Naman News
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भरत तिवारी केस देखकर एक बात समझ आ गयी। बिहार की जितनी भी समस्या है, उन पर आप रील बनाइये, चिंता करिये, यूट्यूब वाले न्यूज बनाइये, मीम बनाइये, मेरी तरह पोस्ट लिखिए।
"लेकिन कभी जमीन पर उतर कर सरकार के भ्रष्ट और अहंकारी तंत्र से काम करवाने का प्रयास मत करिए।"
अगर आप गरम खून वाले हैं तब तो और बिल्कुल नहीं।
वरना आपका हाल भी भरत की तरह हो जाएगा। सोचिए, जिस जवनिया गाँव के बाढ़-कटान की समस्या के रील लाखों करोड़ों व्यूज बटोर गए। उसके लिए भरत जब सरकारी तंत्र से सवाल करने लगा, तो उसका क्या हाल हुआ। जो लोग जवनिया गाँव के घर मकान पानी में डूबते देख वर्चुअल आंसू बहाते थे, आज उसमें से बहुत लोग भरत को अपराधी, सनकी, पागल बोल रहे हैं।
मुझे वो सही में पागल ही लगा, वो हो गया पागलों की तरह। सिस्टम से गुहार लगाते, लड़ते हुए,उसका सिस्टम से ही विश्वास उठ गया।
बिहार में जमीन पर रह कर काम करने वाले बहुत कम लोग हैं, हम जैसे तो कई हैं जो भगोड़े हैं, समझ आ गया कि सिस्टम से लड़ते-लड़ते खाक हो जाएंगे और ढेला हिलाने में वर्षों लगेंगे। हम जैसे ही आज कई बिहारी नोएडा, गुड़गांव, दिल्ली, मुम्बई से दलील दे रहा है कि विदेश में पुलिस पर हथियार तानते ही गोली मार देगी। विदेश में तो और भी बहुत कुछ है, बिहार में, देश में है क्या??
भरत का कोई बड़ा आपराधिक इतिहास निकलता तो हम कार्रवाई सही ठहराते या आज हाफ एनकाउंटर के बाद जिंदा रहता तो हम भी कह देते की इसके साथ ठीक ही हुआ, अब इस पगले का इलाज करवाओ। क्योंकि उस पगले को नहीं पता था कि सिस्टम से हारकर हथियार नहीं उठाते। बल्कि भाषण देते हैं, धरना देते हैं, आमरण अनशन करते हैं, गांधी जी का बंदर बनते हैं।
सरकारी बाबू चाहे बाढ़ के पैसे गबन करता रहे, चाहे बाढ़ विस्थापितों का पैसा नेतवा खा जाए। लेकिन भरत पगले को उनके सामने हुजूर-हुजूर करते रहना चाहिए था। तब तो साहब लोगों के अहंकार को ठेस नहीं लगती। फिर एक दिन दया दिखाकर डीएम एसडीएम साहब उसके गाँव का काम करवा ही देते।
लेकिन पागल चल दिया था क्रांतिकारी बनने। एक बार जान ही लेता की बिहार में कितने आरटीआई कार्यकर्ता निपटा दिए गए हैं तो शायद आज जान बची रहती।
मरने के बाद भी चर्चा क्या है, की तिवारी था इसलिए ब्राह्मण लोग हल्ला कर रहा है। हम तो नहीं हैं ब्राह्मण, हम तो यादव भी नहीं हैं फिर भी रौशन आनंद और भरत दोनों के लिए लिखे। ये पासवान बुजुर्ग, भरत तिवारी के बारे में बताते हुए फुट फूटकर रोने लगे। तब कहाँ गया जात?
इतना सबके बाद जवनिया गाँव और उसके जैसे कई गांव की समस्या अगर मुख्यमंत्री Samrat Choudhary जी खुद जाकर देखें ले, उन्हें सच्चे-झूठे आश्वासन ही दे दें। तो भी कई और भरत बनने से बच जाएंगे।
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