Swati Chhipa
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Hindi Poem's & Quotes Writter
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - जलता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे जलाया गया था मतलब की आग में जैसे-जैसे झुलसाया गया था बिखरता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे बिखराया गया था मन के शाख से पत्तों को जैसे-्जैसे झड़ाया गया था उलझता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उलझाया गया था बिन सवाल के प्रश्नों को जैसे जैसे जवाब बनाया गया था टूटता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे तुड़वाया गया था मेहनत से बने मकान को जैसे-जैसे हटवाया गया था चुभता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे चुभवाया गया था तोड़कर फूल जैसे-जैसे कांटों को बचाया गया था उड़ता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उड़ाया गया था खुदगर्जी के आसमान से जैसे-जैसे मुझे गिराया गया था फिर फिसलता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे फिसलाया गया था खड़ा हूं रब की मेहर से ऐसे जैसे-जैसे मुझे बचाया गया था q स्वाती छीपा जलता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे जलाया गया था मतलब की आग में जैसे-जैसे झुलसाया गया था बिखरता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे बिखराया गया था मन के शाख से पत्तों को जैसे-्जैसे झड़ाया गया था उलझता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उलझाया गया था बिन सवाल के प्रश्नों को जैसे जैसे जवाब बनाया गया था टूटता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे तुड़वाया गया था मेहनत से बने मकान को जैसे-जैसे हटवाया गया था चुभता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे चुभवाया गया था तोड़कर फूल जैसे-जैसे कांटों को बचाया गया था उड़ता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उड़ाया गया था खुदगर्जी के आसमान से जैसे-जैसे मुझे गिराया गया था फिर फिसलता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे फिसलाया गया था खड़ा हूं रब की मेहर से ऐसे जैसे-जैसे मुझे बचाया गया था q स्वाती छीपा - ShareChat
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - নঐ মাথ-থ নেল ডন # जो परिवर्तन आया है उसने मुझे खुद से मिलाया है " हां सच में खुद से मिलाया है " पहले कहां मैं अल्हड़ सी थी जागीर सी हूं अब मैं एक समझदार वफादार पहले मैं रोती थी छोटी छोटी बात पर हंसती हूं बड़ी बड़ी याद पर अब शोर नहीं खामोशी मुझे भाती है 3 दुनिया की भीड़ में खुद की आवाज आती है जो खो गया उसका अब मलाल नहीं जो पास है उस पर कोई सवाल नहीं किसी से चंद लम्हों की होती है नाराजगी अब मेरी मुस्कुराहट अब गहरे सब्र में सोती है मैंने छोड़ दिया है अब बेवजह का संवरना सीख लिया है मैंने अपनी रूह से निखरना मैं अब कोई पहेली नहीं एक साफ़ किताब हूँ अपने ही सवालों का मैं खुद ही जवाब हूँ वक्त ने सिखाया कैसे खुद का साथ निभाया जाता है तप कर ही मिट्टी को सोना बनाया जाता है स्वाती छीपा... নঐ মাথ-থ নেল ডন # जो परिवर्तन आया है उसने मुझे खुद से मिलाया है " हां सच में खुद से मिलाया है " पहले कहां मैं अल्हड़ सी थी जागीर सी हूं अब मैं एक समझदार वफादार पहले मैं रोती थी छोटी छोटी बात पर हंसती हूं बड़ी बड़ी याद पर अब शोर नहीं खामोशी मुझे भाती है 3 दुनिया की भीड़ में खुद की आवाज आती है जो खो गया उसका अब मलाल नहीं जो पास है उस पर कोई सवाल नहीं किसी से चंद लम्हों की होती है नाराजगी अब मेरी मुस्कुराहट अब गहरे सब्र में सोती है मैंने छोड़ दिया है अब बेवजह का संवरना सीख लिया है मैंने अपनी रूह से निखरना मैं अब कोई पहेली नहीं एक साफ़ किताब हूँ अपने ही सवालों का मैं खुद ही जवाब हूँ वक्त ने सिखाया कैसे खुद का साथ निभाया जाता है तप कर ही मिट्टी को सोना बनाया जाता है स्वाती छीपा... - ShareChat
