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##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - श्रीमद भागवत गीता - अध्याय २, श्लोक ५५ श्री भगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्  মনীযনান| पार्थ आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।l (२.५५) 312f: श्रीकृष्ण कहते हैं भगवान हे पार्थ (अर्जुन)! जब मनुष्य अपने मन में उठने वाली सभी इच्छाओं (कामनाओं ) को त्याग देता है और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) कहलाता है। सीखः सच्ची शांति इच्छाओं के त्याग से आती है बाहरी सुख अस्थायी हैं, आंतरिक संतोष ही स्थायी है आत्मनिर्भर संतुष्टि ही स्थिर बुद्धि की पहचान है जीवन संदेशः को बाहुरी वस्तुओं और परिस्थितियों जब हम अपनी खुशी पर निर्भर करना छोड़ देते हैं तब हमें सच्चा सुख मिलता है। अपने भीतर संतोष पाना ही जीवन की बड़ी उपलब्धि है। श्रीहरि समूह श्रीमद भागवत गीता - अध्याय २, श्लोक ५५ श्री भगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्  মনীযনান| पार्थ आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।l (२.५५) 312f: श्रीकृष्ण कहते हैं भगवान हे पार्थ (अर्जुन)! जब मनुष्य अपने मन में उठने वाली सभी इच्छाओं (कामनाओं ) को त्याग देता है और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) कहलाता है। सीखः सच्ची शांति इच्छाओं के त्याग से आती है बाहरी सुख अस्थायी हैं, आंतरिक संतोष ही स्थायी है आत्मनिर्भर संतुष्टि ही स्थिर बुद्धि की पहचान है जीवन संदेशः को बाहुरी वस्तुओं और परिस्थितियों जब हम अपनी खुशी पर निर्भर करना छोड़ देते हैं तब हमें सच्चा सुख मिलता है। अपने भीतर संतोष पाना ही जीवन की बड़ी उपलब्धि है। श्रीहरि समूह - ShareChat