sn vyas
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#शिवलिंग #शिवलिंग दर्शन #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱शिवपुराण कथा📖 #🔱हर हर महादेव शिवलिंग की अद्भुत कथा - शिव पुराण के अनुसार ॐ नमः शिवाय। शिव पुराण में कहा गया है - आकाशं लिंगमित्याहुः पृथ्वी तस्य पीठिका। आलयः सर्व देवानां लयनात् लिंगमुच्यते।। अर्थात आकाश ही लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। समस्त देवताओं का आलय और सबका लय जिसमे होता है, इसीलिए उसे लिंग कहते हैं। आज हम शिव महापुराण के प्रथम खण्ड, विद्येश्वर संहिता के अध्याय 5 से लेकर 10 तक में वर्णित उस परम गोपनीय और अद्भुत कथा को विस्तार से जानेंगे, जिसमे स्वयं बताते हैं कि पहला शिवलिंग कैसे प्रकट हुआ। यह कथा केवल कथा नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड के सृजन का रहस्य है। अध्याय 1 - सृष्टि के आरंभ में विवाद यह उस समय की बात है जब सृष्टि का निर्माण अभी-अभी हुआ था। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में थे। उनके नाभि कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने अपने आप को सृष्टि का रचयिता समझा और विष्णु जी को पालनहार। एक बार दोनों में संयोग से भेंट हुई। ब्रह्मा जी ने विष्णु जी से कहा - "हे विष्णु! तुम कौन हो? मैं ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ। तुम मेरी नाभि से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम मेरे पुत्र हो।" विष्णु जी मुस्कुराए और बोले - "हे ब्रह्मन! आप भ्रम में हैं। मैं ही इस चराचर जगत का पालनहार, परमात्मा हूँ। आप मेरी नाभि कमल से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए मैं आपका पिता हूँ। आप तो मेरे ही अधीन हैं।" बस, यही से विवाद शुरू हो गया। "मैं बड़ा - मैं बड़ा" का अहंकार। दोनों ही अपने आप को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने लगे। विवाद इतना बढ़ा कि दोनों के बीच दिव्यास्त्रों का युद्ध छिड़ गया। ब्रह्मा जी ने ब्रह्मास्त्र चलाया और विष्णु जी ने नारायणास्त्र। सम्पूर्ण सृष्टि डोलने लगी। देवता भयभीत हो गए। ऋषि-मुनि कांपने लगे। सभी देवता दौड़े-दौड़े भगवान शिव के पास कैलाश पर गए और प्रार्थना की - "हे महादेव! यदि इन दोनों का युद्ध ऐसे ही चलता रहा तो सृष्टि का प्रलय हो जाएगा। आप ही कुछ कीजिए।" देवताओं की प्रार्थना सुनकर भोलेनाथ, जो सदा निष्पक्ष हैं, ने एक लीला रची। अध्याय 2 - अनंत अग्नि स्तम्भ का प्राकट्य - पहला शिवलिंग जैसे ही ब्रह्मा और विष्णु अपने-अपने अस्त्र चलाने वाले थे, तभी उनके बीच आकाश और पाताल को चीरता हुआ एक विशाल, अनंत अग्नि का स्तम्भ प्रकट हो गया। वह स्तम्भ कैसा था? शिव पुराण कहता है - वह न तो आग का था, न लोहे का, न पत्थर का। वह शुद्ध प्रकाश का पुंज था। उसका कोई आदि नहीं था, कोई अंत नहीं था। वह हजारों सूर्यों के समान चमक रहा था, परन्तु उसकी चमक शीतल थी, आँखों को जलाती नहीं थी। उसमे से "ॐ" की ध्वनि निकल रही थी। वह निराकार होते हुए भी साकार था। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला हुआ था। उस अग्नि स्तम्भ को देखकर ब्रह्मा और विष्णु दोनों का युद्ध रुक गया। दोनों आश्चर्यचकित हो गए। तभी आकाशवाणी हुई - "हे ब्रह्मा! हे विष्णु! तुम दोनों अपने आप को श्रेष्ठ समझते हो। यह जो अग्नि स्तम्भ तुम्हारे सामने है, यह मेरा ही निराकार रूप है - लिंग रूप। तुम दोनों में से जो भी इसका आदि या अंत खोज लेगा, वही बड़ा माना जाएगा।" दोनों ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। अध्याय 3 - ब्रह्मा और विष्णु की अनंत की खोज भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण किया। वराह अर्थात जंगली शूकर, जो पृथ्वी को खोद सकता है। वे उस अग्नि स्तम्भ के नीचे, पाताल की ओर, उसका अंत खोजने के लिए चले गए। वे हजारों वर्षों तक खोदते रहे, पाताल से भी नीचे, शेषनाग के लोक तक चले गए, परन्तु उन्हें उस स्तम्भ का अंत नहीं मिला। उधर ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण