बिनोद कुमार शर्मा
ShareChat
click to see wallet page
@binod5
binod5
बिनोद कुमार शर्मा
@binod5
आई लव शेयरचैट
*🌳 रामायण की एक चौपाई का रहस्य 🌳* *श्री रामकथा में श्रीराम के एवं भरतजी के चरित्र की मार्मिक कथाएँ पत्थर को भी पिघलाने वाली हैं। श्रीराम के वनगमन हो जाने तथा महाराज दशरथजी के परलोक गमन के पश्चात् भरत और शत्रुघ्न के ननिहाल से लौटने के उपरान्त ही भरतजी के चरित्र की विशेषताओं की झलक मानस में यत्र-तत्र-सर्वत्र अपनी अमित छाप छोड़ती चली जाती है। भरत श्रीराम को महल में न देखकर अत्यन्त ही दु:खी हो जाते हैं। माता कैकेयी भरत को प्रसन्न करने के लिये सारी कथा सुना देती हैं। तब भरत दु:खी होकर उससे कहते हैं-* *बर माँगत मन भइ न पीरा।* *गरि न जीह मुँह परेउ न कीरा।।* *अरि बेरिन महाराज दशरथजी से दो वर माँगते हुए तुझे पीड़ा नहीं हुई। प्रथम वर में राज्य माँगते हुए तेरी जिव्हा गल क्यों नहीं गई तथा दूसरे वर में श्रीराम को वनवास माँगते हुए तेरे मुँह में कीड़े क्यों नहीं पड़ गये।* *भरतजी ने मात्र इतना ही नहीं उससे भी अधिक माता कैकेयी को जो कुछ कहा वह श्रीरामचरित मानस में गूढ़ गम्भीर-चिन्तन-मनन करने का विषय है-* *हंसबंसु दशरथु जनकु, राम लखन से भाइ।* *जननी तूँ जननी भई, बिधि सन कछु न बसाइ।।* *भरत जी माता कैकेयी से कहते हैं मुझे सूर्यवंश, दशरथजी जैसे पिता और श्रीराम-लक्ष्मण जैसे भाई मिले, किन्तु हे जननी। मुझे जन्म देने वाली माता तू हुई।* *क्या किया जाय विधाता के आगे किसी का कुछ भी वश नहीं चलता है-* *इस दोहे को वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में सर्ग 35 के सन्दर्भ में देखा जाए तो ऐसा भी संकेत एवं भावार्थ हो सकता है। भरत अपनी माता कैकेयी से कहते हैं कि हे माँ तू अपनी माता (नानी) के समान हो गई तथा जैसी तेरी माता माता न होकर कुमाता थी, तू ऐसी ही हो गई। इस कुमाता के प्रसंग को वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के वनगमन के प्रसंग में मंत्री सुमंत एवं कैकेयी के बीच एक अन्तर्कथा के माध्यम से किया गया है-* *ऐसी कथा आती है की कैकयी के पिता अश्वपति को एक महात्मा से वरदान मिला था वह पृथ्वी पर जितने भी जीव-जन्तु, कीड़े- मकोड़े, पशु-पक्षी सभी की आवाज सुन और समझ सकते थे,,लेकिन इस वरदान के साथ एक श्राप भी था कि.. वह इन सब की बाते किसी को भी बताएंगे तो उनकी उसी वक्त मृत्यु हो जाएगी..* *एक बार कैकय नरेश कैकयी की माँ पृत्वी के साथ चौके में बैठकर भोजन कर रहे थे। एक चींटी चावल का एक दाना लेकर जा रही थी चौके के बाहर दूसरी चीटी ने विनम्रता पूर्वक कहा-ये दाना मुझे दे दो, वो बोली-तुम अंदर जाकर ले आओ, उसने कहा कि मै गन्दगी से गुजरकर आई हूं अतः अपवित्र हूं, चौके मैं नहीं जा सकती। पहली चींटी ने सहृदता का परिचय देकर दाना उसे सौप दिया और फिर दूसरा दाना लेने चौके में लौट आई।