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2122 2122 2122 2122
इक सिवा तेरे यहाँ हमको मिला कोई नहीं
जब रहे ना साथ तुम मेरे रहा कोई नहीं
हर तरफ फैली बेमानी ही बेमानी है यहाँ
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी सा हादिसा कोई नहीं
अब सभी करते मुहब्बत के दिखावे ही यहाँ
ज़िन्दगीमें दिलसे अब करता वफ़ा कोई नहीं
कौंन है इस खांकदा में अब मेरा तेरे सिवा
क्यों ये कहते हो कि तुम से वास्ता कोई नहीं
साय-ऐ-जुल्मत में खो के रह गया हूँ में यहाँ
हिज्र- ऐ -गम की बड़ी इससे सजा कोई नहीं
खार - ओ - पुरसंग की राहो में तन्हा हूँ चला
जो दिखा दे राहें मंजिल रास्ता कोई नहीं
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
10/5/2017
खांकदा - नश्वर संसार
साय-ऐ-जुल्मत - अंधेरो की परछाई
खार-ओ-पुरसंग - काँटों और पत्थर #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #📜मेरी कलम से✒️