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - दूसरों को देखन्देख क्यों जल रहा मैं हूं सबसे अच्छा अभिमान यह बोल रहा मैं ज्येष्ठ मैं सर्वश्रेष्ठ पूरे जग में देखो मुझसा ना कोई एक मेरे पग पग में फूल बीछे हे मेरी मेहनत के यह सब रंग खिले हैं मेरी हुनर की सब दाद देते हैं कोई नूर तो कोई मुझे कोहिनूर कहते हैं मुझे प्रतिस्पर्धा में हरा ना पाओगे कहता हूं शर्म से मुख कहीं दिखला ना पाओगे 74 ऐसा उसका अहंकार बोल रहा वह तो अब खुद को कहीं का राज दुलारा समझ रहा ऐठ में ऐसी वह चल रहा अपना सर्वस्व जेसे खुद ही निगल रहा मुझको तो वह घमंड का पुतला दिख रहा खुद को चाहे वह कहीं का राजा समझ रहा अब उसकी हार क्या जीत क्या वह तो अखंड अकेला उसका कोई मीत ना स्वाती छीपा...... दूसरों को देखन्देख क्यों जल रहा मैं हूं सबसे अच्छा अभिमान यह बोल रहा मैं ज्येष्ठ मैं सर्वश्रेष्ठ पूरे जग में देखो मुझसा ना कोई एक मेरे पग पग में फूल बीछे हे मेरी मेहनत के यह सब रंग खिले हैं मेरी हुनर की सब दाद देते हैं कोई नूर तो कोई मुझे कोहिनूर कहते हैं मुझे प्रतिस्पर्धा में हरा ना पाओगे कहता हूं शर्म से मुख कहीं दिखला ना पाओगे 74 ऐसा उसका अहंकार बोल रहा वह तो अब खुद को कहीं का राज दुलारा समझ रहा ऐठ में ऐसी वह चल रहा अपना सर्वस्व जेसे खुद ही निगल रहा मुझको तो वह घमंड का पुतला दिख रहा खुद को चाहे वह कहीं का राजा समझ रहा अब उसकी हार क्या जीत क्या वह तो अखंड अकेला उसका कोई मीत ना स्वाती छीपा...... - ShareChat
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - तपती रेत पर पांव पडे़े थे क्या मुझे अपने ही कर्मों के दंड मिले थे मैं तो गुजर रहा था रिश्तों के रेगिस्तान से जहां सभी प्रेम के प्यासे मिले थे बुझी आग जले थे क्या मेरे ही किस्से सुने थे में तो लिख रहा था अपने ही दर्द ए बयां जहां सभी गम में रो रहे थे छुपकर दफन हुए थे क्या ख्वाबों के अश्क बहे थे मैं तो बुन रहा ' था अपने ही अफ़साने जहां हकीकत में सब जी रहे थे उभरकर खत्म हुए थे क्या परख कर दूर हुए थे मैं तो लगा रहा था मलहम अपने ही घाव पर जहां सभी नमक छिड़क रहे थे स्वाती छीपा तपती रेत पर पांव पडे़े थे क्या मुझे अपने ही कर्मों के दंड मिले थे मैं तो गुजर रहा था रिश्तों के रेगिस्तान से जहां सभी प्रेम के प्यासे मिले थे बुझी आग जले थे क्या मेरे ही किस्से सुने थे में तो लिख रहा था अपने ही दर्द ए बयां जहां सभी गम में रो रहे थे छुपकर दफन हुए थे क्या ख्वाबों के अश्क बहे थे मैं तो बुन रहा ' था अपने ही अफ़साने जहां हकीकत में सब जी रहे थे उभरकर खत्म हुए थे क्या परख कर दूर हुए थे मैं तो लगा रहा था मलहम अपने ही घाव पर जहां सभी नमक छिड़क रहे थे स्वाती छीपा - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह #मेरी कविता