* *यह संवाद सुनकर कैकय नरेश ने अनुभव किया कि मेरे राज्य की चींटियां भी पवित्रता-अपवित्रता का कितना ख्याल करती है। वे एकाएक हंसने लगे। महारानी पृथ्वी ने उनकी प्रसन्नता का कारण जानना चाहा,,महाराज ने कहा में अगर बताऊंगा तो मेरी मृत्यु हो जाएगी लेकिन कैकयी की माँ को कुछ संदेह था और वो हठ करने लगी जिद्द पर अड़ गई मुझे बताइए,,बार बार राजा के समझाने पर भी रानी पृथ्वी ने हठ नही छोड़ी,,यहाँ तक कह दिया तुम जियो या मरो मुझे कोई फर्क नही पड़ता किन्तु मुझे ये चींटिया क्या बोल रही थी वो बताओ,,,तुरन्त राजा उन महात्मा जी के पास गए और सारी कहानी महात्मा जी को बताई कैसे रानी कोप भवन में जिद्द पर अड़ी बैठी है,,,महाराज कोई उपाय बताइए,,महात्मा जी ने पुनः दोहराया राजन वचन बदला नही जा सकता,,,यह सत्य है अगर आपने किसी को कुछ भी बताया तो उसी वक्त आपकी मृत्यु हो जाएगी अब निर्णय आपको लेना है,,,बहुत सोच विचार कर राजा ने रानी का परित्याग कर राज्य से बाहर कर दिया वे जान गए थे मेरी पत्नी को मेरे जीवन मेरी भलाई की कोई चिंता नही है,,इसी बात को भरत जी कहते है,,तुम्हारे पिता तो सही समय पर उचित निर्णय लेकर बच गए किन्तु मेरे पिता महाराज दशरथ तो बड़े सीधे और भोले है तेरी कुटिलता को समझ नही पाए तेरे पिता की तरह अगर निर्णय ले लेते तो उनके भी प्राण बच जाते,,,जननी तू जननी भई...* *-रामकृपा-* #किस्से-कहानी
#👌 अच्छी सोच👍
👌 अच्छी सोच👍 - इंसान सही हाे तो उसके साथ गरीबी भी...  खुशी कट जाती है इंसान गलत हो तो... अमीरी भी తాeit बड़ी मुश्किल से कटती है.।-रामकृपा * अपने आपको किसो ना किसो काम मे व्यस्त रखो... क्योंकि व्यस्त इंसान को दुखी होने का समय नही मिलता../-रामकृपा ' इंसान सही हाे तो उसके साथ गरीबी भी...  खुशी कट जाती है इंसान गलत हो तो... अमीरी भी తాeit बड़ी मुश्किल से कटती है.।-रामकृपा * अपने आपको किसो ना किसो काम मे व्यस्त रखो... क्योंकि व्यस्त इंसान को दुखी होने का समय नही मिलता../-रामकृपा ' - ShareChat
🌹🌷🙏 #शुभ शनिवार 🙏🌷🌹
शुभ शनिवार - शुभ शनिवार 28/02/26 सुप्रभातम् जयःश्री राम ಿi श शनिदेवाय शनेश्चराय नम FH: श्री राम दूताय नमः शनिदेव तथा हर्नुमान जी आप का eit सदैव रक्षा एवं कल्याण करें। रामकृपा- रविपुत्र नीलांजनसमाभासं मर्कटेशं महोत्साहं सर्व यमाग्रजम. छायामार्तंड शत्रुहर परम्।। सम्भूतं नं नमामि शत्रुं संहर मां रक्ष शनैश्वरम। श्रीमन्नापदमैुद्धर। शुभ शनिवार 28/02/26 सुप्रभातम् जयःश्री राम ಿi श शनिदेवाय शनेश्चराय नम FH: श्री राम दूताय नमः शनिदेव तथा हर्नुमान जी आप का eit सदैव रक्षा एवं कल्याण करें। रामकृपा- रविपुत्र नीलांजनसमाभासं मर्कटेशं महोत्साहं सर्व यमाग्रजम. छायामार्तंड शत्रुहर परम्।। सम्भूतं नं नमामि शत्रुं संहर मां रक्ष शनैश्वरम। श्रीमन्नापदमैुद्धर। - ShareChat
#जय महाकाल दर्शन।।
जय महाकाल दर्शन।। - जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* ख फाल्गुन, शुक्ल पक्ष, तिथि -आमलकी एकादशी, संवत् २०८२, दिन -शुक्रवार, २७ फरवरी २०२६७ * ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आरती दर्शन  जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* ख फाल्गुन, शुक्ल पक्ष, तिथि -आमलकी एकादशी, संवत् २०८२, दिन -शुक्रवार, २७ फरवरी २०२६७ * ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आरती दर्शन - ShareChat
