Swati Chhipa
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Hindi Poem's & Quotes Writter
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - भीतर का समंदर लहरें उठती हैं, शोर मचाती हैं, किनारों से टकराकर लौट जाती हैं। दुनिया देखती है सिर्फ बाहरी हलचल , हैं। गहराइयां न जाने क्या छुपाती ` दबाए बैठे हैं हम सब एक समंदर , हैं कई ख्वाब इसके अंन्दर| gcTాId . पहने घूमते हैं जो रोज़़ ` मुखौटा , पिघलते हैं तन्हाई में बन मोम अक्सर। पर इन गहराइयों में एक ताकत भी है, हर तूफान से लडने की आदत भी हैं । महज़ रेत का किनारा न समझो, खुद को भीतर असीमित आसमान भी हैं। तुम्हारे स्वाती छीपा ~~~ ~~~ भीतर का समंदर लहरें उठती हैं, शोर मचाती हैं, किनारों से टकराकर लौट जाती हैं। दुनिया देखती है सिर्फ बाहरी हलचल , हैं। गहराइयां न जाने क्या छुपाती ` दबाए बैठे हैं हम सब एक समंदर , हैं कई ख्वाब इसके अंन्दर| gcTాId . पहने घूमते हैं जो रोज़़ ` मुखौटा , पिघलते हैं तन्हाई में बन मोम अक्सर। पर इन गहराइयों में एक ताकत भी है, हर तूफान से लडने की आदत भी हैं । महज़ रेत का किनारा न समझो, खुद को भीतर असीमित आसमान भी हैं। तुम्हारे स्वाती छीपा ~~~ ~~~ - ShareChat
#📲मेरा पहला पोस्ट😍 #मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
📲मेरा पहला पोस्ट😍 - ॰मेरा अगला वसंत कब आएगा..?" यह पतझड़ जो ठहर गया है भीतर , जाने कब विदा लेे पाएगा? हवाएँ हैं सूखी टहनियों से, पूछती " कि मेरा अगला वसंत कब आएगा? रोज़ एक पत्ता उम्मीद का गिरता है, रोज़ ख़ामोशी और गहरी हो जाती है, की हर एक कोशिश मेरी, मुस्कुराने  आँसुओं के सैलाब में खो जाती है। पर सुना है, रात जितनी घनी हो, सवेरा उतना ही नज़दीक होता है, जो बंज़र दिखता है आज यहाँ, उसी मिटटी में कोई बीज सोता है। जब मन के इस सूनेपन को, धैर्य का थोड़ा पानी मिल जाएगा , तपिश कम होगी, और सन्नाटा टूटेगा , तभी मेरा अगला वसंत मुस्कुराएगा | वह आएगा , जब मैं गुज़रे कल को छोड़़, आज की इस ख़ामोशी को अपनाऊँगी , में ढूँढना बंद करके , दूसरों  जब ತ್ರಷ अपने भीतर लौट आऊँगी | स्वाती छीपा ూ -- ॰मेरा अगला वसंत कब आएगा..?" यह पतझड़ जो ठहर गया है भीतर , जाने कब विदा लेे पाएगा? हवाएँ हैं सूखी टहनियों से, पूछती " कि मेरा अगला वसंत कब आएगा? रोज़ एक पत्ता उम्मीद का गिरता है, रोज़ ख़ामोशी और गहरी हो जाती है, की हर एक कोशिश मेरी, मुस्कुराने  आँसुओं के सैलाब में खो जाती है। पर सुना है, रात जितनी घनी हो, सवेरा उतना ही नज़दीक होता है, जो बंज़र दिखता है आज यहाँ, उसी मिटटी में कोई बीज सोता है। जब मन के इस सूनेपन को, धैर्य का थोड़ा पानी मिल जाएगा , तपिश कम होगी, और सन्नाटा टूटेगा , तभी मेरा अगला वसंत मुस्कुराएगा | वह आएगा , जब मैं गुज़रे कल को छोड़़, आज की इस ख़ामोशी को अपनाऊँगी , में ढूँढना बंद करके , दूसरों  जब ತ್ರಷ अपने भीतर लौट आऊँगी | स्वाती छीपा ూ -- - ShareChat