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#kath #🙏upnishadon ki or laute🙏 #🗞️18 जुलाई के अपडेट 🔴 #bhakti #by sameer dharmik
kath - कठउपनिषद 3.10.११ इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।  मनसश्च परा बुद्धि्बुद्धेरात्मा महान् परः I।१० ।। 319- ( इन्द्रियेभ्यः ) इन्द्रियों से (हि) निश्चय (3೫:) शब्दादि विषय (पराः) सूक्ष्म हैं (च) और (अर्थेभ्यः) विषयों ম (সন:) सूक्ष्म है (च) और (मनसः) मन से मन (परम ) ( बुद्धि: ) बुद्धि (परा) सूक्ष्म है (बुद्धेः) बुद्धि से ( महानात्मा ) महत्तत्व बुद्धि का कारण ( परः) 8 ೯ Il ೭೦ I महतः परमव्यक्तम् अव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः II ११ ।। ( महतः ) महत्तत्व से (अव्यक्तम् ) कारण रूप अप्रकट ( सूक्ष्म है) (अव्यक्तात्) अप्रकट प्रकृति से ( पुरुषः ) प्रकृति सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म ( परः) सूक्ष्म है (पुरुषात्) पुरुष से ( परम्) सूक्ष्म ( किञ्चित्, न) कुछ नहीं ( सा ) वही ( काष्ठा ) स्थिति की शोभा है (सा) वहीं (परा, गतिः) अन्तिम अवधि है ।।११ ।। उपनिषद् 37   aTaT # ন के &>)4 मनुष्य ठ्याख्या देते हुए ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के लिए उसकी ब्रह्म का पता ओर चलने निर्देश किया गया है- आत्मा के बाहर स्थूल c कठोपनिषद  169 और अन्दर सूक्ष्म  ब्रह्म है। इसलिए स्थूल को chTM प्रकृति की ओर छोड़ते हुए सूक्ष्मता चलने ही से उसकी प्राप्ति हो है।   इन्द्रिय , उसके   विषय, और बुद्धि , Tarira , सकती से क्रमशः सूक्ष्म हैं। स्थूल प्रकृति  अप्रकट अव्यक्त  7 Teh जगत् में सबसे अधिक सूक्ष्म  प्रकृति है। प्रकृति तक मनुष्य के शरीर में जिसका कारण शरीर है पहुँचकर ब्रह्मविद्या নাস 1 अपनी आधी मंजिल ( बहिर्मुखी   वृत्ति বরী   সপাদি पथिक लेता है। अब उसको उस कारण शरीर रूपी समाप्त कर T) प्रकृति से भी अधिक सूक्ष्म पुरुष ( ब्रह्मा) की ओर जीव की अन्तर्मुखी वृत्ति की जागृति के द्वारा , पड़ता है। यही चलना चरम सीमा है॰ इससे आगे 139 ಈೆ की अथवा पुरुषार्थों इससे सूक्ष्म और कुछ नहीं है ।। १०-११ ।। कठउपनिषद 3.10.११ इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।  मनसश्च परा बुद्धि्बुद्धेरात्मा महान् परः I।१० ।। 319- ( इन्द्रियेभ्यः ) इन्द्रियों से (हि) निश्चय (3೫:) शब्दादि विषय (पराः) सूक्ष्म हैं (च) और (अर्थेभ्यः) विषयों ম (সন:) सूक्ष्म है (च) और (मनसः) मन से मन (परम ) ( बुद्धि: ) बुद्धि (परा) सूक्ष्म है (बुद्धेः) बुद्धि से ( महानात्मा ) महत्तत्व बुद्धि का कारण ( परः) 8 ೯ Il ೭೦ I महतः परमव्यक्तम् अव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः II ११ ।। ( महतः ) महत्तत्व से (अव्यक्तम् ) कारण रूप अप्रकट ( सूक्ष्म है) (अव्यक्तात्) अप्रकट प्रकृति से ( पुरुषः ) प्रकृति सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म ( परः) सूक्ष्म है (पुरुषात्) पुरुष से ( परम्) सूक्ष्म ( किञ्चित्, न) कुछ नहीं ( सा ) वही ( काष्ठा ) स्थिति की शोभा है (सा) वहीं (परा, गतिः) अन्तिम अवधि है ।।११ ।। उपनिषद् 37   aTaT # ন के &>)4 मनुष्य ठ्याख्या देते हुए ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के लिए उसकी ब्रह्म का पता ओर चलने निर्देश किया गया है- आत्मा के बाहर स्थूल c कठोपनिषद  169 और अन्दर सूक्ष्म  ब्रह्म है। इसलिए स्थूल को chTM प्रकृति की ओर छोड़ते हुए सूक्ष्मता चलने ही से उसकी प्राप्ति हो है।   इन्द्रिय , उसके   विषय, और बुद्धि , Tarira , सकती से क्रमशः सूक्ष्म हैं। स्थूल प्रकृति  अप्रकट अव्यक्त  7 Teh जगत् में सबसे अधिक सूक्ष्म  प्रकृति है। प्रकृति तक मनुष्य के शरीर में जिसका कारण शरीर है पहुँचकर ब्रह्मविद्या নাস 1 अपनी आधी मंजिल ( बहिर्मुखी   वृत्ति বরী   সপাদি पथिक लेता है। अब उसको उस कारण शरीर रूपी समाप्त कर T) प्रकृति से भी अधिक सूक्ष्म पुरुष ( ब्रह्मा) की ओर जीव की अन्तर्मुखी वृत्ति की जागृति के द्वारा , पड़ता है। यही चलना चरम सीमा है॰ इससे आगे 139 ಈೆ की अथवा पुरुषार्थों इससे सूक्ष्म और कुछ नहीं है ।। १०-११ ।। - ShareChat