*धनलक्ष्मी: माँ लक्ष्मी का दूसरा अवतार* *हिंदू पौराणिक कथाओं में, भगवान विष्णु की दिव्य पत्नी और धन, समृद्धि, सौभाग्य और आध्यात्मिक प्रचुरता की देवी माँ लक्ष्मी को अष्ट लक्ष्मी (लक्ष्मी के आठ स्वरूप) के रूप में पूजा जाता है। ये स्वरूप समृद्धि के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं, जैसे भौतिक धन, साहस, और ज्ञान। जहाँ लक्ष्मी का प्राथमिक अवतरण सतयुग में समुद्र मंथन के दौरान हुआ था, वहीं उनके विभिन्न अवतार युगों के माध्यम से भक्तों का मार्गदर्शन और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होते हैं।* *धनलक्ष्मी को अष्ट लक्ष्मी के क्रम में दूसरा स्वरूप माना जाता है, जो आदि लक्ष्मी (प्रथम स्वरूप) के बाद आती हैं। यह स्वरूप धन (आर्थिक समृद्धि और वित्तीय स्थिरता) का प्रतीक है। भक्त धनलक्ष्मी की पूजा समृद्धि में आने वाली बाधाओं को दूर करने, प्रचुरता को आकर्षित करने और नैतिक रूप से धन संचय के लिए करते हैं।* *धनलक्ष्मी की कहानी विष्णु के प्रमुख अवतारों (जैसे सीता या रुक्मिणी) से नहीं जुड़ी, बल्कि यह एक दिव्य तपस्या, अस्थायी निर्वासन और वैकुंठ की समृद्धि की पुनर्स्थापना से संबंधित है। यह कथा, जो पुराणों और मंदिरों की परंपराओं से ली गई है, यह सिखाती है कि सच्चा धन भक्ति, विनम्रता और धर्मपरायण जीवन से प्राप्त होता है—यह शिक्षाएँ दीपावली जैसे त्योहारों में लक्ष्मी की पूजा का आधार हैं।* *वैकुंठ में विवाद: लक्ष्मी का प्रस्थान* *वैकुंठ के दिव्य लोक में, भगवान विष्णु अपनी प्रिय लक्ष्मी के साथ अनंत वैभव में निवास करते हैं। वहाँ के महल रत्नों से चमकते हैं, अमृत की नदियाँ बहती हैं, और हर कोने में सोना, रत्न और ऐश्वर्य भरा है। लक्ष्मी, समृद्धि की पोषक के रूप में, इस अनंत वैभव को सुनिश्चित करती हैं और देवताओं व समस्त सृष्टि पर अपनी कृपा बरसाती हैं।* *लेकिन एक दिन, इस दिव्य दंपति के बीच मतभेद उत्पन्न हुआ। एक कथा के अनुसार, लक्ष्मी को लगा कि अंतहीन उत्सवों और देवताओं के बढ़ते अहंकार के बीच उनकी उपेक्षा हो रही है (यह वही अहंकार था जिसके कारण समुद्र मंथन में लक्ष्मी ने इंद्र को त्याग दिया था)। एक अन्य कथा में, विष्णु के अपने भक्तों के साथ खेल-कूद में व्यस्त होने से उत्पन्न छोटा-सा विवाद बढ़ गया। क्रोधित और उपेक्षित महसूस करते हुए, लक्ष्मी ने कहा, "यदि मेरी उपस्थिति का कोई मूल्य नहीं, तो मैं चली जाऊँगी और देखूँगी कि बिना मेरे वैकुंठ कैसे समृद्ध रहता है।"* *अपने वचन के अनुसार, लक्ष्मी एक तेजस्वी प्रकाश के साथ वैकुंठ से लुप्त हो गईं। तत्काल परिणाम भयावह थे। स्वर्णिम महल पत्थरों में बदल गए, अमृत की नदियाँ सूखकर राख हो गईं, खिले हुए कमल मुरझा गए, और रत्नों के ढेर सामान्य कंकड़ बन गए। वैकुंठ में अभाव की भारी हवा बहने लगी, और यहाँ तक कि देवताओं के परिचारक भी गरीबी में भटकने लगे, उनके रेशमी वस्त्र फट गए। भगवान विष्णु, विश्व के पालक, स्वयं अभाव की स्थिति में आ गए। उनकी दिव्य आभा धूमिल हो गई, और वे साधारण साधक की तरह वैकुंठ के हॉल में भटकने लगे।* *अपनी भूल समझकर, विष्णु ने लक्ष्मी को बलपूर्वक नहीं, बल्कि भक्ति से वापस लाने का संकल्प लिया। वे वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी और स्वर्गीय लोकों में उनकी खोज में निकल पड़े, अपनी अनंत भक्ति सिद्ध करने का प्रण लेकर।