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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की उत्पत्ति...(दिन 358) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सा सलज्जा विहस्याह पुत्रं देहि सुरोत्तम। बलवन्तं महाकायं सर्वदर्पप्रभञ्जनम् ।। १३ ।। कुन्तीने लज्जित होकर मुसकराते हुए कहा- 'सुरश्रेष्ठ ! मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिये, जो महाबली और विशालकाय होनेके साथ ही सबके घमंडको चूर करनेवाला हो' ।। १३ ।। तस्माज्जज्ञे महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः । तमप्यतिबलं जातं वागुवाचाशरीरिणी ।। १४ ।। सर्वेषां बलिनां श्रेष्ठो जातोऽयमिति भारत । इदमत्यद्भुतं चासीज्जातमात्रे वृकोदरे ।। १५ ।। यदङ्कात् पतितो मातुः शिलां गात्रैर्व्यचूर्णयत् । (कुन्ती तु सह पुत्रेण यात्वा सुरुचिरं सरः । स्नात्वा तु सुतमादाय दशमेऽहनि यादवी ।। दैवतान्यर्चयिष्यन्ती निर्जगामाश्रमात् पृथा । शैलाभ्याशेन गच्छन्त्यास्तदा भरतसत्तम ।। निश्चक्राम महान् व्याघ्रो जिघांसन् गिरिगह्वरात् ।। तमापतन्तं शार्दूलं विकृष्याथ कुरूत्तमः । निर्बिभेद शरैः पाण्डुस्त्रिभिस्त्रिदशविक्रमः ।। नादेन महता तां तु पूरयन्तं गिरेर्गुहाम् ।) कुन्ती व्याघ्रभयोद्विग्ना सहसोत्पतिता किल ।। १६ ।। वायुदेवसे भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीमका जन्म हुआ। जनमेजय ! उस महाबली पुत्रको लक्ष्य करके आकाशवाणीने कहा- 'यह कुमार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ है।' भीमसेनके जन्म लेते ही एक अद्भुत घटना यह हुई कि अपनी माताकी गोदसे गिरनेपर उन्होंने अपने अंगोंसे एक पर्वतकी चट्टानको चूर-चूर कर दिया। बात यह थी कि यदुकुलनन्दिनी कुन्ती प्रसवके दसवें दिन पुत्रको गोदमें लिये उसके साथ एक सुन्दर सरोवरके निकट गयी और स्नान करके लौटकर देवताओंकी पूजा करनेके लिये कुटियासे बाहर निकली। भरतनन्दन ! वह पर्वतके समीप होकर जा रही थी कि इतनेमें ही उसको मार डालनेकी इच्छासे एक बहुत बड़ा व्याघ्र उस पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकल आया। देवताओंके समान पराक्रमी कुरुश्रेष्ठ पाण्डुने उस व्याघ्रको दौड़कर आते देख धनुष खींच लिया और तीन बाणोंसे मारकर उसे विदीर्ण कर दिया। उस समय वह अपनी विकट गर्जनासे पर्वतकी सारी गुफाको प्रतिध्वनित कर रहा था। कुन्ती बाघके भयसे सहसा उछल पडी ।। १४-१६ ।। नान्वबुध्यत संसुप्तमुत्सङ्गे स्वे वृकोदरम् । ततः स वज्रसंघातः कुमारो न्यपतद् गिरी ।। १७ ।। उस समय उसे इस बातका ध्यान नहीं रहा कि मेरी गोदमें भीमसेन सोया हुआ है। उतावलीमें वह वज्रके समान शरीरवाला कुमार पर्वतके शिखरपर गिर पड़ा ।। १७ ।। पतता तेन शतधा शिला गात्रैर्विचूर्णिता । तां शिलां चूर्णितां दृष्ट्वा पाण्डुर्विस्मयमागतः ।। १८ ।। गिरते समय उसने अपने अंगोंसे उस पर्वतकी शिलाको चूर्ण-विचूर्ण कर दिया। पत्थरकी चट्टानको चूर-चूर हुआ देख महाराज पाण्डु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ।। १८ ।। (मधे चन्द्रमसा युक्ते सिंहे चाभ्युदिते गुरौ। दिवामध्यगते सूर्ये तिथौ पुण्ये त्रयोदशे ।। मैत्रे मुहूर्ते सा कुन्ती सुषुवे भीममच्युतम् ।।) यस्मिन्नहनि भीमस्तु जज्ञे भरतसत्तम । दुर्योधनोऽपि तत्रैव प्रजज्ञे वसुधाधिप ।। १९ ।। जब चन्द्रमा मघा नक्षत्रपर विराजमान थे, बृहस्पति सिंह लग्नमें सुशोभित थे, सूर्यदेव दोपहरके समय आकाशके मध्यभागमें तप रहे थे, उस समय पुण्यमयी त्रयोदशी तिथिको मैत्र मुहूर्तमें कुन्तीदेवीने अविचल शक्तिवाले भीमसेनको जन्म दिया था। भरतश्रेष्ठ भूपाल ! जिस दिन भीमसेनका जन्म हुआ था, उसी दिन हस्तिनापुरमें दुर्योधनकी भी उत्पत्ति हुई ।। १९ ।। जाते वृकोदरे पाण्डुरिदं भूयोऽन्वचिन्तयत् । कथं नु मे वरः पुत्रो लोकश्रेष्ठो भवेदिति ।। २० ।। भीमसेन के जन्म लेने पर पाण्डु ने फिर इस प्रकार विचार किया कि मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मुझे सब लोगों से श्रेष्ठ उत्तम पुत्र प्राप्त हो ।। २० ।। दैवे पुरुषकारे च लोकोऽयं सम्प्रतिष्ठितः । तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते ।। २१ ।। यह संसार दैव तथा पुरुषार्थपर अवलम्बित है। इनमें दैव तभी सुलभ (सफल) होता है, जब समयपर उद्योग किया जाय ।। २१ ।। इन्द्रो हि राजा देवानां प्रधान इति नः श्रुतम् । अप्रमेयबलोत्साहो वीर्यवानमितद्युतिः ।। २२ ।। तं तोषयित्वा तपसा पुत्रं लप्स्ये महाबलम् । यं दास्यति स मे पुत्रं स वरीयान् भविष्यति ।। २३ ।। अमानुषान् मानुषांश्च संग्रामे स हनिष्यति । कर्मणा मनसा वाचा तस्मात् तप्स्ये महत् तपः ।। २४ ।। मैंने सुना है कि देवराज इन्द्र ही सब देवताओंमें प्रधान हैं, उनमें अथाह बल और उत्साह है। वे बड़े पराक्रमी एवं अपार तेजस्वी हैं। मैं तपस्याद्वारा उन्हींको संतुष्ट करके महाबली पुत्र प्राप्त करूँगा। वे मुझे जो पुत्र देंगे, वह निश्चय ही सबसे श्रेष्ठ होगा तथा संग्राममें अपना सामना करनेवाले मनुष्यों तथा मनुष्येतर प्राणियों (दैत्य-दानव आदि) को भी मारने में समर्थ होगा। अतः मैं मन, वाणी और क्रिया द्वारा बड़ी भारी तपस्या करूँगा ।। २२-२४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतमू श्रीमहाभारतमू - ShareChat