sn vyas
एक नगर में एक व्यक्ति रहता था #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #👉 लोगों के लिए सीख👈 जो अपने जीवन की समस्याओं और दुखों से बहुत परेशान था। उसने हर संभव प्रयास किए, लेकिन उसे शांति नहीं मिली। एक दिन उसके एक मित्र ने सलाह दी, "मित्र, तुम भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाओ। उनकी भक्ति में बड़ी शक्ति है, वे तुम्हारे सारे कष्ट हर लेंगे।"
मित्र की बात मानकर वह व्यक्ति बाजार से भगवान श्रीकृष्ण की एक सुंदर मूर्ति ले आया और उसे अपने घर के मंदिर में स्थापित कर दिया। वह रोज सुबह-शाम धूप-दीप जलाता और प्रार्थना करता। देखते-देखते कई साल बीत गए, लेकिन उसके जीवन की परिस्थितियां नहीं बदलीं। वह और ज्यादा निराश हो गया।
तभी उसे एक दूसरा मित्र मिला। उसने कहा, "अरे, कृष्ण तो कोमल स्वभाव के हैं। तू मां काली की पूजा कर! वे दुष्टों का संहार करती हैं और तुरंत फल देती हैं।"
निराश व्यक्ति ने सोचा कि शायद यही सही है। अगले ही दिन वह माँ काली की एक भव्य मूर्ति ले आया। उसने श्रीकृष्ण की मूर्ति को मंदिर से हटाकर ऊपर बनी एक टांड़ (छज्जे) पर रख दिया और मंदिर में माँ काली को प्रतिष्ठित कर दिया।
अब वह माँ काली की श्रद्धापूर्वक पूजा करने लगा। एक दिन जब उसने काली माँ के सामने कीमती और सुगंधित अगरबत्ती जलाई, तो अचानक उसके मन में एक विचार आया। उसने ऊपर टांड़ की ओर देखा जहाँ श्रीकृष्ण की मूर्ति धूल खा रही थी। उसने सोचा:
"अगर इस अगरबत्ती की खुशबू ऊपर गई, तो इसे श्रीकृष्ण भी सूंघ लेंगे। मैंने तो अब उनकी पूजा छोड़ दी है, तो फिर उन्हें यह सुगंध क्यों मिले? यह तो सिर्फ मेरी काली माँ के लिए है!"
यही सोचकर वह तुरंत एक कपड़ा लाया और एक स्टूल पर चढ़कर श्रीकृष्ण की मूर्ति की नाक और मुँह पर पट्टी बाँधने लगा ताकि सुगंध उन तक न पहुँच पाए। जैसे ही उसने मूर्ति के चेहरे पर कपड़ा स्पर्श किया, अचानक एक चमत्कार हुआ। साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया!
वह व्यक्ति हक्का-बक्का रह गया। उसकी आंखों में आंसू आ गए, पर वह उलझन में भी था। उसने कांपते हुए स्वर में पूछा, "हे प्रभु! मैं इतने वर्षों तक भाव से आपकी पूजा करता रहा, भोग लगाता रहा, तब तो आप कभी प्रकट नहीं हुए। आज जब मैं आपकी नाक बंद कर रहा था, तब आप अचानक कैसे आ गए?"
भगवान श्रीकृष्ण ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए बहुत ही मार्मिक उत्तर दिया:
"हे वत्स! आज तक तू मुझे पत्थर की एक 'मूर्ति' समझकर मेरी पूजा करता था। तू सोचता था कि मैं केवल काठ या मिट्टी का एक ढांचा हूँ जिसे तू भोग लगा रहा है। लेकिन आज, जब तूने मेरी नाक पर कपड़ा बाँधने की कोशिश की, तो तेरे मन में यह दृढ़ विश्वास (भाव) जाग गया कि इस मूर्ति में भी जान है, यह भी सूंघ सकती है!
आज पहली बार तूने मुझे पत्थर नहीं, साक्षात जीवित सत्ता माना। जिस क्षण तेरा विश्वास पत्थर से उठकर मुझ 'ईश्वर' पर टिका, उसी क्षण मुझे प्रकट होना पड़ा।"
यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान केवल मूर्तियों में नहीं, बल्कि भक्त के भाव और विश्वास में बसते हैं। जब तक हम ईश्वर को केवल एक कर्मकांड की तरह पूजते हैं, वे दूर रहते हैं। लेकिन जिस दिन हमारे भीतर यह अटूट विश्वास पैदा हो जाता है कि वे हमें देख रहे हैं और सुन रहे हैं, उसी दिन वे हमारे सहायक बन जाते हैं।
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।"