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#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - भाग्य और कर्म का द्वंद्व प्रारब्ध और पुरुषार्थ के बीच की खाई मुश्किल भाई पाटना बड़ा जन्म जन्मांतर से चलती आई लड़ाई एक जीता तो दूसरे ने हार पाई कहता प्रारब्ध मैं पहले से लिखा खाता जो लिखा ललाट पे वही सामने आता हँसकर बोला सुन ओ भाई पुरुषार्थ ; लकीरें हाथों की मैंने ही तो बनाई बैठ भरोसे भाग्य के जिसने वक्त गंवाया उसने जीवन में केवल अंधकार ही पाया पर जिसने पसीने से अपनी माटी सींची की मूरत उसने खुद ही खींची| सफलता है तो पुरुषार्थ है पानी प्रारब्ध अगर बीज दोनों के मिलने से ही बनती जिंदगानी एक बिना दूजा अधूरा यह सच जानो भाई सृष्टि ने दोनों में कभी न की जुदाई छोड़ो यह बहस कि किसने बाज़ी पाई दोनों के मेल में ही जीवन की भलाई कर्म करो ऐसा कि भाग्य ল্ী হ্বুব্ধ ' আৎ को गले लगाए प्रारब्ध भी हंसकर पुरुषार्थ ' $. C. भाग्य और कर्म का द्वंद्व प्रारब्ध और पुरुषार्थ के बीच की खाई मुश्किल भाई पाटना बड़ा जन्म जन्मांतर से चलती आई लड़ाई एक जीता तो दूसरे ने हार पाई कहता प्रारब्ध मैं पहले से लिखा खाता जो लिखा ललाट पे वही सामने आता हँसकर बोला सुन ओ भाई पुरुषार्थ ; लकीरें हाथों की मैंने ही तो बनाई बैठ भरोसे भाग्य के जिसने वक्त गंवाया उसने जीवन में केवल अंधकार ही पाया पर जिसने पसीने से अपनी माटी सींची की मूरत उसने खुद ही खींची| सफलता है तो पुरुषार्थ है पानी प्रारब्ध अगर बीज दोनों के मिलने से ही बनती जिंदगानी एक बिना दूजा अधूरा यह सच जानो भाई सृष्टि ने दोनों में कभी न की जुदाई छोड़ो यह बहस कि किसने बाज़ी पाई दोनों के मेल में ही जीवन की भलाई कर्म करो ऐसा कि भाग्य ল্ী হ্বুব্ধ ' আৎ को गले लगाए प्रारब्ध भी हंसकर पुरुषार्थ ' $. C. - ShareChat