#जय श्री कृष्ण
श्रीकृष्ण–रुक्मिणी विवाह प्रसंग...
भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी का विवाह सनातन धर्म के सबसे पवित्र और दिव्य विवाहों में से एक माना जाता है। यह केवल एक राजकुमारी और राजकुमार का विवाह नहीं था, बल्कि यह परमात्मा और उनकी अनन्य भक्त के मिलन का अद्भुत प्रसंग था। इसका वर्णन मुख्यतः श्रीमद्भागवतम् में मिलता है।
रुक्मिणी जी का श्रीकृष्ण के प्रति अनुराग..
विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी रूप, गुण, शील और भक्ति में अद्वितीय थीं। उन्होंने महात्माओं और ऋषियों से श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों का श्रवण किया था। भगवान के सौन्दर्य, पराक्रम, करुणा और धर्मनिष्ठा का वर्णन सुनकर उनका हृदय श्रीकृष्ण में अनुरक्त हो गया।
श्रीमद्भागवत में रुक्मिणी जी कहती हैं—
श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥
हे भुवनसुन्दर! आपके गुणों का श्रवण करते ही मेरे समस्त दुःख दूर हो गए। आपका दिव्य स्वरूप समस्त नेत्रों का परम लाभ है। इसलिए मेरा चित्त लज्जा छोड़कर पूर्णतः आपमें समर्पित हो गया है।
रुक्मिणी जी का प्रेम-पत्र...
रुक्मिणी के भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से निश्चित कर दिया। यह सुनकर रुक्मिणी अत्यन्त व्याकुल हुईं। उन्होंने एक विश्वस्त ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को पत्र भेजा।
उस पत्र में उन्होंने लिखा—
तन्मे भवान् खलु वृतः पतिरङ्ग जायाम्
आत्मार्पितश्च भवतोऽत्र विभो विधेहि।
हे प्रभु! मैंने आपको ही अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है। अब आप आकर मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें।
उन्होंने आगे विनती की—
मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्य आरात्
गोमायुवन्मृगपतेर्बलिमम्बुजाक्ष॥
हे कमलनयन! जैसे सिंह का भाग सियार नहीं ले सकता, वैसे ही शिशुपाल मुझे प्राप्त न कर सके।
श्रीकृष्ण का विदर्भ आगमन::
रुक्मिणी जी का संदेश पाकर भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे तुरंत रथ पर आरूढ़ होकर विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर पहुँच गए। उधर रुक्मिणी जी विवाह के पूर्व कुलदेवी के मंदिर में पूजा करने गईं।
जब वे मंदिर से बाहर निकलीं, तभी भगवान श्रीकृष्ण ने सब राजाओं के सामने उन्हें अपने रथ पर बैठा लिया।
भागवत में वर्णन आता है—
तां राजकन्याम् रथमारुरुक्षतीं
जहार कृष्णो द्विषदां समीक्षताम्॥
शत्रु राजाओं के देखते-देखते भगवान श्रीकृष्ण राजकुमारी रुक्मिणी को अपने रथ पर बैठाकर ले गए।
राजाओं का युद्ध::
शिशुपाल, जरासन्ध और अन्य राजा क्रोधित होकर श्रीकृष्ण का पीछा करने लगे। तभी भगवान के बड़े भाई बलराम अपनी सेना सहित वहाँ पहुँच गए और सभी राजाओं को पराजित कर दिया।
रुक्मी ने विशेष रूप से श्रीकृष्ण का पीछा किया, परन्तु वह भी भगवान से पराजित हुआ। भगवान उसे दण्ड देना चाहते थे, किन्तु रुक्मिणी जी के निवेदन पर उन्होंने उसका जीवनदान दे दिया।
द्वारका में विवाह....
इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी जी को लेकर द्वारका पहुँचे। वहाँ वैदिक विधि-विधान से उनका भव्य विवाह सम्पन्न हुआ। सम्पूर्ण द्वारका नगरी उत्सव में मग्न हो गई।
श्रीमद्भागवत वर्णन करता है कि नगर को ध्वजाओं, पुष्पों और मंगल-कलशों से सजाया गया था तथा देवता भी इस दिव्य विवाह पर प्रसन्न थे।
रुक्मिणी विवाह केवल ऐतिहासिक घटना नहीं है। रुक्मिणी जी जीवात्मा की प्रतीक हैं और श्रीकृष्ण परमात्मा के स्वरूप हैं। जब जीव संसार के बन्धनों को छोड़कर पूर्ण समर्पण से भगवान को पुकारता है, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा और उद्धार के लिए आते हैं।
इस सत्य को भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
' भगवद्गीता '
जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योग और क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
रुक्मिणी विवाह हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में दृढ़ विश्वास, पूर्ण समर्पण और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम आवश्यक है। रुक्मिणी जी ने संसार के भय, विरोध और बाधाओं की परवाह किए बिना श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व माना, और भगवान स्वयं उन्हें अपनाने के लिए आए। यही भक्त और भगवान के प्रेम का सर्वोच्च आदर्श है।
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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