ShareChat
click to see wallet page
search
*शिक्षा का आचरण* *गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को पढ़ाया सत्यं-वद् और कहा इसे कल अच्छी तरह याद करके लाना। और सब लड़के तो उस चार अक्षर के पाठ को दूसरे दिन याद कर लाये, पर युधिष्ठिर ने कहा भगवान मुझे याद नहीं हुआ। गुरु ने कहा-अच्छा कल याद कर लाना। और विद्यार्थियों को उनसे अगला पाठ पढ़ा दिया। युधिष्ठिर से दूसरे दिन भी वह पाठ याद न हुआ। इस प्रकार कई दिन तक वे यही करते रहे। पाठ बहुत मुश्किल है, ठीक तरह याद नहीं होता। इस पर एक दिन गुरु जी ने उन्हें धमकाया कि इतने दिन हो गये, चार अक्षर का पाठ याद नहीं होता-क्या कारण है? युधिष्ठिर ने कहा-लिखने और पढ़ने की दृष्टि से वह पाठ जरा-सा था। दो मिनट में उसे याद किया जा सकता था पर इतने में क्या बनेगा? वह जीवन व्यवहार में आ जाय तभी उसका पढ़ना सार्थक है। मैं ‘सत्यं वद्-सत्य बोलो-की शिक्षा को अपने व्यवहार में ढाल रहा हूँ। पुरानी आदतों के कारण वह अभ्यास में नहीं आ पाता, इसी से देर हो रही है।* *गुरु द्रोणाचार्य ऐसे कर्मठ शिष्य को पाकर बढ़े प्रसन्न हुए। युधिष्ठिर ने सत्यं वद् का पाठ पढ़ा ओर ऐसा पढ़ा कि जीवन भर निभाता रहा।* *-रामकृपा-* #किस्से-कहानी