एक बार राजा प्रियव्रत ने देखा कि भगवान सूर्य सुमेरु की परिक्रमा करते हुए लोकालोकपर्यन्त पृथ्वी के जितने भाग को आलोकित करते हैं, उसमें से आधा ही प्रकाश में रहता है और आधे में अंधकार छाया रहता है, तो उन्होंने इसे पसन्द नहीं किया। तब उन्होंने यह संकल्प लेकर कि "मैं रात को भी दिन बना दूंगा"; सूर्य के समान ही वेगवान् एक ज्योतिर्मय रथ पर चढ़कर द्वितीय सूर्य की भांति उनके पीछे-पीछे पृथ्वी की सात परिक्रमाएं कर डाली। उस समय उनके रथ के पहिए से जो लीकें बनी, वह ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वी में सात द्वीप हो गए। उनके नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर द्वीप हैं। इनमें से पहले-पहले की अपेक्षा आगे-आगे के द्वीप का परिणाम दूना और ये समुद्र के बाहरी भाग में पृथ्वी के चारों ओर फैले हुए हैं। सात समुद्र क्रमशः खारे जल, ईख के रस, मदिरा, घी, दूध, मट्ठे और मीठे जल से भरे हुए हैं
श्रीमद्भागवत-महापुराण/५/१/३०-३२
श्रीमद्भागवत-महापुराण/5/1/30-32
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