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*🙏🏻 जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻*
🔅🔱🚩🌙 *श्री मद्भगवद्गीता🌞🔱🏛*
*पोस्ट संख्या :-* 2⃣3⃣5⃣
📖 *अध्याय -6अथ षष्ठोऽध्यायः- आत्मसंयमयोग*
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*श्लोक :-(6/29)* 📖
*सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।*
*ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।*
*भावार्थ:-(6/29)*
*सब जगह अपने स्वरूप को देखने वाला और ध्यानयोग से युक्त अन्तःकरण वाला योगी अपने स्वरूप को सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित देखता है और सम्पूर्ण प्राणियों को अपने स्वरूप में देखता है।*
*व्याख्या:-(6/29)*👇
*"ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः"सब जगह एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। जैसे मनुष्य खाँड़ से बने हुए अनेक तरह के खिलौनों के नाम रूप आकृति आदि भिन्न-भिन्न होने पर भी उनमें समान रूप से एक खाँड़ को लोहे से बने हुए अनेक तरह के अस्त्र शस्त्रों में एक लोहे को मिट्टी से बने हुए अनेक तरह के बर्तनों में एक मिट्टी को और सोने से बने हुए आभूषणों में एक सोने को ही देखता है ऐसे ही ध्यानयोगी तरह तरह की वस्तु व्यक्ति आदि में समरूप से एक अपने स्वरूप को ही देखता है।*
*"योगयुक्तात्मा"इसका तात्पर्य है कि ध्यानयोग का अभ्यास करते करते उस योगी का अन्तःकरण अपने स्वरूप में तल्लीन हो गया है। तल्लीन होने के बाद उसका अन्तःकरण से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है जिसका "संकेत सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि"पदों से किया गया है।"सर्वभूतस्थमात्मानम्"वह सम्पूर्ण प्राणियों में अपनी आत्मा को अपने सत्स्व रूप को स्थित देखता है।*
*जैसे साधारण प्राणी सारे शरीर में अपने आपको देखता है अर्थात् शरीर के सभी अवयवों में अंशों में मैं को ही पूर्ण रूप से देखता है ऐसे ही समदर्शी पुरुष सब प्राणियों में अपने स्वरूप को ही स्थित देखता है।किसी को नींद में स्वप्न आये तो वह स्वप्न में स्थावरजङ्गम प्राणी पदार्थ देखता है। पर नींद खुलने पर वह स्वप्न की सृष्टि नहीं दीखती अतः स्वप्नमें स्थावरजङ्गम आदि सब कुछ स्वयं ही बना है।*
*जाग्रत् अवस्था में किसी जड या चेतन प्राणी पदार्थ की याद आती है तो वह मन से दीखने लग जाता है और याद हटते ही वह सब दृश्य अदृश्य हो जाता है अतः याद में सब कुछ अपना मन ही बना है। ऐसे ही ध्यान योगी सम्पूर्ण प्राणियों में अपने स्वरूप को स्थित देखता है। स्थित देखने का तात्पर्य है कि सम्पूर्ण प्राणियों में सत्तारूप से अपना ही स्वरूप है। स्वरूप के सिवाय दूसरी कोई सत्ता ही नहीं है क्योंकि संसार एक क्षण भी एकरूप नहीं रहता प्रत्युत प्रतिक्षण बदलता ही रहता है। संसार के किसी रूप को एक बार देखने पर अगर दुबारा उसको कोई देखना चाहे तो देख ही नहीं सकता क्योंकि वह पहला रूप बदल गया। ऐसे परिवर्तन शील वस्तु व्यक्ति आदि में योगी सत्तारूप से अपरिवर्तन शील अपने स्वरूप को ही देखता है।*
*"सर्वभूतानि चात्मनि"-वह सम्पूर्ण प्राणियों को अपने अन्तर्गत देखता है अर्थात् अपने सर्वगत असीम सच्चिदानन्दघन स्वरूप में ही सभी प्राणियों को तथा सारे संसार को देखता है। जैसे एक प्रकाश के अन्तर्गत लाल पीला काला नीला आदि जितने रंग दीखते हैं वे सभी प्रकाश से ही बने हुए हैं और प्रकाश में ही दीखते हैं और जैसे जितनी वस्तुएँ दीखती हैं वे सभी सूर्य से ही उत्पन्न हुई हैं और सूर्य के प्रकाश में ही दीखती हैं ऐसे ही वह योगी सम्पूर्ण प्राणियों को अपने स्वरूप से ही पैदा हुए स्वरूप में ही लीन होते हुए और स्वरूप में ही स्थित देखता है। तात्पर्य है कि उसको जो कुछ दीखता है वह सब अपना स्वरूप ही दीखता है।इस श्लोक में प्राणियों में तो अपने को स्थित बताया है पर अपने में प्राणियों को स्थित नहीं बताया। ऐसा कहने का तात्पर्य है कि प्राणियों में तो अपनी सत्ता है पर अपने में प्राणियों की सत्ता नहीं है। कारण कि स्वरूप तो सदा एकरूप रहने वाला है पर प्राणी उत्पन्न और नष्ट होने वाले हैं। इस श्लोक का तात्पर्य यह हुआ कि व्यवहार में तो प्राणियों के साथ अलग-अलग बर्ताव होता है परन्तु अलग-अलग बर्ताव होने पर भी उस समदर्शी योगी की स्थिति में कोई फरक नहीं पड़ता।*
*सम्बन्ध --भगवान्ने चौदहवेंपन्द्रहवें श्लोकोंमें सगुणसाकारका ध्यान करनेवाले जिस भक्तियोगीका वर्णन किया था उसके अनुभवकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं।*
जय श्री कृष्ण
*कल पढ़िए 📖 *श्लोक* 6⃣/3⃣0⃣
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#श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान


