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- @S.R.Dhakad🔱🏵🙏जय श्री महाकाल ज़ी🙏🏵🔱 भस्म आरती शृंगार दर्शन उज्जैन धाम से 🌖 श्रावण मास शुक्ल पक्ष एकादशी रविवार , 23 अगस्त 2026* **विक्रम संवत 2083** 🔱🌿श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🌿🔱 #🙏ज्योतिर्लिंग दर्शन #🔱 🕉Official_Mahakal_Ujjain🕉 🔱 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🕉 शिव भजन #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏6676
- devana mahakaal ji kaभगवान भोलेनाथ पर सरसों के तेल से हुआ महाभिषेक 🚩🚩🕉️🚩🚩 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏जय शिव शम्भू #🙏🌹जय श्री कृष्णा 🌹🙏 #🙏ज्योतिर्लिंग दर्शन #🔱हर हर महादेव1520
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- 🅢🅗🅘🅥 🅚🅤🅜🅐🅡🙏🏻🌹जय श्री महाकालेश्वर ज़ी🌹🙏🏻 🔱 24-08-2026-प्रातः भस्म आरती दर्शन उज्जैन से🔱 #उज्जैन बाबा ज्योतिर्लिंग दर्शन 🙏 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱ज्योतिर्लिंग😇 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🔱हर हर महादेव1914
- Yadav Ji 🇮🇳🇮🇳2️⃣8️⃣7️⃣1️⃣🇮🇳🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹#🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🙏ज्योतिर्लिंग दर्शन #🔱हर हर महादेव #🕉 महाकालेश्वर मंदिर🛕 बाबा केदारनाथ #🙏🕉️जय बाबा केदारनाथ 🕉️🙏4363
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- sn vyas#शिवलिंग दर्शन एक पुराना शिवलिंग जो हर महाशिवरात्रि पर शिव-पार्वती की कथा सुनाता है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर, सतपुड़ा की गोद में, एक गाँव है - बेलगाँव। नक्शे पर इस गाँव का नाम कठिनाई से मिलता है। पर वहाँ के लोग कहते हैं - हमारे गाँव में भगवान बसते हैं। गाँव के बाहर, घने बेल के वृक्षों के बीच, एक खंडहर मंदिर है। मंदिर का शिखर गिर चुका है, द्वार की चौखट पर नाग-नागिन की मूर्तियाँ धुंधली पड़ गई हैं, पर गर्भगृह आज भी अडिग है। और उस गर्भगृह में है - एक शिवलिंग। काला, चिकना, लगभग तीन हाथ ऊँचा। उस पर कोई नक्काशी नहीं, कोई सोना-चाँदी नहीं। केवल एक गहरी, ठंडी शांति। कहते हैं, यह शिवलिंग स्वयंभू है - स्वयं प्रकट हुआ। पांडवों के समय से भी पहले का। पर इस शिवलिंग की एक विशेषता है, जिसे केवल बेलगाँव के बूढ़े जानते हैं। हर महाशिवरात्रि की रात्रि को, जब सारा गाँव सो जाता है, और मंदिर में केवल एक दीपक जलता रह जाता है, तब यह पुराना शिवलिंग कथा सुनाता है। शिव-पार्वती की कथा। वह कथा जो किसी ग्रंथ में नहीं है। वह कथा जो केवल प्रेम करने वाले सुन सकते हैं। और जो एक बार वह कथा सुन ले, वह जन्म-जन्मांतर तक शिव को नहीं भूलता। 