#वामन अवतार
शीर्षक: ✨ सर्वस्व दान: जब तीनों लोकों के स्वामी को अपने भक्त के सामने झुकना पड़ा ✨
📖 वामन अवतार और भक्तराज बलि की कथा
असुर कुल में जन्म लेने के बाद भी राजा बलि महान भक्त प्रह्लाद के नाती थे। वे दानी, सत्यवादी और धर्मपरायण थे, लेकिन स्वर्ग पर अधिकार करने के अहंकार ने उन्हें घेर लिया था। देवताओं की माता अदिति की तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में अवतरित होकर इंद्र का राज्य लौटाएंगे।
🔥 तीन पग भूमि की मांग
भगवान ने एक छोटे से ब्राह्मण बालक 'वामन' का रूप धारण किया और राजा बलि की यज्ञशाला में पहुँच गए। उनके तेज से यज्ञ की अग्नि भी फीकी पड़ गई।
बलि ने पूछा, "हे ब्राह्मण कुमार! मांगो, क्या चाहिए?"
वामनदेव ने मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे केवल अपने पैरों से नापकर तीन पग भूमि चाहिए।"
बलि हंसे, "तीनों लोकों का राजा मैं, और तुम मांग रहे हो बस तीन कदम जमीन?"
तब वामनदेव ने कहा— "जो अपनी इंद्रियों को वश में नहीं रख सकता, उसे तीनों लोक मिलकर भी सुखी नहीं कर सकते। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।"
⚡ गुरु की चेतावनी और बलि का सत्य
गुरु शुक्राचार्य ने भगवान को पहचान लिया और बलि को रोका— "यह साक्षात विष्णु है, तुम्हारा सब कुछ हर लेंगे।"
लेकिन बलि का संकल्प अटूट था। उन्होंने कहा— "पृथ्वी ने कहा है कि वह पहाड़ों का बोझ सह सकती है, लेकिन एक झूठे व्यक्ति का भार नहीं। प्राण जाए पर वचन न जाए!"
👣 विराट रूप और तीसरा पग
संकल्प लेते ही छोटा सा वामन रूप विराट 'त्रिविक्रम' में बदल गया!
🔹 पहला पग: पूरी पृथ्वी नाप ली।
🔹 दूसरा पग: स्वर्ग और आकाश नाप लिया (ब्रह्मा जी ने इसी समय भगवान के चरण धोए, जिससे गंगा जी का जन्म हुआ)।
🔹 तीसरा पग: भगवान ने पूछा, "राजन! अब तीसरा पैर कहाँ रखूँ?"
🙏 आत्म-निवेदन (The Ultimate Surrender)
बलि रस्सियों में जकड़े थे, सब कुछ खो चुके थे, लेकिन फिर भी वे नहीं डगमगाए। उन्होंने सिर झुकाकर कहा—
"प्रभु! संपत्ति जाने के बाद भी स्वामी तो शेष रहता है। यह तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखिये। मैं खुद को आपको समर्पित करता हूँ।"
❤️ भगवान की हार और भक्त की जीत
बलि के इस त्याग ने भगवान को भी ऋणी बना दिया। भगवान ने कहा—
"हे बलि! मैं जिस पर कृपा करता हूँ, पहले उसका धन हर लेता हूँ, ताकि उसका अहंकार मिट जाए। आज तुमने मुझे जीत लिया है।"
भगवान ने बलि को पाताल से भी सुंदर 'सुतल लोक' का राज्य दिया और स्वयं गदा लेकर बलि के द्वारपाल बन गए।
✨ सार:
ईश्वर हमारी संपत्ति के नहीं, हमारे भाव और अहंकार-शून्य समर्पण के भूखे हैं।