* *कुबेर की तपस्या: धनलक्ष्मी का आह्वान* *इस बीच, पाताल लोक में यक्षों के राजा कुबेर—जो पृथ्वी के गुप्त खजानों के रक्षक थे और देवताओं के भक्त—ने सृष्टि में असंतुलन को महसूस किया। कुबेर, जो अपनी अलका नगरी में अपार धन के लिए प्रसिद्ध थे, लक्ष्मी के साथ अपने बंधन को और गहरा करना चाहते थे ताकि उनकी कृपा सदा बनी रहे। लक्ष्मी की अनुपस्थिति से उत्पन्न अभाव (जो पृथ्वी पर भी सूखे और गरीबी के रूप में प्रकट हुआ) से प्रेरित होकर, उन्होंने कठोर तपस्या शुरू की।* *हजारों वर्षों तक, कुबेर ने हिमालय की गुफाओं में श्री सूक्त (लक्ष्मी को समर्पित वैदिक भजन) का जाप करते हुए तप किया। उन्होंने कमल के हार चढ़ाए, दूध और शहद की आहुति दी, और अपने सारे भौतिक धन का त्याग करते हुए कहा, "हे धन की माता, यदि मैं केवल खजानों का रखवाला हूँ, तो मुझे आपकी प्रत्यक्ष सेवा करने दें।" उनकी अटल भक्ति ने माया के पर्दे को भेद दिया, और अंततः लक्ष्मी उनके सामने स्वर्णिम तेज में प्रकट हुईं।* *कुबेर की निःस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर, लक्ष्मी ने अपने प्रथम स्वरूप में नहीं, बल्कि धनलक्ष्मी के रूप में दर्शन दिए—जो असीम आर्थिक समृद्धि की दात्री हैं। लाल साड़ी में स्वर्णिम कढ़ाई के साथ सजी, उनके छह हाथों में शंख (शुभता के लिए), चक्र (सुरक्षा के लिए), कलश (अमृत से भरा), धनुष-बाण (बाधाओं पर विजय के लिए), कमल (पवित्रता के लिए), और अभय मुद्रा में एक हाथ था, जिससे स्वर्ण सिक्कों की वर्षा हो रही थी, मानो समृद्धि का मॉनसून हो।* *कुबेर ने साष्टांग प्रणाम किया और प्रार्थना की, "दिव्य माता, मेरे महल को अपनी शाश्वत उपस्थिति से कृतार्थ करें। मुझे आपका विनम्र सेवक बनने दें।" लक्ष्मी, उनकी निःस्वार्थता से प्रभावित होकर, बोलीं, "तुम धन, आठ सिद्धियों और नौ निधियों के शाश्वत संरक्षक बनोगे। परंतु यह जान लो—मेरा निवास भक्ति पर निर्भर है, स्वामित्व पर नहीं। संग्रह नहीं, वितरण करो; यश नहीं, सेवा की तलाश करो।"* *इस प्रकार, धनलक्ष्मी ने कुबेर के महल में निवास किया, जिससे अलका नगरी समृद्धि का प्रकाशस्तंभ बन गई। सोने की नदियाँ बहीं, और यक्ष आनंद में नृत्य करने लगे। कुबेर का शासन उदार धन वितरण का प्रतीक बन गया, जिसने देवताओं, मनुष्यों और यहाँ तक कि निम्न प्राणियों की भी सहायता की।* *विष्णु की खोज और दिव्य पुनर्मिलन* *शुरू में धनलक्ष्मी के प्रकट होने से अनजान, विष्णु अपनी खोज में भटकते रहे। उन्होंने तीनों लोकों—पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल—की यात्रा एक साधारण यात्री के रूप में की। कुछ कथाओं में, ऋषि नारद ने उन्हें कुबेर की तपस्या का संकेत दिया। एक आंतरिक प्रेरणा से खिंचे चले, विष्णु एक थके हुए यात्री के वेश में अलका नगरी पहुँचे।* *कुबेर के भव्य महल में प्रवेश करते ही, विष्णु ने धनलक्ष्मी को भक्तों पर धन की वर्षा करते देखा। तुरंत ही पहचान हुई। लक्ष्मी ने अपने प्रभु को विनम्र रूप में देखा, और उनकी आँखों से अमृत की अश्रुधारा बही। "मेरे शाश्वत साथी," उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, "आपकी खोज ने स्वर्ग को विनम्र कर दिया। प्रेम के बिना धन केवल धूल है, जैसा मैंने दिखाया।"