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*आज आंग्ल "मित्रता दिवस" है* -
गोस्वामी जी ने श्री प्रभु के मुखार बिन्द से मित्र के लक्षणों का वर्णन किया है। यथा - *कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा ॥* ( ४/७/४ ) मित्र का धर्म है कि वह अपने मित्र को कुपंथ से हटाकर सन्मार्ग पर चलाये । जहाँ अवसर पाए मित्र के गुणों को प्रकाश में लाये ( उसे प्रोत्साहित करे ) किन्तु उसके अवगुणों को जग - जाहिर न करें, उन्हे छुपाये ताकि मित्र व्यर्थ उपहास का पात्र न होने पावे ।
*गुन प्रगटै अवगुन्हि दुरावा। -* यह अर्धाली आगे अक्षरशः सुग्रीवजी और विभीषण पर चरितार्थ हुई है । अयोध्या पहुच कर प्रभु ने वशिष्ठजी के समक्ष अपने सखाओ के गुणों का ही बखान किया है - *"ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे । भए समर सागर कह बेरे ॥" मम हित लागि जन्म इन्ह हेरे । भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ॥* ( ७/८ / ७ ) वस्तुतः प्रभु ने मित्र धर्म के कारण इनके अवगुणों को दुराया है। यथा - *जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली ।,* *फिरि सुकंठ सोई कीन्हि कुचाली* ॥ *सोई करतूती विभीषण केरी । सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी ॥*
*कुपंथ निवारि सुपंथ चलावा* - मानस में काम, क्रोध, मद, लोभादि वृत्तियों को अपनाना ही कुपंथ - नरक के मार्ग पर पग धरना कहा है *काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ* । और यह नितान्त सत्य है कि व्यक्ति कुमित्र या कुसंग के कारण ही कुपंथ पर पांव धरता है यथा - *कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिनके बचन बाघ हरि ब्याला(१/* ३७/७ )
*"देत लेत मन संक न धरई।*
*बल अनुमान सदा हित करई॥*
*बिपति काल कर सतगुन नेहा।*
*श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥"*
जो, किसी भी प्रकार के आदान प्रदान (विशेषतः आर्थिक, वैचारिक, नैतिक व धार्मिक) में शक, सुबह, शंक व संकोच न करता हो और क्षमता अनुसार सदैव सब प्रकार से जो हित साधन में ही लगा रहे, विपन्नावस्था तथा संकट के समय जिसका प्रेम सौ गुना बढ़ जाय वेद और संत मत है कि वही सच्चा मित्र है।
*मैत्री दिवस की कोटिश: शुभकामनाएं*💐💐💐
*जय जय सियाराम🙏🏻🙏🏻*