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#श्रीमद् भगवद गीता #गीता
श्रीमद् भगवद गीता - निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्चनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः Il हे जनार्दन ! धृतराष्ट्रके  मारकर हमें क्या पुत्रोंको प्रसन्नता होगी ? इन आततायियोँको मारकर तो हमें पाप ही लगेगा II ३६ ।। तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव I। धृतराष्ट्रके अतएव हे माधव ! अपने ही बान्धव मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैँ; क्योंकि अपने पुत्रोंको  ही कुटुम्बको मारकर हम कैसे ೫ ? Il 30 Il सुखी यद्यप्येते पश्यन्ति   लोभोपहतचेतसः न कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ।। पापादस्मान्निवर्तितुम्। कथं न ज्ञेयमस्माभिः कुलक्षयकृतं  प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।। ఢౌ यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग ` नाशसे कुलके उत्पन्न दोषको और मित्रोंसे विरोध करनेमें पापको নাহাম ওন্দল नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुलके दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके लिये क्योँ नहीं विचार करना चाहिये ? II ३८ ३९ II कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः कृत्स्नमधर्मोउभिभवत्युत I। धर्मे   नष्टे कुलं नाशसे सनातन कुल-धर्म नष्ट हा जाते कुलके সম্পুত  धर्मके नाश हो जानेपर पाप भी हैं ತಞೆ बहुत फैल जाता है ।l ४० Il गीता प्रेस , गोरखपुर से साभार निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्चनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः Il हे जनार्दन ! धृतराष्ट्रके  मारकर हमें क्या पुत्रोंको प्रसन्नता होगी ? इन आततायियोँको मारकर तो हमें पाप ही लगेगा II ३६ ।। तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव I। धृतराष्ट्रके अतएव हे माधव ! अपने ही बान्धव मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैँ; क्योंकि अपने पुत्रोंको  ही कुटुम्बको मारकर हम कैसे ೫ ? Il 30 Il सुखी यद्यप्येते पश्यन्ति   लोभोपहतचेतसः न कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ।। पापादस्मान्निवर्तितुम्। कथं न ज्ञेयमस्माभिः कुलक्षयकृतं  प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।। ఢౌ यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग ` नाशसे कुलके उत्पन्न दोषको और मित्रोंसे विरोध करनेमें पापको নাহাম ওন্দল नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुलके दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके लिये क्योँ नहीं विचार करना चाहिये ? II ३८ ३९ II कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः कृत्स्नमधर्मोउभिभवत्युत I। धर्मे   नष्टे कुलं नाशसे सनातन कुल-धर्म नष्ट हा जाते कुलके সম্পুত  धर्मके नाश हो जानेपर पाप भी हैं ತಞೆ बहुत फैल जाता है ।l ४० Il गीता प्रेस , गोरखपुर से साभार - ShareChat