यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |
तं तमेवति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ||
कौन्तेय! मृत्यु के समय मनुष्य जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है।
तब तो बड़ा सस्ता सौदा है, आजीवन मौज करें और मरने लगें तो भगवान का स्मरण कर लेंगे। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं - ऐसा होता नहीं है, ' सदा तद्भावभावित:' - उस भाव का ही चिन्तन कर पाता है, जैसा जीवन भर किया है। वही विचार बरबस आ जाता है जिसका जीवन भर अभ्यास किया गया है, अन्यथा नहीं हो पाता।
श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ-गीता/८/६
स्वामी अड़गड़ानंद जी
यथार्थ गीता: स्वामी अड़गड़ानन्द जी। #swamiadgadanand #shrimadbhagwatgeeta #puranikyatra #mbapanditji #श्रीमद्भगवद्गीता #गीता #bhagwadgeeta
#bhavishypuran #vedpuran #puranam #upanishads
#shrimadbhagwat #shrimadbhagwatkatha #bhagwatkatha #bhagwat #bhagwatkathalive #भागवत #भागवतकथा #श्रीमद्भगवद्गीता #MBAPanditJi #jyotish #Palmistry #astrology #vastu
00:10