* *कुबेर, इस दिव्य नाटक को समझकर, अपने महल और खजाने दंपति को समर्पित कर दिए। विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया, उनके धन के संरक्षक के रूप को स्वीकार करते हुए, और साथ में वे वैकुंठ लौट आए। लक्ष्मी की कृपा के पुनर्स्थापित होने से वैकुंठ पहले से भी अधिक भव्य हो उठा। इस घटना ने देवताओं (और भक्तों) को सिखाया कि भक्ति के बिना समृद्धि क्षणभंगुर है; अहंकार हानि को आमंत्रित करता है, परंतु सच्ची तपस्या प्रचुरता को लाती है।* *धनलक्ष्मी की मूर्ति और पूजा* *धनलक्ष्मी को छह भुजाओं वाली, तेजस्वी और करुणामयी देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जो स्वर्ण सिंहासन या खिले हुए कमल पर विराजमान हैं। उनकी लाल साड़ी समृद्धि के प्रति उत्साह का प्रतीक है, और उनके हाथ से बहने वाले स्वर्ण सिक्के अक्षय धन का प्रतीक हैं। उनके साथ हाथी (गज) पवित्र जल छिड़कते हैं, जो उनके गज लक्ष्मी स्वरूप को दर्शाता है।* *भक्त शुक्रवार को, दीपावली की लक्ष्मी पूजा के दौरान, या विशेष होम (अग्नि अनुष्ठान) के माध्यम से उनकी पूजा करते हैं ताकि वित्तीय बाधाओं को दूर करें। धनलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ और मिठाई व सिक्कों का भेंट उनकी कृपा को आमंत्रित करता है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मंदिरों में उनकी मूर्तियाँ स्थापित हैं, जहाँ कुबेर की तपस्या की कथाएँ सुनाई जाती हैं।* *धनलक्ष्मी की यह कथा एक गहन सत्य को रेखांकित करती है: धन एक साध्य नहीं, बल्कि धर्म, साझा आनंद और आध्यात्मिक विकास का साधन है। दूसरे अवतार के रूप में, वे लक्ष्मी के शाश्वत सार को प्रचुरता की व्यावहारिक खोज से जोड़ती हैं, यह याद दिलाते हुए कि सच्चा सौभाग्य हृदय की भक्ति में निहित है।* *-जय मां लक्ष्मी -* #किस्से-कहानी
#👌 अच्छी सोच👍
👌 अच्छी सोच👍 - *मन की अप्रसत्नता में चेहरे का सौंदर्य कोई मायने नहीं रखता है। जीवन वही सुंदर है जिसमें चेहरे पर खूबसूरती हो या न हो मगर हृदय में प्रसन्नता अवश्य प्रसन्नता ही तो जीवन का सौंदर्य है।-रामकृपा * Bfl * जोवन में सदैव श्रेष्ठ का संग करें!" ऐसा जीवन जिएं कि, यदि कोई आपकी बुराई भी करे तो , कोई उस पर নিংব্রাম্ না ক্রই"!!-যমক্বৃত্া* *मन की अप्रसत्नता में चेहरे का सौंदर्य कोई मायने नहीं रखता है। जीवन वही सुंदर है जिसमें चेहरे पर खूबसूरती हो या न हो मगर हृदय में प्रसन्नता अवश्य प्रसन्नता ही तो जीवन का सौंदर्य है।-रामकृपा * Bfl * जोवन में सदैव श्रेष्ठ का संग करें!" ऐसा जीवन जिएं कि, यदि कोई आपकी बुराई भी करे तो , कोई उस पर নিংব্রাম্ না ক্রই"!!-যমক্বৃত্া* - ShareChat
🌹🌷🙏 #शुभ शुक्रवार 🙏🌷🌹
शुभ शुक्रवार - शुभ शुक्रवार 3 श्रीं श्रियै नमः 27/02/26 सुप्रभात రేశాా जय माता दी ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह नमः महालक्ष्म्यै 30 धरणेंद्र पद्मावती सहिते हूं श्री नमः| रमकृपा- महालक्ष्मी जी आपको सदा मा सुख शांति एवं समृद्धि प्रदान करें शुभ शुक्रवार 3 श्रीं श्रियै नमः 27/02/26 सुप्रभात రేశాా जय माता दी ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह नमः महालक्ष्म्यै 30 धरणेंद्र पद्मावती सहिते हूं श्री नमः| रमकृपा- महालक्ष्मी जी आपको सदा मा सुख शांति एवं समृद्धि प्रदान करें - ShareChat
