ShareChat
click to see wallet page
search
गज़ल जिगर बहादुर शाह जफ़र #✒ शायरी
✒ शायरी - "गज़ल" करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रार बे क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी उस की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू कि तबीअत मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी ने किस के है तुझे चमकाया अक्स ए रुख़्सार ताब तुझ में मह-एन्कामिल कभी ऐसी तो न थी अब की जो राह ए ्मोहब्बत में उठाई तकलीफ़ सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो न थी पा॰ए॰कूबाँ कोई ज़िंदाँ में नया है मजनूँ आती आवाज़ ए ्सलासिल कभी ऐसी तो न थी निगह एन्यार को अब क्यूँ है तग़ाफ़ुल ऐ दिल वो तिरे हाल से ग़ाफ़िल कभी ऐसी तो न थी चश्म ए क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार I हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी ख़ू तिरी (बहादुर शाह जफ़र) Want . Motivational Videos App "गज़ल" करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रार बे क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी उस की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू कि तबीअत मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी ने किस के है तुझे चमकाया अक्स ए रुख़्सार ताब तुझ में मह-एन्कामिल कभी ऐसी तो न थी अब की जो राह ए ्मोहब्बत में उठाई तकलीफ़ सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो न थी पा॰ए॰कूबाँ कोई ज़िंदाँ में नया है मजनूँ आती आवाज़ ए ्सलासिल कभी ऐसी तो न थी निगह एन्यार को अब क्यूँ है तग़ाफ़ुल ऐ दिल वो तिरे हाल से ग़ाफ़िल कभी ऐसी तो न थी चश्म ए क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार I हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी ख़ू तिरी (बहादुर शाह जफ़र) Want . Motivational Videos App - ShareChat