#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेन के न आने से कुन्ती आदि की चिन्ता, नागलोक से भीमसेन का आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधन की कुचेष्टा...(दिन 381)
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तैश्चापि सम्परिष्वक्तः सह मात्रा नरर्षभैः । अन्योन्यगतसौहार्दाद् दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रुवन् ।। ३१ ।।
माता तथा उन नरश्रेष्ठ भाइयोंने भी उन्हें हृदयसे लगाया और एक-दूसरेके प्रति स्नेहाधिक्यके कारण सबने भीमके आगमनसे अपने सौभाग्यकी सराहना की -'अहोभाग्य ! अहोभाग्य!' कहा ।। ३१ ।।
ततस्तत् सर्वमाचष्ट दुर्योधनविचेष्टितम् । भ्रातॄणां भीमसेनश्च महाबलपराक्रमः ।। ३२ ।।
तदनन्तर महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न भीमसेनने दुर्योधनकी वे सारी कुचेष्टाएँ अपने भाइयोंको बतायीं ।। ३२ ।।
नागलोके च यद् वृत्तं गुणदोषमशेषतः । तच्च सर्वमशेषेण कथयामास पाण्डवः ।। ३३ ।।
और नागलोकमें जो गुण-दोषपूर्ण घटनाएँ घटी थीं, उन सबको भी पाण्डुनन्दन भीमने पूर्णरूपसे कह सुनाया ।। ३३ ।।
ततो युधिष्ठिरो राजा भीममाह वचोऽर्थवत् । तूष्णीं भव न ते जल्प्यमिदं कार्यं कथंचन ।। ३४ ।।
तब राजा युधिष्ठिरने भीमसेनसे मतलबकी बात कही- 'भैया भीम ! तुम सर्वथा चुप हो जाओ। तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया गया है, वह कहीं किसी प्रकार भी न कहना' ।। ३४ ।।
एवमुक्त्वा महाबाहुर्धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितः सर्वैरप्रमत्तोऽभवत् तदा ।। ३५ ।।
यों कहकर महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर अपने सब भाइयोंके साथ उस समयसे खूब सावधान रहने लगे ।। ३५ ।।
सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान् । धर्मात्मा विदुरस्तेषां पार्थानां प्रददौ मतिम् ।। ३६ ।।
दुर्योधनने भीमसेनके प्रिय सारथिको हाथसे गला घोंटकर मार डाला। उस समय भी धर्मात्मा विदुरने उन कुन्तीपुत्रोंको यही सलाह दी कि वे चुपचाप सब कुछ सहन कर लें ।। ३६ ।।
भोजने भीमसेनस्य पुनः प्राक्षेपयद् विषम् । कालकूटं नवं तीक्ष्णं सम्भृतं लोमहर्षणम् ।। ३७ ।।
धृतराष्ट्रकुमारने भीमसेनके भोजनमें पुनः नया, तीखा और सत्त्वके रूपमें परिणत रोंगटे खड़े कर देनेवाला कालकूट नामक विष डलवा दिया ।। ३७ ।।
वैश्यापुत्रस्तदाचष्ट पार्थानां हितकाम्यया । तच्चापि भुक्त्वाजरयदविकारं वृकोदरः ।। ३८ ।।
वैश्यापुत्र युयुत्सुने कुन्तीपुत्रोंके हितकी कामनासे यह बात उन्हें बता दी। परंतु भीमने उस विषको भी खाकर बिना किसी विकारके पचा लिया ।। ३८ ।।
विकारं न ह्यजनयत् सुतीक्ष्णमपि तद् विषम् । भीमसंहनने भीमे अजीर्यत वृकोदरे ।। ३९ ।।
यद्यपि वह विष बड़ा तेज था, तो भी उनके लिये कोई बिगाड़ न कर सका। भयंकर शरीरवाले भीमसेनके उदरमें वृक नामकी अग्नि थी; अतः वहाँ जाकर वह विष पच गया ।। ३९ ।।
एवं दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः।
अनेकैरभ्युपायैस्ताञ्जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ।। ४० ।।
इस प्रकार दुर्योधन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि अनेक उपायोंद्वारा पाण्डवोंको मार डालना चाहते थे ।। ४० ।।
पाण्डवाश्चापि तत् सर्व प्रत्यजानन्नमर्षिताः ।
उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः ।। ४१ ।।
पाण्डव भी यह सब जान लेते और क्रोधमें भर जाते थे, तो भी विदुरकी रायके अनुसार चलनेके कारण अपने अमर्षको प्रकट नहीं करते थे ।। ४१ ।।
कुमारान् क्रीडमानांस्तान् दृष्ट्वा राजातिदुर्मदान् । गुरुं शिक्षार्थमन्विष्य गौतमं तान् न्यवेदयत् ।। ४२ ।।
शरस्तम्बे समुद्भूतं वेदशास्त्रार्थपारगम् । अधिजग्मुश्च कुरवो धनुर्वेदं कृपात् तु ते ।। ४३ ।।
राजा धृतराष्ट्रने उन कुमारोंको खेल-कूदमें लगे रहनेसे अत्यन्त उद्दण्ड होते देख उन्हें शिक्षा देनेके लिये गौतम गोत्रीय कृपाचार्यकी खोज करायी, जो सरकंडेके समूहसे उत्पन्न हुए और विविध शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् थे। उन्हींको गुरु बनाकर कुरुकुलके उन सभी कुमारोंको उन्हें सौंप दिया गया; फिर वे कुरुवंशी बालक कृपाचार्यसे धनुर्वेदका अध्ययन करने लगे ।। ४२-४३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीमप्रत्यागमने अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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