#जय महाकाल दर्शन।।
जय महाकाल दर्शन।। - जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज ३का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* ः फाल्गुन, शुक्ल पक्ष, तिथि - दशमी, संवत् २०८२, दिन -बृहस्पतिवार, २६ फरवरी २०२६७ * ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आरती दर्शन % 43 63 जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज ३का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* ः फाल्गुन, शुक्ल पक्ष, तिथि - दशमी, संवत् २०८२, दिन -बृहस्पतिवार, २६ फरवरी २०२६७ * ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आरती दर्शन % 43 63 - ShareChat
*सफलता का अभिमान* *दरोगा पत्नी ने बेरोज़गार पति को अपमानित किया 5 मिनट बाद SP आए और सैल्यूट किया पूरा थाना सन्न रह गया...!!* *अहंकार की वर्दी और स्वाभिमान का सैल्यूट: एक अनकही दास्तान...!!* *मधुपुर गाँव में सुबह की शुरुआत मिठाई की दुकान से उठने वाली इलायची और केसर की खुशबू से होती थी। राघव, एक साधारण कद-काठी का युवक, जिसके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी, अपने पिता मोहन साहब की मदद करता था। राघव केवल एक हलवाई का बेटा नहीं था, वह गाँव की उम्मीद था।* *यूपीएससी (UPSC) की तैयारी के लिए जब वह दिल्ली गया, तो उसके पास जेब में कम और आँखों में सपने ज्यादा थे...!!* *दिल्ली के मुखर्जी नगर की एक छोटी सी कोठरी में राघव ने सात साल बिताए। वहीं उसकी मुलाकात अभिषेक से हुई। अभिषेक के पास प्रतिभा थी, लेकिन संसाधन नहीं। राघव अक्सर अपनी रातों की नींद और ट्यूशन के पैसे अभिषेक की फीस के लिए दे देता था। वह कहता, “दोस्त, आज तू पढ़ ले, कल जब तू अफसर बनेगा तो देश का भला होगा।” राघव का खुद का चयन नहीं हुआ, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। वह मधुपुर लौटा ताकि अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बन सके...!!* *गाँव लौटने के बाद राघव की शादी निधि से हुई। निधि एक महत्वाकांक्षी लड़की थी। शादी के ही दिन जब निधि के दरोगा बनने की खबर आई, तो राघव ने उसे अपनी जीत माना। उसने तय किया कि वह घर संभालेगा ताकि निधि अपनी ड्यूटी पूरी निष्ठा से कर सके....!!* *निधि की पोस्टिंग शहर के एक प्रमुख थाने में हुई। राघव हर सुबह 4 बजे उठता, निधि के लिए नाश्ता बनाता, उसकी वर्दी प्रेस करता और दोपहर का गर्म खाना लेकर थाने पहुँचता। लेकिन धीरे-धीरे निधि के व्यवहार में जहर घुलने लगा। उसे अब राघव की सादगी “गँवारपन” लगने लगी। वह अपने सहकर्मियों के सामने राघव को अपना पति बताने में शर्म महसूस करने लगी...!!* *एक दिन जब राघव टिफिन लेकर पहुँचा, तो निधि ने उसे कोने में ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा, “अगली बार यहाँ आओ तो ये फटे पुराने कपड़े मत पहनना। और अगर कोई पूछे, तो कहना तुम घर के नौकर हो। एक दरोगा का पति बेरोजगार हो, यह मेरी प्रतिष्ठा के खिलाफ है।” राघव के पैर जैसे जमीन में धँस गए, लेकिन वह खामोश रहा...!!