*पार्वती -शंकर की कथा*
*शिव-पार्वती (शिव-शक्ति) प्रेम, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है। सती के देह त्याग के बाद शिव ध्यानमग्न थे, तब हिमालय पुत्री पार्वती ने उन्हें पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। कामदेव के भस्म होने के बाद, पार्वती की अटूट भक्ति से द्रवित होकर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया, जिसे देवी-देवताओं ने दिव्य विवाह के रूप में मनाया।*
*पार्वती-शंकर की पौराणिक कथा के मुख्य बिंदु:-*
*सती का पुनर्जन्म: शिव की पहली पत्नी सती के आत्मदाह के बाद, उन्होंने राजा हिमालय और मैना के घर पार्वती (गौरी) के रूप में जन्म लिया।*
*शिव को पाने की तपस्या: बचपन से ही शिव के प्रति समर्पित पार्वती ने, शिव का ध्यान तोड़ने और उन्हें पाने के लिए वर्षों तक कठोर तप किया, जिसमें उन्होंने भोजन और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया।*
*कामदेव की भूमिका: देवताओं ने शिव को ध्यान से जगाने के लिए कामदेव को भेजा। शिव ने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को जला दिया, लेकिन पार्वती का प्रेम निस्वार्थ था।*
*शिव की परीक्षा: पार्वती की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए शिव ने खुद उनके पास जाकर अपने ही चरित्र की निंदा की, लेकिन पार्वती अपने निश्चयी प्रेम पर अडिग रहीं।*
*दिव्य विवाह: अंततः, पार्वती के प्रेम से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अपनी संगिनी स्वीकार किया। उनका विवाह एक भव्य और अनूठा उत्सव था, जिसमें देवता, ऋषि और अजीबोगरीब गण शामिल हुए।*
*पार्वती और शंकर का मिलन केवल विवाह नहीं, बल्कि चेतना (शिव) और ऊर्जा (शक्ति) का एकाकार होना है।*
*-जय शिव -* #किस्से-कहानी