काको कृष्णःपिको कृष्णःको भेदो पिककाकयो: ।
वसन्तकाले संप्राप्ते काको काकः पिको पिकः ॥
अर्थात 👉🏻 कोयल भी काले रङ्ग की होती है एवं कौवा भी काले रङ्ग का ही होता है तथापि दोनों में क्या भेद ( अन्तर ) है❔ वसन्त ऋतु के आगमन होते ही पता चल जाता है कि कोयल कोयल होती है तथा कौवा कौवा होता है । अर्थात् – मौन रहने से नही अपितु समय आने पर वाणी की मधुरता या कटुता से ही मनुष्य की वास्तविक पहचान होती है ।
{ यह एक अत्यंत सारगर्भित श्लोक है । बाहरी रंग-रूप से कोयल एवं कौवा एक जैसे ही लगते हैं , परन्तु वसंत का आगमन होते ही कोयल की मधुर कूक तथा कौवे की कर्कश ध्वनि से दोनों की स्पष्ठ/असली पहचान हो जाती है , ठीक वैसे ही मनुष्य की परीक्षा के समय एवं वाणी से होती है । मौन में तो सब समान लगते हैं , किन्तु जब वाणी फूटती है तो भाव , संस्कार औऱ हृदय का भेद स्पष्ट हो जाता है । }
श्री गणेश जी के इस मङ्गलमय स्वरूप के दर्शन से आप समस्त का दिन शुभ हो जाए 🪷🐀
लाल वस्त्र , मोदक , मूषक/चूहे सहित गणपति बप्पा – विघ्नहर्ता सबके विघ्न हरें औऱ वाणी में मधुरता प्रदान करें ।
ॐ गं गणपतये नमो नमः🙏🏻💐
आप समस्त का आज का दिवस शुभत्व सम्पन्न तथा कल्याणकारी हो ।
🌄🌄 संध्या #शुभ बुधवार #जय श्री गणेश वंदन 🌄🌄