🚩पहला अध्याय - मंदिर का रखवाला मंदिर का कोई पुजारी नहीं था। था एक रखवाला - हरिराम काका। आयु अस्सी वर्ष। कमर झुकी हुई, आँखों में मोतियाबिंद, पर पैरों में अभी भी इतनी शक्ति कि प्रतिदिन तीन किलोमीटर चलकर मंदिर आता, उसे बुहारता, बेलपत्र चढ़ाता और लौट जाता। हरिराम काका इस मंदिर के तीसरे रखवाले थे। उनसे पहले उनके पिता, और उनसे पहले उनके दादा इस मंदिर की सेवा करते थे। दादाजी ने पिता को कहा था, पिता ने हरिराम को कहा था - "बेटा, महाशिवरात्रि की रात कभी मंदिर में मत रुकना। उस रात वह बोलता है। और जो उसकी बात सुन ले, वह फिर इस संसार का नहीं रहता।" हरिराम ने अपने पिता की बात नहीं मानी। जब वह बीस वर्ष का था, पहली बार वह महाशिवरात्रि की रात मंदिर में रुक गया। छुपकर, गर्भगृह के पीछे वाले आले में। और उसने सुना। उस रात के बाद हरिराम का विवाह नहीं हुआ। उसने घर नहीं बसाया। वह केवल इस मंदिर का होकर रह गया। लोग कहते - हरिराम पागल हो गया है। पर हरिराम जानता था - वह पागल नहीं, जाग गया है। अब हरिराम अस्सी वर्ष का है। इस महाशिवरात्रि पर उसे पता है - यह उसकी अंतिम महाशिवरात्रि है। शरीर जवाब दे रहा है। इसलिए उसने इस बार एक निर्णय लिया - वह इस कथा को किसी को सौंप जाएगा। किसी ऐसे को जिसका हृदय अभी निर्मल हो। उसने चुना - अपनी पोती, गौरी को। गौरी - आयु सोलह वर्ष। दसवीं कक्षा में पढ़ती है। चंचल, पर हृदय की अत्यंत कोमल। वह अपने दादा से बहुत प्रेम करती है। वह अक्सर पूछती - "दादाजी, आप उस टूटे मंदिर में क्यों जाते हो? वहाँ तो कोई भगवान नहीं।" हरिराम हँसकर कहता - "वहाँ भगवान नहीं, भगवान की प्रतीक्षा है।" इस महाशिवरात्रि पर हरिराम ने गौरी से कहा - "बेटा, क्या तू मेरे साथ मंदिर चलेगी? रात भर?" गौरी डर गई। "रात भर? उस जंगल में?" "हाँ। मैं तुझे एक कहानी सुनवाऊँगा। ऐसी कहानी जो तूने कभी नहीं सुनी।" गौरी ने हामी भर दी। 🚩दूसरा अध्याय - महाशिवरात्रि की रात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी। महाशिवरात्रि। सारा दिन गाँव में उपवास रहा। संध्या को मंदिर में भीड़ लगी। लोगों ने जल चढ़ाया, बेलपत्र चढ़ाए, "हर हर महादेव" के जयकारे लगे और फिर सब अपने-अपने घर लौट गए। रात्रि के दस बजे मंदिर सुनसान हो गया। केवल एक दीपक टिमटिमा रहा था। गर्भगृह में वही पुराना शिवलिंग, शांत, गंभीर। हरिराम और गौरी गर्भगृह के सामने बैठे थे। गौरी ने पूछा - "दादाजी, कथा कौन सुनाएगा? आप?" हरिराम ने कहा - "नहीं बेटा, मैं नहीं। वह सुनाएगा।" "वह कौन?" "शिवलिंग।" गौरी हँस पड़ी। "दादाजी, शिवलिंग कैसे बोलेगा? वह तो पत्थर है।" हरिराम ने कुछ नहीं कहा। उसने केवल आँखें बंद कर लीं और बोला - "ॐ नमः शिवाय।" हवा रुक गई। बेल के पत्तों की सरसराहट बंद हो गई। दीपक की लौ स्थिर हो गई, जैसे चित्र में जड़ी हो। और फिर... शिवलिंग बोला। वह मनुष्य की वाणी नहीं थी। वह पाषाण से आती हुई, पर पाषाण से परे, जल की धारा जैसी, आकाश की गहराई जैसी ध्वनि थी। "हरिराम... तू फिर आया है। और इस बार तू अकेला नहीं आया।" गौरी का शरीर सुन्न पड़ गया। भय से नहीं, आश्चर्य से। उसने दादा का हाथ कसकर पकड़ लिया। शिवलिंग फिर बोला - "बालिके, डर मत। मैं तुझे खा नहीं जाऊँगा। मैं तो केवल प्रेम की कथा सुनाने वाला एक बूढ़ा पाषाण हूँ।" 🚩तीसरा अध्याय - शिवलिंग द्वारा सुनाई गई प्रथम कथा - पार्वती का तप शिवलिंग ने कथा आरंभ की। "यह कथा उस समय की है जब सती ने दक्ष-यज्ञ में अपना शरीर त्याग दिया था। शिव... महायोगी शिव... श्मशान में बैठ गए। उन्होंने अपनी जटाओं को खोल दिया। नेत्र बंद कर लिए। सृष्टि शोक में डूब गई। देवता भयभीत हो गए। क्योंकि जब शिव ध्यान में चले जाते हैं, तो सृष्टि अनाथ हो जाती है। उधर हिमालय के घर एक पुत्री ने जन्म लिया - पार्वती। पर्वतराज हिमवान और मैना की पुत्री। बचपन से ही वह जानती थी - वह किसकी है। वह और किसी की नहीं हो सकती। नारद आए। उन्होंने हिमवान से कहा - 'तुम्हारी पुत्री का योग तो शिव से है, पर शिव तो वैरागी हैं। वे किसी को नहीं देखते।' पार्वती ने कहा - 'तो मैं उन्हें देखने पर विवश कर दूँगी।' और वह तप करने चली गई। वह तप कैसा था, जानते हो बालिके? उसने पहले सौ वर्षों तक केवल फल खाए। फिर सौ वर्षों तक केवल पत्ते। फिर सौ वर्षों तक केवल जल। और फिर... केवल वायु। और अंत में वायु भी छोड़ दी। उसका शरीर काँटा हो गया। उसकी साँसें धीमी पड़ गईं। पर उसके नेत्रों में एक ही छवि थी - ध्यानमग्न शिव। देवता शिव के पास गए - 'प्रभु, देखिए, एक बालिका आपके लिए मर रही है।' शिव ने नेत्र खोले। उन्होंने कहा - 'प्रेम परीक्षा माँगता है। जाओ, उसकी परीक्षा लो।' देवताओं ने सप्तर्षियों को भेजा। सप्तर्षि पार्वती के पास गए और बोले - 'अरे बालिके, तू किसके लिए तप कर रही है? वह शिव तो अमंगल वेशधारी है, श्मशान में रहता है, भूत-प्रेत उसके साथी हैं। तू तो राजकुमारी है, तुझे तो इंद्र जैसा पति मिल सकता है।' पार्वती ने क्या उत्तर दिया, जानते हो? उसने कहा - 'जिसे आप अमंगल कहते हैं, वही तो मंगल का मूल है। जो श्मशान में रहता है, वही तो जीवन-मृत्यु से परे है। मेरा प्रेम उसके रूप से नहीं, उसके सत्य से है। आप जाइए।' सप्तर्षि लौट गए। तब शिव स्वयं आए। एक वृद्ध ब्राह्मण के वेश में। 'माता, तुम्हें क्या चाहिए?' पार्वती ने कहा - 'मुझे शिव चाहिए।' ब्राह्मण हँस पड़ा - 'शिव? वह तो पागल है।' पार्वती क्रोधित हो गई। पहली बार तपस्विनी का क्रोध देखा गया। उसने कहा - 'मेरे शिव के बारे में एक शब्द भी और कहा, तो मैं तुम्हें भस्म कर दूँगी। मेरे शिव के लिए मैं सारी सृष्टि से लड़ जाऊँगी।' और उसी क्षण ब्राह्मण अपने वास्तविक रूप में आ गए। नीलकंठ, चंद्रशेखर, त्रिनेत्रधारी शिव। पार्वती की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। सौ वर्षों का तप एक क्षण में फलित हो गया। शिव ने कहा - 'पार्वती, मैं वैरागी हूँ। मेरे पास तुम्हें देने को कुछ नहीं।' पार्वती ने कहा - 'आपके पास आप हैं, मेरे लिए वही पर्याप्त है।' शिवलिंग चुप हो गया। दीपक की लौ फिर से फड़फड़ाने लगी। गौरी की आँखों में आँसू थे। उसने कभी ऐसी प्रेम-कथा नहीं सुनी थी। 