किया। हंस आकाश में सबसे ऊँचा उड़ सकता है। वे उस अग्नि स्तम्भ के ऊपर, आकाश की ओर, उसका आदि खोजने के लिए उड़ने लगे। वे ब्रह्मलोक, तपलोक, सत्यलोक तक चले गए, परन्तु उन्हें भी उस स्तम्भ का आदि नहीं मिला। हजारों दिव्य वर्ष बीत गए। दोनों थक गए। विष्णु जी ने अपनी हार मान ली। वे वापस उसी स्थान पर आ गए जहाँ से चले थे और हाथ जोड़कर उस स्तम्भ को प्रणाम करते हुए बोले - "हे परम शक्ति! मैं हार गया। आप अनादि हैं, अनंत हैं। आपका कोई आदि-अंत नहीं है। आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं।" परन्तु ब्रह्मा जी के मन में अहंकार आ गया। वे सोचने लगे - यदि मैं भी हार मान लूँगा तो विष्णु के सामने छोटा हो जाऊँगा। मुझे कुछ छल करना चाहिए। तभी आकाश से एक केतकी का फूल नीचे गिर रहा था। वह फूल उस अग्नि स्तम्भ के ऊपर से गिर रहा था। ब्रह्मा जी ने उस फूल को पकड़ लिया। उन्होंने केतकी के फूल से कहा - "हे केतकी! तुम मेरे साथ चलो और साक्षी बनो कि मैंने इस स्तम्भ का अंत देख लिया है।" केतकी का फूल भय से उनकी बात मान गया। ब्रह्मा जी नीचे आए और झूठ बोलने लगे - "हे विष्णु! देखो, मैंने इस स्तम्भ का आदि खोज लिया है। यह केतकी का फूल इसका साक्षी है। यह फूल उस आदि स्थान पर ही था।" अध्याय 4 - सत्य का उद्घाटन और शिव का साकार रूप जैसे ही ब्रह्मा जी ने यह झूठ कहा, वैसे ही वह अग्नि स्तम्भ फट गया और उसमें से साक्षात् भगवान शिव अपने साकार रूप में प्रकट हो गए। उनका रूप कैसा था? शिव पुराण में वर्णन है - नीलकंठ, जटाओं में गंगा, मस्तक पर अर्धचन्द्रमा, भस्म से लिपटा शरीर, गले में रुद्राक्ष और सर्पों की माला, दस भुजाएँ, हाथ में त्रिशूल, डमरू, अभय मुद्रा। उनके साथ ही "ॐ नमः शिवाय" की ध्वनि गूंज रही थी। शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्मा जी की ओर देखा। शिव बोले - "हे ब्रह्मा! तुमने असत्य बोला है। तुम सृष्टि के रचयिता होकर झूठ बोलते हो! जो असत्य बोलता है, उसकी पूजा कभी नहीं होगी। आज से इस संसार में तुम्हारी कहीं भी मूर्ति पूजा नहीं होगी। तुम्हारा कोई मंदिर नहीं बनेगा।" और केतकी के फूल की ओर देखकर बोले - "हे दुष्ट केतकी! तूने झूठी साक्षी दी है, इसलिए आज से तू मेरी पूजा में वर्जित होगी। कोई भी भक्त मुझे केतकी का फूल नहीं चढ़ाएगा।" ब्रह्मा जी भय से कांपने लगे और शिव के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने क्षमा मांगी। शिव दयालु हैं, उन्होंने क्षमा कर दिया, परन्तु अपना श्राप वापस नहीं लिया। आज भी ब्रह्मा जी का केवल एक ही मंदिर है पुष्कर में और केतकी का फूल शिव पूजा में नहीं चढ़ता। फिर शिव ने विष्णु जी की ओर प्रेम से देखा। "हे विष्णु! तुमने सत्य बोला, तुमने अपनी हार स्वीकार की। तुम्हारी विनम्रता से मैं प्रसन्न हूँ। आज से तुम मेरी ही तरह पूज्य होओगे। सम्पूर्ण संसार तुम्हारी भी पूजा करेगा।" यह सुनकर ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने शिव की स्तुति की। अध्याय 5 - लिंग शब्द का वास्तविक अर्थ और महात्म्य तब ब्रह्मा और विष्णु ने हाथ जोड़कर पूछा - "हे महादेव! यह अग्नि स्तम्भ क्या था? आपने लिंग रूप क्यों धारण किया?" तब भगवान शिव ने लिंग के रहस्य को समझाया, जो शिव पुराण का सार है। शिव बोले - "हे ब्रह्मा, हे विष्णु! यह जो अग्नि स्तम्भ तुमने देखा, वही मेरा लिंग रूप है।" संस्कृत में 'लिंग' का अर्थ है - प्रतीक, चिन्ह, निशान। जैसे किसी पुरुष का चिन्ह उसकी मूंछ है, वैसे ही मेरा चिन्ह यह ज्योति स्तम्भ है। दूसरा अर्थ है - 'लयनात् लिंगम्' अर्थात जिसमें सब कुछ लय हो जाता है, प्रलय के समय सम्पूर्ण सृष्टि जिसमें समा जाती है, वही लिंग है। यह स्तम्भ निराकार है। मैं निराकार हूँ, अनादि हूँ, अनंत हूँ। मेरा कोई रूप नहीं है। परन्तु भक्तों को ध्यान करने के लिए, मुझे एक आकार की आवश्यकता थी, इसलिए मैंने यह लिंग रूप धारण किया। यह मेरे निराकार और साकार दोनों रूपों का प्रतीक है। यह अग्नि स्तम्भ ऊपर और नीचे दोनों ओर अनंत है, इसका अर्थ है मैं ही आकाश हूँ, मैं ही पाताल हूँ, मैं ही सब जगह हूँ। और जो