‼️कैसे ऋषि ने एक मछली की वजह से अपना अध्यात्म भंग कर लिए थे‼️
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🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
राजा मान्धाता की पत्नी शशि-बिन्दुको पुत्री बिन्दुमती थी। उसके गर्भ से उनके तीन पुत्र हुए—पुरुकुत्स, अम्बरीष (ये दूसरे अम्बरीष हैं) और योगी मुचुकुन्द । इनको पचास बहनें थीं । उन पचासोंनें अकेले सौभरि ऋषिको पतिके रूपमें वरण किया ॥
परम तपस्वी सौभरिजी एक बार यमुनाजलमें डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्नियोंके साथ बहुत सुखी हो रहा है ॥ उसके इस सुखको देखकर ब्राह्मण सौभरिके मनमें भी विवाह करनेकी इच्छा जग उठी और उन्होंने राजा मान्धाता के पास आकर उनकी पचास कन्याओंमेंसे एक कन्या माँगी।
राजा ने कहा—ब्रह्मन् ! कन्या स्वयंवर में आपको चुन ले तो आप उसे ले लीजिये
सौभरि ऋषि राजा मान्धाता का अभिप्राय समझ गये। उन्होंने सोचा कि 'राजा ने इसलिये मुझे ऐसा सूखा जवाब दिया है कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, बाल पक गये हैं और सिर काँपने लगा है ! अब कोई स्त्री मुझसे प्रेम नहीं कर सकती ॥
अच्छी बात है। मैं अपनेको ऐसा सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिये लालायित हो जायेंगी।' ऐसा सोचकर समर्थ सौभरी जी ने वैसा ही किया ॥
फिर क्या था, अन्तःपुरके रक्षकों ने सौभरि मुनि को कन्याओं के सजे-सजा ये महल में पहुँचा दिया। फिर तो उन पचास राजकन्याओं ने एक सौभरि को ही अपना पति चुन लिया ॥ ॥
उन कन्याओंका मन सौभरिजी में इस प्रकार आसक्त हो गया कि वे उनके लिये आपसके प्रेमभाव को तिलांजलि देकर परस्पर कलह करने लगीं और एक-दसरी से कहने लगी कि 'ये तुम्हारे योग्य नहीं, मेरे योग्य हैं ॥
ऋग्वेदी सौभरि ने उन सभी का पाणिग्रहण कर लिया। वे अपनी अपार तपस्या के प्रभाव से बहुमूल्य सामग्रियों से सुसज्जित, अनेकों उपवनों और निर्मल जल से परिपूर्ण सरोवरों से युक्त एवं सौगन्धिक पुष्पों के बगीचों से घिरे महलों में बहुमूल्य शय्या, आसन, वस्त्र, आभूषण, स्नान, अनुलेपन, सुस्वादु भोजन और पुष्पमालाओं के द्वारा अपनी पत्नियों के साथ विहार करने लगे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये स्त्री-पुरुष सर्वदा उनकी सेवा में लगे रहते।
जैसे एक इंसान आग तृप्त नहीं होती, वैसे ही उन्हें सन्तोष नहीं हुआ ॥
ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्त से बैठे हुए थे। उस समय उन्होंने देखा कि मत्स्यराज के क्षण भर के संग से मैं किस प्रकार अपनी तपस्या तथा अपना आपा तक खो बैठा ॥
वे सोचने लगे— 'अरे, मैं तो बड़ा तपस्वी था। मैंने भलीभाँति अपने व्रतों का अनुष्ठान भी किया था। मेरा यह अधःपतन तो देखो ! मैंने दीर्घकाल से अपने ब्रह्मतेज को अक्षुण्ण रखा था, परन्तु जल के भीतर विहार करती हुई एक मछली के संसर्ग से मेरा वह ब्रह्मतेज नष्ट हो गया ॥
अतः जिसे मोक्ष की इच्छा है, उस पुरुष को चाहिये कि वह भोगी प्राणियों का संग सर्वथा छोड़ दे और एक क्षण के लिये भी अपनी इन्द्रियों को बहिर्मुख न होने दे। अकेला ही रहे और एकान्त में अपने चित्त को सर्वशक्तिमान् भगवान् में ही लगा दे। यदि संग करनेकी आवश्यकता ही हो तो भगवान् के अनन्य प्रेमी निष्ठावान् महात्माओं का ही संग करे ॥ ॥
मैं पहले एकान्त में अकेला ही तपस्या में संलग्न था। फिर जलमें मछली का संग होने से विवाह करके पचास हो गया और फिर सन्तानों के रूप में पाँच हजार । विषयों में सत्यबुद्धि होने से माया के गुणों ने मेरी बुद्धि हर ली। अब तो लोक और परलोक के सम्बन्ध में मेरा मन इतनी लालसाओं से भर गया है कि मैं किसी तरह उनका पार ही नहीं पाता ॥
इस प्रकार विचार करते हुए वे कुछ दिनों तक तो घर में ही रहे। फिर विरक्त होकर उन्होंने संन्यास ले लिया और वे वन में चले गये। अपने पति को ही सर्वस्व माननेवाली उनकी पत्नियाँ ने भी उनके साथ ही वन की यात्रा की ॥
वहाँ जाकर परम संयमी सौभरिजी ने बड़ी घोर तपस्या की, शरीर को सुखा दिया तथा आहवनीय आदि अग्नियों के साथ ही अपने-आपको परमात्म तत्त्व मेंलीन कर दिया॥
परीक्षित् ! उनकी पत्नियों ने जब अपने पति सौभरि मुनि की आध्यात्मिक गति देखी, तब जैसे ज्वालाएँ शान्त अग्नि में लीन हो जाती हैं—वैसे ही वे उनके प्रभाव से सती होकर उन्हीं में लीन हो गयीं, उन्हीं की गति को प्राप्त हुईं॥
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☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀
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