📚क्या हज़रत गौस ए पाक (रदी-अल्लाह-अन्ह.) की नियाज़ 11 तारीख़ से पहले या बाद में की जा सकती है? अगर 11 तारीख से पहले कर सकते है तो सब लोग 11 तारीख का इंतज़ार क्यो करते है..?📚
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पीराने पीर सैय्यदुना गौस-ए-आज़म दस्तगीर (रदी-अल्लाह-अन्ह अन्हु) और किसी भी औलिया ए किराम की नज़र व न्याज़ फातेहा दिलाना किसी भी महीने के किसी भी दिन जायज़,अच्छा और खुशी लाने वाला है।
👉🏽 दिन और तारीख का तय (नक्की)करना यह एक प्रथागत (रिवाज) है, शरइ (धार्मिक) नहीं।
रबीउल-अख़र की 11 तारीख़ को हज़रत गौस-ए-आज़म (रदी-अल्लाह-अन्ह ) की न्याज़ और फातेहा दिलाना इसलिए ज़्यादा मुनासिब है कि यह आम मुस्लिम समुदाय की प्रथा (रिवाज) के अनुसार है। वैसे तो औलिया अल्लाह और बुज़ुर्गाने दिन के नाम से मन्नत और न्याज़ फातेहा दिलाना किसी भी दिन, चाहे कोई भी तारीख या दिन या महीना हो, जायज़, अच्छा और खुशी लाने वाला है। चाहे कोई दिन तारीख तय (नक्की) हो या न हो।
बल्कि____.!!!
‼किसी विशेषता के कारण कोई तारीख तय/निर्धारित करना कोई हर्ज (समस्या) नहीं है, जबके उसे शरअन वाजिब न जाने।`
👉🏽 अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सोमवार और जुमेरात को नफिल रोज़ा रखते थे, लेकिन इससे कोई यह नहीं समझता कि अगर रविवार, मंगलवार को रोज़ा रखते तो यह रोज़ा नहीं होता, और न ही कोई यह समझता है कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) सोमवार और गुरुवार के रोज़ा को वाजिब मानते थे।
जैसा कि मिश्कात शरीफ मे हज़रत आयशा सिद्दीका (रदी-अल्लाह-अन्हा) से रिवायत किया है,
हज़रत आयशा ने कहा:
👉🏽अल्लाह के रसूल (ﷺ) सोमवार और गुरुवार को रोज़ा रखते थे, जैसा कि तिर्मिज़ी और निसाई ने रिवायत किया है।`
(📒खंड 1, पृष्ठ 180)
उपर्युक्त फ़तवे में चार या छह पंक्तियों के बाद, यह कहा गया है कि
👉🏽 रबी अल-अखर की ग्यारहवीं तारीख़ ग़ौस-ए-आज़म के नाम से फातेहा और न्याज़ दिलाना एक विशेष है, लेकिन यह रिवाज (प्रथागत) है, शरियत का क़ानून नहीं, `मतलब लोग यह न समझे के अन्य तारीखो, जैसे सत्रहवीं या अठारहवीं आदि पर फ़ातिहा पढ़ना जायज़ नहीं है।`
इसलिए _____.!!!
👉🏽 शरियत के कानून के अनुसार न्याज़ और फातेहा के लिए 11 तारीख़ या फिर कोई और ख़ास तारीख़ रखना और जानना ज़रूरी नहीं है और जो शरियत के कानून के अनुसार ज़रूरी समझे के फलां फलां तारीख और दिन मे ही नियाज़ फातेहा हो सकती है तो वह बस एक ग़लती पर है।`
📗(इसी तरह, फ़तवा रज़विया, खंड 4, पृष्ठ 224)
📘(और फ़तवा अमजदिया, खंड 1, पृष्ठ 354)
📕(फतवा मरकज़े तरबियत इफ्ता, खंड 1, पृष्ठ 654)
इस विवरण से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि
👉🏽अगर कोई हज़रत ग़ौस-ए-आज़म के लिए रबीउल आख़िरी की 11 तारीख़ से पहले या बाद में, किसी भी दिन या किसी भी महीने में नियाज़ दिलाएगा तो फ़ातिहा हो जाएगी।
👉रहा रबीउल-आखिर की 11 तारीख़ के इंतज़ार का सवाल तो चूँकि आम मुस्लिम जनता और बुज़ुर्गाने दिन उपरोक्त (11) तारीख़ पर गौस-ए-आज़म दस्तगीर (रदी-अल्लाह-अन्ह) की नियाज़ और फातेहा दिलाते आए हैं, इसलिए इस यादगार को जीवित रखने के लिए, प्रेमीजन यानी वलीयो से मुहब्बत रखने वाले इस तारीख़ (11) पर फ़ातिहा और नियाज़करते हैं और इंशाअल्लाह ऐसा करते रहेंगे।
अल्लाह पाक और उसके रसूल सबसे बेहतर जानते है
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❖ ꜰᴀᴄᴇʙᴏᴏᴋ || Chaudhary Abdul Aziz Rayeen ❖
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