🚩चौथा अध्याय - दूसरी कथा - गृहस्थ शिव थोड़ी देर बाद शिवलिंग फिर बोला। "लोग मुझे वैरागी कहते हैं। कहते हैं - शिव तो उदासीन हैं। पर कोई नहीं जानता - जब पार्वती आईं, तो वैरागी भी गृहस्थ बन गया। कैलाश पर कोई महल नहीं था। केवल बर्फ थी। पार्वती ने कहा - 'हम यहाँ कैसे रहेंगे?' शिव ने कहा - 'जहाँ प्रेम है, वही महल है।' पार्वती हँसी। उसने अपने हाथों से बर्फ को समेटा और एक घर बनाया। तुमने कभी शिव-पार्वती के झगड़े की कथा सुनी है बालिके? एक बार पार्वती ने कहा - 'आप सारा दिन समाधि में रहते हैं, मेरी ओर देखते भी नहीं।' शिव ने कहा - 'मैं समाधि में भी तुम्हें ही देखता हूँ।' पार्वती रूठ गई। वह मान-सरोवर के तट पर जाकर बैठ गई। शिव को मनाना नहीं आता था। वे बड़े-बड़े असुरों को जीत लेते थे, पर रूठी पत्नी को कैसे मनाएँ, यह नहीं जानते थे। वे पार्वती के पास गए और बोले - 'देवी, क्या चाहिए?' पार्वती ने कहा - 'मुझे कभी अकेला मत छोड़ना।' शिव ने वचन दिया - 'मैं तुम्हें अपने अंग में धारण कर लूँगा। अर्धनारीश्वर बन जाऊँगा, ताकि तुम कभी मुझसे अलग न हो।' और तब से शिव अर्धनारीश्वर कहलाए। दूसरी बार पार्वती ने कहा - 'आपके गण - भूत-प्रेत - मुझे डराते हैं।' शिव ने कहा - 'तो मैं तुम्हारे लिए नया गण बनाऊँगा - गणेश और कार्तिकेय। जो तुम्हारे पुत्र भी होंगे और मेरे गणों के स्वामी भी।' देखो बालिके, प्रेम क्या करता है? वैरागी को गृहस्थ बना देता है, अकेले को परिवार वाला बना देता है।" गौरी ने पूछा - "और पार्वती ने शिव के लिए क्या किया?" शिवलिंग हँसा। पाषाण के हँसने की ध्वनि कैसी होती है, गौरी ने पहली बार सुनी। "पार्वती ने क्या नहीं किया? जब शिव ने विष पिया - समुद्र मंथन का हलाहल - तो देवता भी भाग गए। पार्वती ने दौड़कर उनके कंठ को पकड़ लिया, ताकि विष नीचे न जाए। उनका कंठ नीला पड़ गया, पर संसार बच गया। जब शिव श्मशान में नृत्य करते - तांडव - तो पार्वती लास्य बनकर उनके साथ नाचतीं, ताकि सृष्टि का संतुलन बना रहे। शिव यदि प्रलय हैं, तो पार्वती सृजन हैं। शिव यदि मौन हैं, तो पार्वती वाणी हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है।" 🚩पाँचवाँ अध्याय - अंतिम कथा - क्यों सुनाता हूँ मैं यह कथा। रात्रि का तीसरा प्रहर हो चला था। गौरी ने पूछा - "हे शिवलिंग, आप हर महाशिवरात्रि पर यही कथा क्यों सुनाते हैं?" शिवलिंग कुछ देर मौन रहा। फिर बोला। "मैं... मैं वास्तव में शिवलिंग नहीं हूँ। मैं एक गंधर्व था। मेरा नाम चित्ररथ था। मुझे अपने संगीत पर बहुत अभिमान था। एक बार मैंने कैलाश पर जाकर शिव-पार्वती के सामने गर्व से कहा - 'मेरे जैसा गायक कोई नहीं।' पार्वती ने मुस्कुराकर