sn vyas
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_३५/२
गतांक से आगे
तीनों मार्ग पर चलने वाले जीवो का भगवान के साथ व्यवहार अलग अलग होता है
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*उसका पति भी वृद्ध हो जाता है तब बूढा और बूढ़ी दोनों एक हो जाते हैं ,, वह कहती है कि " मैं और मेरा पति एक ही है "*
*पहले कहती थी कि "मैं अपने पति की हूं " फिर कहने लगी "पति मेरा है " अब कहती है कि "मैं और पति एक है " उस समय अद्वैत हो जाता है , और तब यदि बेटा बूढ़े पिता से कोई कटु वचन कहे तो बूढ़ी मां का मुंह फूल जाता है ,, और यदि बहू बूढ़ी मां से कुछ कटु वचन कहती है , तो बूढ़े पिता का मुंह चढ जाता है ,, क्योंकि बूढ़ा और बूढ़ी दोनों एक हो गए हैं--- अद्वैत हो गए हैं ।*
*इसी प्रकार कर्म मार्ग वाला जीव कहता है " मैं अपने भगवान का हूं " वह अपने सभी कर्म भी भगवान की आज्ञा अनुसार ही करता है । जब उसके प्रत्येक कर्म भक्ति में हो जाते हैं । तब वहीं जीव भक्ति मार्ग का अधिकारी बन जाता है । और तब कहता है कि "भगवान मेरे है " कर्म मार्ग में कहता था कि "मैं अपने भगवान का हूं " भक्ति मार्ग में कहता है कि " भगवान मेरे है"*
*भगवान को अपने भक्त के कथन अनुसार ही कार्य करना पड़ता है । भक्त कहता है कि मेरा रथ हाको ,, तो भगवान को उसका रथ हाकना पड़ता है । उसके थके हुए घोड़ों को नहलाना पड़ता है । भक्त कहता है कि मेरी बेटी का भात बनाना है,, उसके लिए सामग्री ले आओ , तो भगवान को सामग्री भी लानी पड़ती है । भक्त हुंडी लिखाता है तो भगवान को वह स्वीकार करनी पड़ती है।*
*कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग में अंतर है । कर्म मार्गी कहता है कि " मैं अपने भगवान का हू " भक्ति मार्गी कहता है कि "भगवान मेरा है " । ज्ञान मार्ग मे भगवान और जीव एक हो जाते हैं । ज्ञानी कहता है "अहम ब्रह्मास्मि " अर्थात में ही ब्रह्म हूं । जीव भगवान अद्वैत (एकात्म )हो जाते हैं।*
क्रमश: अब कल नया भाग पढेगे ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta