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#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - सर्वयोनिपु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः | तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता II हे अर्जुन ! नाना प्रकारको सव योनियोंमें जितनी अर्थात् शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैेँ, मूर्तियाँ प्रकृति तो उन सवकी गर्भ धारण करनेवाली माता है और मैँ चीजको स्थापन करनेवाला पिता हूँ II ४ I१ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः 1 निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् | हे अर्जुन ! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्माको प्रकृतिसे शरीरमें चाँधते हैं Il ५ Il तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् | सुखसङ्गेन बध्नाति   ज्ञानसङ्गेन चानघ ।। सत्त्वगुण तो তন   নীনী हे   निप्पाप ! गुणोंमें निर्मल होनेके कारण प्रकाश करनेवाला और विकाररहित , 46 सम्चन्धसे और ज्ञानके सम्चन्धसे सुखके अर्थात् उसके अभिमानसे चाँधता है Il ६ Il श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार सर्वयोनिपु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः | तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता II हे अर्जुन ! नाना प्रकारको सव योनियोंमें जितनी अर्थात् शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैेँ, मूर्तियाँ प्रकृति तो उन सवकी गर्भ धारण करनेवाली माता है और मैँ चीजको स्थापन करनेवाला पिता हूँ II ४ I१ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः 1 निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् | हे अर्जुन ! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्माको प्रकृतिसे शरीरमें चाँधते हैं Il ५ Il तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् | सुखसङ्गेन बध्नाति   ज्ञानसङ्गेन चानघ ।। सत्त्वगुण तो তন   নীনী हे   निप्पाप ! गुणोंमें निर्मल होनेके कारण प्रकाश करनेवाला और विकाररहित , 46 सम्चन्धसे और ज्ञानके सम्चन्धसे सुखके अर्थात् उसके अभिमानसे चाँधता है Il ६ Il श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat