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#पूजन विधि
पूजन विधि - देवी बगलामुखी जयन्ती कथा वक्ष्यामि देवेशि बगलोत्पत्तिकारणम्। पुरा कृतयुगे देवि वातक्षोभ उपस्थिते ।l  3வ महात्रिपुरसुन्दरी II  चराडचरविनाशाय विष्णुश्चिन्तापरायणः | तपस्यया च सन्तुष्टा हरिद्राख्यं सरो दृष्ट्वा जलक्रीडापरायणा| महापीतहृदस्याउन्ते सौराष्ट्रे बगलाम्बिका II श्रीविद्यासम्भवं तेजो विजृम्भति इतस्ततः | चतुर्दशी भौमयुता मकारेण समन्विता ।l  कुल ऋृक्ष समायुक्ता वीररात्रिः प्रकीर्तिता। तस्यामेवाडर्ध्दरात्रौ वा पीतह्रदनिवासिना।।  ब्रह्मास्त्रविद्या सञ्जाता त्रैलोक्यस्तम्भनी परा। तत्तेजो विष्णुजं तेजो विद्याडनुविद्ययोर्गतम्।।  भगवान शिव देवी से कहते हैं, प्राचीन काल में, कृत युग (सत्य युग) के समय पृथ्वी पर अत्यन्त भीषण चक्रवात सम्पूर्ण पृथ्वी को नष्ट करने लगा विष्णु चिन्तित हो उठे कि यदि, इस भगवान शक्तिशाली चक्रवात को शान्त न किया गया तो यह सृष्टि का विनाश कर सकता है। सम्पूर्ण : fg  चक्रवात रुपी घनघोर संकट के निवारण हेतु भगवान कठोर तपस्या में लीन हो गये। विष्णु 7 द्वारा सहस्र वर्षों की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर देवी महात्रिपुरा ने उस भगवान देवी माँ की दृष्टि समीप के सरोवर पर पडी, भीषण चक्रवात का शमन कर दिया। तदोपरान्त जिसका नाम हरिद्रा सरोवर है। देवी माता उस सरोवर में जलक्रीड़ा करने लगीं| तदोपरान्त सौराष्ट्र  की मध्य रात्रि उस पीले सरोवर से एक नामक स्थान में, कृष्ण पक्ष  समीप के चतुर्दशी  तेजोमयी देवी प्रकट हुयीं। शास्त्रों के अनुसार वह मंगलवार का दिन था। तन्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों में इस महान रात्रि को 'वीररात्रि के नाम से वर्णित किया गया है। हालाँकि, बगलामुखी जयन्ती वैशाख शुक्ल अष्टमी को ही मनाई जाती है। देवी बगलामुखी आठवीं सिद्धविद्या हैं, जिन्हें बगलाम्बिका भी कहा जाता है। देवी बगलामुखी जयन्ती कथा वक्ष्यामि देवेशि बगलोत्पत्तिकारणम्। पुरा कृतयुगे देवि वातक्षोभ उपस्थिते ।l  3வ महात्रिपुरसुन्दरी II  चराडचरविनाशाय विष्णुश्चिन्तापरायणः | तपस्यया च सन्तुष्टा हरिद्राख्यं सरो दृष्ट्वा जलक्रीडापरायणा| महापीतहृदस्याउन्ते सौराष्ट्रे बगलाम्बिका II श्रीविद्यासम्भवं तेजो विजृम्भति इतस्ततः | चतुर्दशी भौमयुता मकारेण समन्विता ।l  कुल ऋृक्ष समायुक्ता वीररात्रिः प्रकीर्तिता। तस्यामेवाडर्ध्दरात्रौ वा पीतह्रदनिवासिना।।  ब्रह्मास्त्रविद्या सञ्जाता त्रैलोक्यस्तम्भनी परा। तत्तेजो विष्णुजं तेजो विद्याडनुविद्ययोर्गतम्।।  भगवान शिव देवी से कहते हैं, प्राचीन काल में, कृत युग (सत्य युग) के समय पृथ्वी पर अत्यन्त भीषण चक्रवात सम्पूर्ण पृथ्वी को नष्ट करने लगा विष्णु चिन्तित हो उठे कि यदि, इस भगवान शक्तिशाली चक्रवात को शान्त न किया गया तो यह सृष्टि का विनाश कर सकता है। सम्पूर्ण : fg  चक्रवात रुपी घनघोर संकट के निवारण हेतु भगवान कठोर तपस्या में लीन हो गये। विष्णु 7 द्वारा सहस्र वर्षों की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर देवी महात्रिपुरा ने उस भगवान देवी माँ की दृष्टि समीप के सरोवर पर पडी, भीषण चक्रवात का शमन कर दिया। तदोपरान्त जिसका नाम हरिद्रा सरोवर है। देवी माता उस सरोवर में जलक्रीड़ा करने लगीं| तदोपरान्त सौराष्ट्र  की मध्य रात्रि उस पीले सरोवर से एक नामक स्थान में, कृष्ण पक्ष  समीप के चतुर्दशी  तेजोमयी देवी प्रकट हुयीं। शास्त्रों के अनुसार वह मंगलवार का दिन था। तन्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों में इस महान रात्रि को 'वीररात्रि के नाम से वर्णित किया गया है। हालाँकि, बगलामुखी जयन्ती वैशाख शुक्ल अष्टमी को ही मनाई जाती है। देवी बगलामुखी आठवीं सिद्धविद्या हैं, जिन्हें बगलाम्बिका भी कहा जाता है। - ShareChat