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#जय श्री कृष्ण #भक्ति भावना
श्लोक :
नो किं समंजसमिहेत्यसमंजसं वा,
वेदेति गूढसरणीं कलयामि किंचित्।
एतेन सर्वफलनं भवतां न वा यद्,
गोविन्दपादभजनादितरं न जाने।।
अर्थात् :-
वेद में क्या विधि है क्या निषेध है—यह जान लेना अत्यन्त मुश्किल है,
जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा है—“शब्दब्रह्म सुदुर्बोधम्” इत्यादि “प्राण, इन्द्रिय तथा मनोमय होने के कारण, शब्दब्रह्मस्वरूप वेद, अत्यन्त दुर्बोध है” आदि ।
इसलिए मैं विधि-निषेध को छोड़कर वेदार्थ-सार का विचार करते हुए यही जान
पाया हूँ कि गोविन्द के श्रीचरणों का सेवन करने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी श्रेय नहीं है। समस्त श्रुतियों (वेदों) का तात्पर्य इसी विचार में सम्मिलित है।
श्लोक :
निन्दापरा बन्धुवरा बुधानां,
तत्वेन जानन्तु त एव धीराः।
जातं मलं दैववशाद्यतस्ते,
स्वेनापकर्षन्ति रसेन्द्रियेण॥
अर्थात् :-
जो वेदार्थ-सार का विचार नहीं करते और मात्र निन्दा-स्तुति में प्रवृत्त रहते हैं, धीर-पुरुष, निन्दकों की इस प्रवृत्ति से विचलित न होकर, तात्त्विक दृष्टि से उनको अपने श्रेष्ठ बन्धु की ही भाँति प्रेम करते हैं, क्योंकि कर्म-विपाक से यदि कभी कोई पाप-कर्म इस देह से बन जाता है तो उसे ये निन्दक लोग अपनी जिह्वा से धो डालते हैं, तथा धीरपुरुष इनके द्वारा आत्म-दर्शन करने में समर्थ होते हैं।
भो ! निन्दका ! भो ! बहुतर्कवादाः,
शृण्वन्त्वसूयारसिकास्तवेदम्।
शूरा भवन्तः स्वरणे वयं तु,
स्वे कृष्ण-भावे किमु कातराः स्मः॥
अर्थात् :-
हे निन्दको ! तार्किको ! और ईर्ष्यालु जनो ! आप सब भली भाँति
सुन लें कि जिस प्रकार आप लोग निन्दा, तर्क और असूया करने में शूर हैं, उसी
प्रकार हम भी अपने श्रीश्यामसुन्दर के भाव में दृढ़ हैं, कायर नहीं।
श्लोक :
मां दम्भिनो दम्भयुतं वदन्तु,
प्रमत्तचित्ता धनिनश्च मत्तम्।
प्रलोभिनः कर्मरताश्च लुब्धं,
यथाकथञ्चिद्गतिरस्तु कृष्णः॥
अर्थात् :-
दम्भी लोग मुझे भले ही दम्भी बतलावें, अस्थिर मन वाले धनी लोग मुझे भले ही मत्त कहें, अथवा कर्मरत लोभी जन भले ही मुझे लुब्धक समझें। इन सब लोक-धारणाओं से मुझे कुछ लेना-देना नहीं, मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि जिस किसी प्रकार से भी श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों।
श्लोक :
चेदर्थहानिर्मम नापरस्य हा किं विवादं जनता विधत्ते।
स्वधर्ममुद्दूष्य हरि भजतो, धर्मस्य हानिर्ज्वलतात् स धर्मः।।
अर्थात् :-
वर्ण और आश्रम-धर्मों को महत्त्व न देकर हरि-भजन करते हुए यदि धन-कुटुम्ब का विनाश होता है तो यह मेरे अपने सोचने की बात है, और लोगों का इस विषय में विवाद करना व्यर्थ है। कहा जाता है कि हरि-भजन से वर्णाश्रम-धर्मों की हानि होती है, तो मैं कहूंगा कि भजन ही सर्वोपरि धर्म है, भजन-विरोधी तथा-कथित ऐसे धर्म का भस्म हो जाना ही अच्छा है।
।। जय श्रीकृष्ण ।।
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