* *पूरे जिले में चर्चा थी कि नए एसपी (Superintendent of Police) साहब अचानक किसी भी थाने का औचक निरीक्षण कर सकते हैं। निधि और पूरा थाना तनाव में था। उस दिन भारी बारिश हो रही थी। राघव ने सोचा कि निधि सुबह से भूखी होगी, वह छाता लेकर और टिफिन थामे थाने पहुँचा...!!* *थाने के आंगन में जैसे ही राघव ने कदम रखा, निधि का पारा चढ़ गया। वह पहले से ही काम के बोझ से चिड़चिड़ी थी। उसने सबके सामने राघव का हाथ झटक दिया और चिल्लाकर बोली, “तू समझता क्यों नहीं? तेरी हैसियत क्या है जो बार-बार यहाँ चला आता है? तू मेरी वर्दी का अपमान है! निकल जा यहाँ से और फिर कभी अपनी ये मनहूस शक्ल मत दिखाना...!!* *हवलदार और सिपाही ठहाके लगाने लगे। राघव की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन उसने एक शब्द भी नहीं कहा। उसने बस चुपचाप टिफिन बेंच पर रखा और मुड़ने ही वाला था कि तभी सायरन की आवाज से पूरा थाना गूँज उठा...!!* *एसपी साहब का काफिला थाने के गेट पर आकर रुका।*निधि और सभी सिपाही एक कतार में खड़े होकर ‘सावधान’ की मुद्रा में आ गए। नई चमकती वर्दी में सजे एसपी साहब गाड़ी से उतरे। उनकी नजर अचानक बारिश में भीग रहे और टिफिन छोड़कर जा रहे राघव पर पड़ी...!!* *एसपी साहब के कदम ठिठक गए। उन्होंने अपनी कैप ठीक की और पूरी ताकत से राघव की ओर दौड़े। पूरे थाने के सामने, जिले के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी ने राघव के सामने रुककर एक शानदार सैल्यूट किया...!!* *निधि की आँखें फटी की फटी रह गईं। एसपी साहब ने राघव को कसकर गले लगा लिया। वे और कोई नहीं, बल्कि राघव के पुराने दोस्त अभिषेक थे।* *अभिषेक ने नम आँखों से सबकी ओर देखा और गरजते हुए बोले, “आज अगर मैं जिले का कप्तान हूँ, तो सिर्फ इस इंसान की वजह से। जब मेरे पास एक वक्त की रोटी के पैसे नहीं थे, तब इस ‘बेरोजगार’ कहे जाने वाले महान व्यक्ति ने अपना भविष्य दांव पर लगाकर मेरा भविष्य बनाया था। निधि जी, वर्दी पद देती है, लेकिन संस्कार और कृतज्ञता इंसान को महान बनाती है...!!* *निधि के हाथों से उसकी फाइल गिर गई। उसे अहसास हुआ कि उसने जिस ‘पत्थर’ को ठोकर मारी थी, वह असल में पारस था। उसी शाम राघव के घर एक लिफाफा पहुँचा।* *यूपीएससी के परिणाम घोषित हुए थे और राघव का चयन ‘प्रशासनिक सेवा’ में हो चुका था...!!* *राघव अब ‘साहब’ बन चुका था, लेकिन उसके स्वभाव में वही सादगी थी। निधि रोते हुए उसके पैरों में गिर गई। राघव ने उसे उठाया और शांति से कहा, “निधि, पद और पैसा आने-जाने वाली चीजें हैं। इंसान की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने से कमजोर के साथ कैसा व्यवहार करता है। मैंने तुम्हें माफ किया, लेकिन याद रखना—किसी की गरीबी उसका चरित्र तय नहीं करती...!!* *निष्कर्ष* *यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता का अहंकार अक्सर हमें अंधा कर देता है। हमें उन लोगों का हाथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए जिन्होंने हमें गिरते वक्त संभाला था। राघव ने साबित कर दिया कि खामोशी में इतिहास रचने की ताकत होती है...!!!!* *-जय शिव -* #किस्से-कहानी