📚कविता-कहानी संग्रह - फूल अगर झड़ते मन के तो एक॰एक कली पर नाम किसका होता.. ? शायद प्रेम भाव समर्पण होता  सहिष्णुता होता सरलता सहजता ओस अगर गिरती मन की तो हर एक बूंद में अक्स किसका होता..? शायद त्याग तप और करुणा होता पवित्रता शुचिता और क्षमा होता महक अगर उठती मन की तो हवा के हर झोंके में संदेश किसका होता..? शायद सत्य निष्ठा और विश्वास होता अपनत्व ममता और उल्लास होता मिट्टी अगर होती मन की तो उसकी हर एक परत में संस्कार किसका होता.. ? शायद मानवता का अटूट धर्म होता में छुपा हुआ ही ईश्वर होता स्वयं स्वाती छीपा फूल अगर झड़ते मन के तो एक॰एक कली पर नाम किसका होता.. ? शायद प्रेम भाव समर्पण होता  सहिष्णुता होता सरलता सहजता ओस अगर गिरती मन की तो हर एक बूंद में अक्स किसका होता..? शायद त्याग तप और करुणा होता पवित्रता शुचिता और क्षमा होता महक अगर उठती मन की तो हवा के हर झोंके में संदेश किसका होता..? शायद सत्य निष्ठा और विश्वास होता अपनत्व ममता और उल्लास होता मिट्टी अगर होती मन की तो उसकी हर एक परत में संस्कार किसका होता.. ? शायद मानवता का अटूट धर्म होता में छुपा हुआ ही ईश्वर होता स्वयं स्वाती छीपा - ShareChat
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - फिजाओं में थोड़ी नमी थी शायद हममें भी थोड़ी कमी थी रूठे लोगों को मना ना सके क्या करें झूठ बोलने की आदत नहीं थी गुजरे वक्त की घड़ी थी शायद हमारी नहीं चली थी हम पर हावी रही जुबान सबकी क्या करें हमने तहजीब ना खराब की थी जिंदगी उलझी पड़ी थी डोर ना खुली थी सुलझी ' G लूटा कर देखा अपना सब कुछ क्या करें सबकी पाने की नुमाइश बड़ी थी किस्मत बंद पड़ी थी शायद अमावस की रैन जगी थी तभी तो साफ ना दिखा कुछ भी क्या करें अपनी ही चांदनी वहां छिपी थी स्वाती छीपा फिजाओं में थोड़ी नमी थी शायद हममें भी थोड़ी कमी थी रूठे लोगों को मना ना सके क्या करें झूठ बोलने की आदत नहीं थी गुजरे वक्त की घड़ी थी शायद हमारी नहीं चली थी हम पर हावी रही जुबान सबकी क्या करें हमने तहजीब ना खराब की थी जिंदगी उलझी पड़ी थी डोर ना खुली थी सुलझी ' G लूटा कर देखा अपना सब कुछ क्या करें सबकी पाने की नुमाइश बड़ी थी किस्मत बंद पड़ी थी शायद अमावस की रैन जगी थी तभी तो साफ ना दिखा कुछ भी क्या करें अपनी ही चांदनी वहां छिपी थी स्वाती छीपा - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह #मेरी कविता
📚कविता-कहानी संग्रह - टूटे पंखों से क्या उड़ान भरे चुभे कंटक से क्या फूल झडे सब अपनी अपनी चाल चले देख नफा हुंकार भरे. हलकी बहुत करें बात वजन का ना तोल दिखे सब जुबा से अपनी शहृद घुले देख रुतबा आदाब करें. जिद पर अपनी सब अड़े गलती ना कोई अब करें सब उजले तन के मन में मैल भरे देख आइना ना साफ दिखे... रुख़ का ना अंदाज लगे चमक दमक पर नज़र टिके सब उधार की कीमत भरे देख बढ़त तब अफसोस करें... कदम अपने सब चले संग ना साथी अब करें सब चिंता में चिता से जले देख हालत ना विचार करें.. दंभ में अपने सब फुले अहम के गीत अब गुने सब कमान अपनी ताक खखे देख निशाना ना अब सधे... स्वाती छीपा टूटे पंखों से क्या उड़ान भरे चुभे कंटक से क्या फूल झडे सब अपनी अपनी चाल चले देख नफा हुंकार भरे. हलकी बहुत करें बात वजन का ना तोल दिखे सब जुबा से अपनी शहृद घुले देख रुतबा आदाब करें. जिद पर अपनी सब अड़े गलती ना कोई अब करें सब उजले तन के मन में मैल भरे देख आइना ना साफ दिखे... रुख़ का ना अंदाज लगे चमक दमक पर नज़र टिके सब उधार की कीमत भरे देख बढ़त तब अफसोस करें... कदम अपने सब चले संग ना साथी अब करें सब चिंता में चिता से जले देख हालत ना विचार करें.. दंभ में अपने सब फुले अहम के गीत अब गुने सब कमान अपनी ताक खखे देख निशाना ना अब सधे... स्वाती छीपा - ShareChat
