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#shreemad bhagvad Geeta #Bhagvad Geeta ka Gyaan #bhagvad geeta #The Bhagvad geeta📙🕉️
shreemad bhagvad Geeta - श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 2 देही नित्यमवध्योउ्यं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि Il  हे अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीरोंमें सदा ही इस कारण सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये तू अवध्य * है शोक करनेके योग्य नहीं है Il ३० Il स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि| धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोउन्यकत्क्षत्रियस्य न विद्यते ।। ఖt గ तथा अपने धर्मको देखकर भय करनेयोग्य नहीं है अर्थात् तुझे चाहिये; ఖా 7థ7 करना धर्मयुक्त क्योंकि क्षत्रियके लिये युद्धसे d6${ दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है Il ३१ II स्वर्गद्वारमपावृतम्। aTqqa यदूच्छया सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदूशम् II  हे पार्थ ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्गके द्वाररूप इस   प्रकारके युद्धको भाग्यवान् ಖಞಾೆಗಗ್ೆ್ನ್ೆ ही पाते हैँ II ३२ II धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि अथ स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि 7: धर्मयुक्त  किन्तु ಶ೯ % 57 नहीं करेगा युद्धको तो स्वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त होगा Il ३३ Il जिसका  वध नहीं   किया মন্ধ | जा प्रेस , ள गोरखपुर से साभार श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 2 देही नित्यमवध्योउ्यं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि Il  हे अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीरोंमें सदा ही इस कारण सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये तू अवध्य * है शोक करनेके योग्य नहीं है Il ३० Il स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि| धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोउन्यकत्क्षत्रियस्य न विद्यते ।। ఖt గ तथा अपने धर्मको देखकर भय करनेयोग्य नहीं है अर्थात् तुझे चाहिये; ఖా 7థ7 करना धर्मयुक्त क्योंकि क्षत्रियके लिये युद्धसे d6${ दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है Il ३१ II स्वर्गद्वारमपावृतम्। aTqqa यदूच्छया सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदूशम् II  हे पार्थ ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्गके द्वाररूप इस   प्रकारके युद्धको भाग्यवान् ಖಞಾೆಗಗ್ೆ್ನ್ೆ ही पाते हैँ II ३२ II धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि अथ स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि 7: धर्मयुक्त  किन्तु ಶ೯ % 57 नहीं करेगा युद्धको तो स्वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त होगा Il ३३ Il जिसका  वध नहीं   किया মন্ধ | जा प्रेस , ள गोरखपुर से साभार - ShareChat