तुमने इसका गोलाकार भाग देखा, जिसे योनि या पीठिका कहते हैं, वह मेरी शक्ति, माता पार्वती हैं। लिंग मेरे पुरुष रूप का प्रतीक है और योनि पीठिका मेरी प्रकृति रूपा पार्वती का प्रतीक है। जब तक पुरुष और प्रकृति नहीं मिलते, सृष्टि नहीं बनती। इसलिए मेरे लिंग और पार्वती की पीठिका का यह मिलन ही सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। इसी से ही सृजन होता है।" अध्याय 6 - ज्योतिर्लिंग और शिवलिंग के प्रकार भगवान शिव ने आगे कहा - "हे हरि, हे ब्रह्मा! आज मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, आर्द्रा नक्षत्र में मैं इस लिंग रूप में प्रकट हुआ हूँ। इसलिए आज का दिन महाशिवरात्रि के रूप में प्रसिद्ध होगा। जो भी इस दिन मेरे लिंग की पूजा करेगा, उसे अनंत फल मिलेगा।" "यह मेरा पहला लिंग, यह अग्नि स्तम्भ, अरुणाचल पर्वत पर स्थित होगा और 'अरुणाचलेश्वर' कहलाएगा। परन्तु मेरे तेज का अंश लेकर पृथ्वी पर बारह स्थानों पर मेरे बारह ज्योतिर्लिंग प्रकट होंगे।" शिव पुराण में वे बारह ज्योतिर्लिंग हैं - सोमनाथ - सौराष्ट्र में मल्लिकार्जुन - श्रीशैल पर महाकालेश्वर - उज्जयिनी में ओंकारेश्वर - नर्मदा तट पर केदारनाथ - हिमालय में भीमाशंकर - डाकिनी में काशी विश्वनाथ - वाराणसी में त्र्यम्बकेश्वर - गोदावरी तट पर वैद्यनाथ - चिताभूमि में नागेश्वर - दारुकावन में रामेश्वरम - सेतुबंध पर घुश्मेश्वर - शिवालय में इनके दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। शिवलिंग दो प्रकार के होते हैं - एक जो स्वयं प्रकट हुए हैं, जिन्हें स्वयंभू कहते हैं, जैसे अमरनाथ का बर्फ का लिंग। दूसरे जो भक्तों द्वारा बनाए जाते हैं - जैसे पार्थिव लिंग (मिट्टी का), जल लिंग, गंध लिंग, रत्न लिंग। शिव पुराण में कहा गया है कि कलियुग में पार्थिव लिंग की पूजा सबसे अधिक फलदायी है। मिट्टी से शिवलिंग बनाकर, उसकी पूजा करके विसर्जित करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है। अध्याय 7 - शिवलिंग पूजा का विधान और फल भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को शिवलिंग पूजा का विधान भी बताया। "हे विष्णु! मेरे लिंग की पूजा करने से पहले स्नान करना चाहिए। फिर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करते हुए गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से मेरा अभिषेक करना चाहिए। इसे पंचामृत अभिषेक कहते हैं।" "मुझे बिल्वपत्र सबसे अधिक प्रिय है। एक बिल्वपत्र चढ़ाने से एक हजार कमल चढ़ाने के समान फल मिलता है। परन्तु ध्यान रहे, मुझे केतकी, केवड़ा का फूल कभी मत चढ़ाना।" "मेरे लिंग पर जल की धारा सदा बहनी चाहिए। क्योंकि मैं अग्नि स्तम्भ हूँ, जल से मुझे शीतलता मिलती है और भक्त को शांति मिलती है। इसीलिए मेरे ऊपर जलाधारी लटकी रहती है।" जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता है, सुनता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता। उसके सारे पाप भस्म हो जाते हैं, जैसे काल भस्म हुआ था। उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। उपसंहार तो हे भक्तों! यही है शिवलिंग की अद्भुत कथा। शिवलिंग कोई साधारण पत्थर नहीं है। वह अनंत ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। वह निराकार से साकार होने की यात्रा है। वह पुरुष और प्रकृति के मिलन का प्रतीक है। वह सृजन, पालन और संहार - तीनों का आधार है। जब हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तो हम उस अनंत अग्नि स्तम्भ को शीतल कर रहे होते हैं, जो हमारे अहंकार का प्रतीक है - जैसे ब्रह्मा का अहंकार शांत हुआ था। Raksha Bharti जब हम शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं, तो हम इस अनंत ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करते हैं। इसीलिए शिव पुराण कहता है - एक बार शिवलिंग का दर्शन कर लेने से सैकड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। हर हर महादेव। इति शिव पुराणोक्त शिवलिंगोत्पत्ति कथा सम्पूर्णम्।
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