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जलालुद्दीन रुमी का अनुवादित कलाम #सूफी काव्य
सूफी काव्य - "OdI" मैं उस दिन भी था जब कि अस्मा न थे निशान और वुजूद एन्मुसम्मा न था हुए मुझ से ज़ाहिर मुसम्मा ओ इस्म कि जब इम्तियाज़ एन्हम-ओ मैं न था ज़ुहूर ए-निशाँ था सर ए ्ज़ुल्फ़ ए॰्यार अभी वो सर-ए-ज़ुल्फ़ एनज़ेबा न था उसे मैं ने ढूँडा कलीसाओं में कलीसाओं में वो किसी जा न था उसे मंदिरों में किया फिर तलाश वहाँ रंग उस का हुवैदा न था हिरात और क़ंधार में की तलाश नहीं था कहीं ज़ेर ओनबाला न था मैं ने सर ए॰कोह ए॰्क़ाफ़ किया 'अज़्म भी बनजुज़ वहाँ जाए-ए- अन्क़ा न था 'इनान-एन्तलब सू॰एन्का'बा जो की वो उस जा-ए-अक़्दस में पैदा न था ये चाहा सुनूँ इब्न-एनसीना से हाल ब-अंदाज़ा ए इब्न एनसीना न था सू॰ए॰्मंज़र ए॰क़ाब ओ क़ौसें गया वो 'अज़्मत की उस बार्गह में न था नज़र अपने दिल पर अचानक पड़ी वहीं उस को देखा दिगर जा न था ब-जुज़ शशम्स ्तबरेज़' -एन्पाकीज़ा जॉां कोई मस्त ओ मख़मूर ओ -शैदा न था (अनुवादित रचना जलालुद्दीन रुमी) App Motivational Videos Want "OdI" मैं उस दिन भी था जब कि अस्मा न थे निशान और वुजूद एन्मुसम्मा न था हुए मुझ से ज़ाहिर मुसम्मा ओ इस्म कि जब इम्तियाज़ एन्हम-ओ मैं न था ज़ुहूर ए-निशाँ था सर ए ्ज़ुल्फ़ ए॰्यार अभी वो सर-ए-ज़ुल्फ़ एनज़ेबा न था उसे मैं ने ढूँडा कलीसाओं में कलीसाओं में वो किसी जा न था उसे मंदिरों में किया फिर तलाश वहाँ रंग उस का हुवैदा न था हिरात और क़ंधार में की तलाश नहीं था कहीं ज़ेर ओनबाला न था मैं ने सर ए॰कोह ए॰्क़ाफ़ किया 'अज़्म भी बनजुज़ वहाँ जाए-ए- अन्क़ा न था 'इनान-एन्तलब सू॰एन्का'बा जो की वो उस जा-ए-अक़्दस में पैदा न था ये चाहा सुनूँ इब्न-एनसीना से हाल ब-अंदाज़ा ए इब्न एनसीना न था सू॰ए॰्मंज़र ए॰क़ाब ओ क़ौसें गया वो 'अज़्मत की उस बार्गह में न था नज़र अपने दिल पर अचानक पड़ी वहीं उस को देखा दिगर जा न था ब-जुज़ शशम्स ्तबरेज़' -एन्पाकीज़ा जॉां कोई मस्त ओ मख़मूर ओ -शैदा न था (अनुवादित रचना जलालुद्दीन रुमी) App Motivational Videos Want - ShareChat