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - मतलब के यार से ना यारी भली जो आए बिन समझौते से उस दिलदार की मेहरबानी बढी फरेब के हथियार की ना आरी चली जो मिला खुदा के दरबार से उस इमान की मेरे लिए ख़ुद्दारी बढ़ी चाल शतरंज की ना भारी पढ़ी जो रखा बचा कर मात से उस मोहरे पर रब की इनायत बढ़ी सूखे पतझड़ मे ना डाली झडी जो आई रुत बहार से उस शाख पर एक एक पात बढी शूल कण्टक की ना आह भरी जो लगा मलहम प्रेम से उस दवा पर दुआ की असर बढी सूरत पर ना सीरत की मूरत गढ़ी जो परख ले एक नज़र से 'ঐথুসাৎ' उस कुन्दन की ' శ్గ ఇడే जोर आजमाइश ना खुशामद चली जो खडा सच बिन अवलम्बन से उस झूठ की इजलास मे ना पैरवी बढ़ी बस मेहनत की ना हुड़दंग मची जो मिला मुक्कदर मेरे काम से उस नाम की तो चहुंओर शान बढ़ी स्वाती छीपा मतलब के यार से ना यारी भली जो आए बिन समझौते से उस दिलदार की मेहरबानी बढी फरेब के हथियार की ना आरी चली जो मिला खुदा के दरबार से उस इमान की मेरे लिए ख़ुद्दारी बढ़ी चाल शतरंज की ना भारी पढ़ी जो रखा बचा कर मात से उस मोहरे पर रब की इनायत बढ़ी सूखे पतझड़ मे ना डाली झडी जो आई रुत बहार से उस शाख पर एक एक पात बढी शूल कण्टक की ना आह भरी जो लगा मलहम प्रेम से उस दवा पर दुआ की असर बढी सूरत पर ना सीरत की मूरत गढ़ी जो परख ले एक नज़र से 'ঐথুসাৎ' उस कुन्दन की ' శ్గ ఇడే जोर आजमाइश ना खुशामद चली जो खडा सच बिन अवलम्बन से उस झूठ की इजलास मे ना पैरवी बढ़ी बस मेहनत की ना हुड़दंग मची जो मिला मुक्कदर मेरे काम से उस नाम की तो चहुंओर शान बढ़ी स्वाती छीपा - ShareChat
#📚कविता-कहानी संग्रह #मेरी कविता
📚कविता-कहानी संग्रह - भीतर के बोल कुछ कहे अनकहे रह गए वक्त की गर्दिश में मन के अनसुने सवाल धह गए लगा था हमें जैसे भी मन की सह गए ೯R पर बेकसूर दर्द को कसूरवार मर्ज कह गए फैसले कुछ यूँ दर्ज हो गए जैसे बिन दाग के गर्द लग गए भी कुछ ओर हो गए बदलकरहम पीघले हृदय की आखें नम हो गए अब ले हवाए उस ओर चल गए अपना मांझी अपनी पतवार बन गए खाक निशानी बीती याद रह गए अपनी कहानी मशहूर ; gH कह गए स्वाती छीपा भीतर के बोल कुछ कहे अनकहे रह गए वक्त की गर्दिश में मन के अनसुने सवाल धह गए लगा था हमें जैसे भी मन की सह गए ೯R पर बेकसूर दर्द को कसूरवार मर्ज कह गए फैसले कुछ यूँ दर्ज हो गए जैसे बिन दाग के गर्द लग गए भी कुछ ओर हो गए बदलकरहम पीघले हृदय की आखें नम हो गए अब ले हवाए उस ओर चल गए अपना मांझी अपनी पतवार बन गए खाक निशानी बीती याद रह गए अपनी कहानी मशहूर ; gH कह गए स्वाती छीपा - ShareChat
#📲मेरा पहला पोस्ट😍 #मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
📲मेरा पहला पोस्ट😍 - जरा मैं सोचूँ कभी तो... अपनी ही शामें याद लगती है बीती पुरानी बात लगती है कोई कह दे तीखे शब्द हमें .. तो बात सीधा दिल पर लगती है विचलित मन तंग तन करती है उसूल हमारे पक्के है पर... देख रंग ना ढंग बदलती है मीठे बोल के भेद पकड़ती है अब वो बात कहां महफिल की... जिनकी रौशनी रौशन हवा करती है बिगड़े मर्ज की दवा बनती है उतरा है सारा नूर अब तो... फितूर ' यकीनन बातें लगती है जहाँ बेवजही जी हुजूरी करती है स्वाती छीपा जरा मैं सोचूँ कभी तो... अपनी ही शामें याद लगती है बीती पुरानी बात लगती है कोई कह दे तीखे शब्द हमें .. तो बात सीधा दिल पर लगती है विचलित मन तंग तन करती है उसूल हमारे पक्के है पर... देख रंग ना ढंग बदलती है मीठे बोल के भेद पकड़ती है अब वो बात कहां महफिल की... जिनकी रौशनी रौशन हवा करती है बिगड़े मर्ज की दवा बनती है उतरा है सारा नूर अब तो... फितूर ' यकीनन बातें लगती है जहाँ बेवजही जी हुजूरी करती है स्वाती छीपा - ShareChat