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#राधेश्याम द्वारका नगरी में एक दिन भगवान श्रीकृष्ण समुद्र तट के समीप स्थित एक शांत उपवन में विश्राम कर रहे थे। चारों ओर मंद-मंद बहती हवा, पक्षियों का मधुर कलरव और प्रकृति की सुंदरता वातावरण को दिव्य बना रही थी। उसी समय एक छोटी सी चींटी अपने साथ एक अनाज का दाना लिए वहां से गुजर रही थी। वह अत्यंत परिश्रमी और आत्मविश्वासी थी। जब उसकी दृष्टि भगवान श्रीकृष्ण पर पड़ी तो वह कुछ क्षणों के लिए ठिठक गई। उसने मन ही मन सोचा, "संपूर्ण सृष्टि जिनकी महिमा का गुणगान करती है, आज मैं उन्हें एक ऐसी बात बताऊंगी जिसे लोग अक्सर भूल जाते हैं।" वह धीरे-धीरे चलकर भगवान श्रीकृष्ण के समीप पहुंची और अपने छोटे से शरीर के साथ उनके सामने खड़ी हो गई। भगवान मुस्कुराते हुए उसे देखने लगे। उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, "हे नन्ही जीव, तुम कौन हो और मेरे पास किस उद्देश्य से आई हो?" चींटी ने विनम्रता से प्रणाम किया और बोली, "हे प्रभु, मैं एक साधारण चींटी हूं। मेरे पास न तो कोई शक्ति है, न वैभव और न ही कोई विशेष पहचान। किंतु मैं आपको एक सत्य बताना चाहती हूं।" श्रीकृष्ण ने उत्सुकता से पूछा, "वह सत्य क्या है?" चींटी ने अपने मुख में दबा हुआ अनाज का दाना नीचे रखा और बोली, "प्रभु, संसार में अधिकांश लोग बड़े और शक्तिशाली व्यक्तियों का सम्मान करते हैं, परंतु छोटे जीवों के महत्व को भूल जाते हैं। यह दाना मेरे लिए केवल भोजन नहीं है। यदि मैं इसे अपने परिवार तक पहुंचा दूं, तो यह कई जीवों की भूख मिटा सकता है। मेरे छोटे से प्रयास से अनेक जीवनों को सहारा मिल सकता है।" भगवान श्रीकृष्ण उसकी बात ध्यानपूर्वक सुनते रहे। चींटी ने आगे कहा, "लोग अक्सर आकार देखकर किसी का मूल्य तय करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि सृष्टि का प्रत्येक जीव अपने आप में महत्वपूर्ण है। यदि छोटे जीव न हों तो प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ जाएगा। एक छोटा बीज विशाल वृक्ष बन सकता है, एक छोटी बूंद सागर का हिस्सा बनती है और एक छोटी चींटी भी अपने कर्मों से बड़ा कार्य कर सकती है।" चींटी की बातें सुनकर भगवान श्रीकृष्ण के मुख पर प्रसन्नता झलक उठी। उन्होंने कहा, "हे नन्ही चींटी, तुम्हारी वाणी में गहन ज्ञान छिपा है। वास्तव में जो व्यक्ति दूसरों को उनके आकार, धन या शक्ति से आंकता है, वह जीवन के सबसे बड़े सत्य को नहीं समझ पाता। इस संसार में कोई भी जीव व्यर्थ नहीं है। प्रत्येक का अपना कर्तव्य और अपना महत्व है।" चींटी ने विनम्र स्वर में कहा, "प्रभु, मैं तो केवल अपना कर्तव्य निभाती हूं। मुझे यह ज्ञात है कि यदि मैं अपने हिस्से का कार्य ईमानदारी से करूं, तो मैं भी इस विशाल सृष्टि के लिए उपयोगी बन सकती हूं।" भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तो कर्मयोग है। जो बिना अहंकार के अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही वास्तव में महान होता है।" इतना कहकर भगवान ने उस छोटी चींटी को आशीर्वाद दिया। चींटी ने पुनः प्रणाम किया, अपना दाना उठाया और अपने मार्ग पर चल पड़ी। जाते-जाते वह पीछे मुड़कर भगवान को देखती रही और उसके हृदय में अपार आनंद था। वहीं भगवान श्रीकृष्ण भी उसकी निष्ठा और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न थे। उस दिन श्रीकृष्ण ने अपने शिष्यों से कहा, "जो व्यक्ति केवल बड़े कार्यों में महानता खोजता है, वह जीवन का आधा ज्ञान ही प्राप्त कर पाता है। सच्ची बुद्धिमत्ता हर छोटे कार्य, हर छोटे जीव और हर छोटे प्रयास के महत्व को समझने में है।" तभी से यह कथा सुनाई जाती है कि एक नन्ही सी चींटी ने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को यह स्मरण कराया कि महानता आकार में नहीं, बल्कि कर्म, निष्ठा और उद्देश्य में होती है। संसार में कोई भी इतना छोटा नहीं कि उसका महत्व न हो और कोई भी इतना बड़ा नहीं कि उसे दूसरों से सीखने की आवश्यकता न पड़े। यही इस कथा का सबसे बड़ा संदेश है। राधे राधे. जय श्रीकृष्ण. .
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