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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक२०८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अरण्यकाण्ड आठवाँ सर्ग प्रातःकाल सुतीक्ष्णसे विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीताका वहाँसे प्रस्थान सुतीक्ष्णके द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मणसहित श्रीराम उनके आश्रममें ही रात बिताकर प्रातःकाल जाग उठे॥१॥ सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मणने ठीक समयसे उठकर कमलकी सुगन्धसे सुवासित परम शीतल जलके द्वारा स्नान किया। तदनन्तर उन तीनोंने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओंकी प्रातःकालिक पूजा की। इसके बाद तपस्वीजनोंके आश्रयभूत वनमें उदित हुए सूर्यदेवका दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये और यह मधुर वचन बोले—॥२-४॥ 'भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हमलोगोंको पूजा की है। हम आपके आश्रममें बड़े सुखसे रहे हैं। अप हम यहाँसे जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं। ये मुनि हमें चलनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं॥५॥ हम लोग दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले पुण्यात्मा ऋषियोंके सम्पूर्ण आश्रममण्डलका दर्शन करनेके लिये उतावले हो रहे हैं॥६॥ 'अतः हमारी इच्छा है कि आप धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी, तपस्याद्वारा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले तथा नित्य-धर्मपरायण इन श्रेष्ठ महर्षियोंके साथ यहाँसे जानेके लिये हमें आज्ञा दें॥७॥ 'जैसे अन्यायसे आयी हुई सम्पत्तिको पाकर किसी नीच कुलके मनुष्यमें असह्य उग्रता आ जाती है, उसी प्रकार यह सूर्यदेव जबतक असह्य ताप देनेवाले होकर प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित न होने लगें, उसके पहले ही हम यहाँसे चल देना चाहते हैं।' ऐसा कहकर लक्ष्मण और सीतासहित श्रीरामने मुनिके चरणोंकी वन्दना की॥८-९॥ अपने चरणोंका स्पर्श करते हुए श्रीराम और लक्ष्मणको उठाकर मुनिवर सुतीक्ष्णने कसकर हृदयसे लगा लिया और बड़े स्नेहसे इस प्रकार कहा—॥१०॥ "श्रीराम! आप छायाकी भाँति अनुसरण करनेवाली इस धर्मपत्नी सीता तथा सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ यात्रा कीजिये। आपका मार्ग विघ्न बाधाओंसे रहित परम मङ्गलमय हो॥११॥ 'वीर! तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले दण्डकारण्यवासी इन तपस्वी मुनियोंके रमणीय आश्रमोंका दर्शन कीजिये॥१२॥ 'इस यात्रामें आप प्रचुर फल-मूलोंसे युक्त तथा फूलोंसे सुशोभित अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगोंके झुंड विचरते होंगे और पक्षी शान्तभावमे रहते होंगे॥१७॥ आपको बहुत-से ऐसे तालाब और सरोवर दिखायी देंगे, जिनमें प्रफुल्ल कमलोंके समूह शोभा दे रहे होंगे। उनमें स्वच्छ जल भरे होंगे तथा कारण्डव आदि जलपक्षी सब और फैल रहे होंगे॥१४॥ 'नेत्रोंको रमणीय प्रतीत होनेवाले पहाड़ी झरनों और मोरोंकी मीठी बोलीसे गूँजती हुई सुरम्य वनस्थलियोंको भी आप देखेंगे॥१५॥ 'श्रीराम! जाइये, वत्स सुमित्राकुमार! तुम भी जाओ। दण्डकारण्यके आश्रमोंका दर्शन करके आपलोगोंको फिर इसी आश्रममें आ जाना चाहिये'॥१६॥ उनके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने 'बहुत अच्छा' कहकर मुनिकी परिक्रमा की और वहाँसे प्रस्थान करनेकी तैयारी की॥१७॥ तदनन्तर विशाल नेत्रोंवाली सीताने उन दोनों भाइयोंके हाथमें दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और चमचमाते हुए खड्ग प्रदान किये॥१८॥ उन सुन्दर तूणीरोंको पीठपर बाँधकर टंकारते हुए धनुषोंको हाथमें ले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आश्रमसे बाहर निकले॥१९॥ वे दोनों रघुवंशी वीर बड़े ही रूपवान् थे, उन्होंने खड्ग और धनुष धारण करके महर्षिकी आज्ञा ले सीताके साथ शीघ्र ही वहाँसे प्रस्थान किया॥२०॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - हरि शरणं सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि रामकथा को न सुनै अस जानि सुरलोक सतसमाज q गोस्वामी जी कहते है कि रामजी की कथा कामधेनु गाय के समान है, जिसकी सेवा करने (श्रवण और मनन करने) से सभी सुख प्राप्त होते हैं। संतों का समाज ही सब प्रकार के सुखों को देने वाला देवलोक हैः ऐसा जानकर भला कौन श्रेष्ठ मनुष्य इस कथा को नहीं सुनेगा? अर्थात इस कथा और सत्संग का फल इतना महान है, तो कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इससे विमुख नहीं रह कल्याण का सबसे सुलभ सकता। यह मनुष्य के है। मार्ग हरि शरणं सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि रामकथा को न सुनै अस जानि सुरलोक सतसमाज q गोस्वामी जी कहते है कि रामजी की कथा कामधेनु गाय के समान है, जिसकी सेवा करने (श्रवण और मनन करने) से सभी सुख प्राप्त होते हैं। संतों का समाज ही सब प्रकार के सुखों को देने वाला देवलोक हैः ऐसा जानकर भला कौन श्रेष्ठ मनुष्य इस कथा को नहीं सुनेगा? अर्थात इस कथा और सत्संग का फल इतना महान है, तो कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इससे विमुख नहीं रह कल्याण का सबसे सुलभ सकता। यह मनुष्य के है। मार्ग - ShareChat