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#🪔ज्योतिर्लिंग📿
एक अजीब सा डबल स्टैंडर्ड है.
जब कोई स्टूडेंट बोलता है
"स्कूल रास्ते में है।"
"स्कूल में टीचर हैं या नहीं, चेक करो."
"शिक्षा व्यवस्था में सुधार करो।"
तो उससे कभी "दिमागी नक्सल", कभी एंटी-नेशनल और कभी डेवलपमेंट के अगेंस्ट बता दिया जाता है.
लेकिन जब रिलीजियस फेस्टिवल्स और प्रोसेशंस के नाम पर वायरल वीडियोज में लोग इनैप्रोपराइएट बिहेवियर करते हुए दिखते हैं, तो सवाल उठता है-क्या ये भी वही "संस्कार" हैं जिनके नाम पर दूसरों को जज किया जाता है?
और अगर कोई आइडियोलॉजी स्टूडेंट्स के बेसिक राइट्स के लिए आवाज उठाने वाले बच्चों को क्वेश्चन करे, लेकिन वायरल मिसबिहेवियर को इग्नोर करे, तो प्रॉब्लम स्टूडेंट्स में है या हमारे प्रायोरिटीज में?
स्कूल मांगने वाला बच्चा "दिमागी नक्सल" कैसे हो गया?और सिर्फ रिलीजियस स्लोगन लगाने वाला ऑटोमेटिकली "देशभक्त" कैसे हो गया?
देशभक्ति का मतलब सिर्फ रिलिजन या स्लोगन्स नहीं होना चाहिए.
देशभक्ति ये भी है की आपके देश के बच्चे अच्छे स्कूल्स में पढ़ें.
सड़कें सुरक्षित माननीय.
शिक्षक जवाबदेह माननीय।
और सिटीजंस को अपने राइट्स के लिए आवाज उठानी ना पड़े.
संस्कार कपड़ों, स्लोगन्स या रिलिजन से प्रूव नहीं होते.
आप दूसरे इंसान के साथ कैसे बिहेव करते हो उससे होते हैं.
और हां, किसी एक वायरल वीडियो के बेसिस पर पूरी रिलीजियस कम्युनिटी को जज करना भी गलत है.
पूरे समुदाय पर सवाल न उठाएं, बल्कि पाखंड पर सवाल उठाएं।
आपके हिसाब से रियल "देशभक्ति" क्या है स्लोगन्स या अपने देश के सिटीजंस के लिए बैटर लाइफ डिमांड करना?
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#🙏गीता ज्ञान🛕 #🛕शिव मंदिर🪔 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🕉 शिव भजन