाम किया , उनकी पूजा-अर्चना की तथा अत्यंत आदरपूर्वक उनकी स्तुति की ।` *तत्र धर्मरतो नाम कश्चिदासीत् द्विजोत्तमः ।* *तमाह तुभ्यं विष्णुत्वं दत्तमित्यभिनन्दयन् ॥६२॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 उन मुनियों में 'धर्मरत' नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे । नन्दिकेश्वर ने उनका अभिनंदन करते हुए उनसे कहा— "तुम्हें ( शिवजी की कृपा से ) विष्णु का पद प्रदान किया जाता है ।"` *एवं विधित्वमिन्द्रत्वं चन्द्रत्वादीन्यपि स्वतः ।* *दत्त्वा तान् प्रेष्यामास तं तं लोकं मनोहरम् ॥६३॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 इसी प्रकारसे नन्दीजी ने अन्य मुनियों को उनकी योग्यता के अनुसार स्वतः ही ब्रह्मा का पद , इन्द्र का पद औऱ चन्द्रमा आदि के पद प्रदान किए , एवं उन सभीको उन-उन मनोहर लोकों में भेज दिया ।` *वैकुण्ठादिषु लोकेषु नन्दिकेशप्रसादतः ।* *अधिकारं समासाद्य स्थितास्ते मुनिपुङ्गवाः ॥६४॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 नन्दिकेश्वर की कृपा से वैकुंठ आदि दिव्य लोकों में उत्तम अधिकार प्राप्त करके वे श्रेष्ठ मुनिगण वहाँ निवास करने लगे ।` *शिवलिङ्गार्चनफलं तथा तेषामभूत् द्विजाः ।* *ईप्सितार्थान् ददात्येव लिङ्गपूजा महेशितुः ॥६५॥* `श्लोकार्थ 👉🏻 हे ब्राह्मणों ! उन मुनियों को इस प्रकार शिवलिंग की अर्चना का महान फल प्राप्त हुआ । वास्तव में महेश्वर की लिंग-पूजा मनुष्य के समस्त मनवांछित अर्थों को प्रदान करने वाली है ।` `हर हर महादेव🔱` `हर हर शङ्कर🚩` `जय जय शङ्कर🚩` `~सर्वज्ञ शङ्कर🚩` `🌄🌄 प्रभात वन्दन 🌄🌄` `© सर्वाधिकार सुरक्षित । सर्वज्ञ शङ्कर🚩 चैनल` `प्रभात_वंदन` `#सर्वज्ञशङ्कर` `#आदिअनादि अनन्तशिवहर` `#शिवलिंग_महिमा` `#शिवरहस्य` `#लिंगार्चन` `#सदाशिव` `#नन्दिकेश्वर` `#शिवभक्ति` `#सनातनधर्म`1524
- Parashar Jyotishalaya | Vapihttps://www.instagram.com/p/DcauYCHAptX/?igsi=MXVidjdzamF6NGs3MA== 🔱 कामना के अनुसार शिवलिंग 🔱 शिवलिंग के विभिन्न स्वरूपों का पूजन शास्त्रों में विशेष फलदायी बताया गया है। रत्न निर्मित शिवलिंग श्री-समृद्धि, पाषाण निर्मित शिवलिंग सिद्धि, धातु निर्मित शिवलिंग धन तथा काष्ठ निर्मित शिवलिंग भोग-सिद्धि प्रदान करने वाला माना गया है। 🙏 हर हर ॐ नमः शिवाय! 🔱 #KamnaKeAnusarShivling #ShivlingPuja #MahadevBhakti #ShivBhakti #OmNamahShivay #HinduDharma #SanatanDharma #VedicKnowledge #JyotishShastra #ParasharJyotishalaya #Vapi #DrDipakbhaiJyotishacharya #शिवलिंग #शिवलिंग दर्शन #🔱रुद्राभिषेक🙏 #🔱महादेव🔱 #महादेव #🙏🌺हर हर🔱महादेव🌺🙏8652
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- InstaAstroSocialWhen the eyes see Shiva, the heart finds peace.🕉️✨ #mahadev #lordshiva💗 #shivling #harharmahadev3045
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