कहा - 'सत्य प्रेम से बड़ा कोई संगीत नहीं।' मुझे क्रोध आ गया। मैंने कहा - 'प्रेम क्या होता है?' शिव ने कहा - 'तुम्हें जानना है तो पाषाण बनकर सुनो। हर वर्ष, जब प्रेम की रात्रि आए - महाशिवरात्रि - तब तुम शिव-पार्वती के प्रेम की कथा सुनाना। जब तक तुम प्रेम को समझ नहीं लोगे, तब तक तुम पाषाण ही रहोगे।' तब से मैं यहाँ हूँ। युगों से। हर महाशिवरात्रि पर मैं कथा सुनाता हूँ। और हर बार जब मैं कथा सुनाता हूँ, मैं थोड़ा-थोड़ा पाषाण से मनुष्य बनता जाता हूँ। हरिराम ने मेरी पहली कथा सुनी थी, तब मैं केवल पाषाण था। आज जब तू सुन रही है, तो मेरे भीतर हृदय धड़क रहा है।" गौरी ने देखा - सच में, शिवलिंग पर जो काई जमी थी, वह हट रही थी। वह थोड़ा-थोड़ा चमक रहा था। हरिराम ने हाथ जोड़ दिए। "हे गंधर्वराज, क्या आपका शाप समाप्त हुआ?" शिवलिंग बोला - "नहीं हरिराम, अभी एक कथा शेष है। वह कथा जो मैं स्वयं नहीं सुना सकता। वह कथा इसे सुनानी होगी।" "किसे? गौरी को?" "हाँ। जब यह बालिका बड़ी होकर किसी से सच्चा प्रेम करेगी - बिना स्वार्थ के, बिना शर्त के - तब इसे समझ आएगा कि शिव ने पार्वती के लिए क्या किया और पार्वती ने शिव के लिए क्या किया। उस दिन यह स्वयं यह कथा किसी और को सुनाएगी। और उस दिन मैं मुक्त हो जाऊँगा।" दीपक बुझने लगा। प्रभात होने वाला था। शिवलिंग ने अंतिम बार कहा - "बालिके, याद रखना - संसार में दो ही सत्य हैं - एक शिव का मौन और दूसरा पार्वती का प्रेम। जो इन दोनों को समझ ले, वह कभी दुखी नहीं होता।" और फिर सब शांत हो गया। सूर्य की पहली किरण बेल के पत्तों से छनकर शिवलिंग पर पड़ी। वह फिर से एक साधारण, काला, शांत शिवलिंग बन चुका था। हरिराम और गौरी बाहर आए। गाँव जाग रहा था। गौरी ने जीवन में पहली बार मंदिर को प्रणाम किया - केवल पत्थर समझकर नहीं, प्रेम समझकर। हरिराम काका उसी वर्ष वैकुंठवासी हो गए। पर मरने से पहले उन्होंने गौरी से कहा - "बेटा, अगले वर्ष महाशिवरात्रि पर तू फिर जाना। वह फिर बोलेगा।" गौरी आज भी जाती है। हर महाशिवरात्रि पर। वह अकेली बैठती है। और वह पुराना शिवलिंग आज भी उसे शिव-पार्वती की नई-नई कथाएँ सुनाता है। कभी उनके विवाह की, कभी उनके हास-परिहास की, कभी उनके मौन की। गाँव वाले कहते हैं - "गौरी पगली हो गई है, रातभर पत्थर से बातें करती है।" पर गौरी जानती है - वह पत्थर नहीं है। वह प्रेम का सबसे पुराना श्रोता और सबसे पुराना वक्ता है।और कहते हैं, जब तक इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति ऐसा होगा जो निःस्वार्थ प्रेम की कथा सुनना चाहता है, तब तक वह पुराना शिवलिंग हर महाशिवरात्रि पर पर बोलता रहेगा।617
- Mahesh Waghmare#श्री बाबा महाकाल नित्य भस्म श्रृंगार दर्शन..... #🔱हर हर महादेव #🙏महाकाल स्टेटस #🕉 महाकालेश्वर मंदिर🛕 #🙏ज्योतिर्लिंग दर्शन5968
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