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वृषभ संक्रांति ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य देव एक मिथुन संक्रांति मिथुन संक्रांति को शास्त्रों में बहुत ही उत्तम माना जाता है। मिथुन संक्रांति के दिन सूरज देव की पूजा विधि विधान से की जाती है। हिंदू धर्म में इस त्योहार का बहुत महत्व माना जाता है। मिथुन संक्रांति के दिन पुण्य फल प्राप्त करने के लिए दान धर्म के कार्य किए जाते हैं। यह त्योहार प्रकृति में बदलाव का संकेत माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि इस दिन से वर्षा की ऋतु शुरू हो जाती है। जब सूरज देव वृषभ राशि से निकलकरमिथुन राशि में प्रवेश करते हैं, तो सभी नक्षत्रों में राशियों की दिशा बदल जाती है। सूरज जब कृतिका नक्षत्र से रोहिणी नक्षत्र में आते हैं, तो बारिश की संभावना बन जाती है। इसके साथ ही अच्छी खेती के लिए लोग भगवान से बारिश की मनोकामना करते हैं। मिथुन संक्रांति को रज पर्व भी कहा जाता है। रज पर्व के दिन भगवान सूरज देव को प्रसन्न करने के लिए व्रत किया जाता है।सूर्य जब मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो इस स्थिति को ज्योतिष में मिथुन संक्रांति कहते हैं. इसे रज संक्रांति भी कहा जाता हैं। हिंदू धर्म की मान्यता है कि प्रकृति ने ही महिलाओं को मासिक धर्म का वरदान दिया था. इसके कारण ही महिलाओं को मातृत्व का सुख प्राप्त होता है. मिथुन संक्रांति की कथा के अनुसार, जिस तरह से महिलाओं को मासिक धर्म होता है उसी प्रकार भूदेवी अर्थात धरती माता को भी शुरू के तीन दिन मासिक धर्म हुआ था. उसके बाद से ही धरती के विकास होने की मान्यता है. चौथे दिन भूदेवी जिसे सिल बट्टा कहाजाता है, को स्नान कराया जाता है. उसके बाद ही घर में सिल बट्टे का उपयोग किये जाने का प्रचलन है. हिंदू धर्म में सिल बट्टे को धरती का रूप माना जाता है. चौथे दिन सिल बट्टे को जल और दूध से स्नान कराने की परंपरा है. इसके बाद सिंदूर चंदन, फूल आदि से इसकी पूजा की जाती है। में एक राशि से दूसरी राशि में संचरण करते हैं। जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में गोचर करते हैं तो इसे संक्रांति कहते हैं। वहीं जब सूर्य देव अपनी उच्च राशि राशि मेष से निकलकर वृष राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे वृषभ संक्रांति कहते हैं। सूर्य के इस राशि परिवर्तन से मौसम में भी परिवर्तन देखने को मिलते हैं। शास्त्रों के अनुसार, वृषभ संक्रांति के दिन पूजा, जप, तप और दान करने से अमोघ फल की प्राप्ति होती है। इस महीने में प्यासे को पानी पिलाने अथवा घर के बाहर प्याऊ लगाने से व्यक्ति को यज्ञ कराने के समतुल्य पुण्यफल मिलता है। इस दिन "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का एक मनके जाप जरूर करना चाहिए। वृषभ संक्रांति के दौरान सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में आते हैं और इस नक्षत्र में 15 दिनों तक रहते हैं इसमें शुरूआती नौ दिनों तक प्रचंड गर्मी पड़ती है। इन नौ दिनों को 'नवतपा' कहा जाता है। यदि इन नौ दिनों में किसी भी प्रकार से वर्षा न हो और न ही ठंठी हवा चले तो यह माना जाता है कि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश हो सकती है। पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है कि बहुत समय पहले धरमदास नाम का एक वैश्य रहता था। वह बहुत ही दानी स्वभाव का था। एक दिन उसे अक्षय तृतीय के महत्व के बारे में पता चलता है कि शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर देवताओं और ब्राह्मण की पूजा करने से और दान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। तब से वह अक्षय तृतीय का व्रत विधि विधान से करने लग जाता है। व्रत के दिन सत्तू, चना, गुड, दही आदि सामग्रियों कादान करने लग जाता है। इसी बीच उसकी पत्नी ने उसे दान पुण्य करने से मना किया। परंतु वह नहीं माना और श्रद्धा भाव से उसने अक्षय तृतीया का व्रत पूरा किया। कुछ समय बाद धरमदास की मृत्यु हो जाती है। कहा जाता है कि कुछ दिन बाद उसका पुनर्जन्म राजा के रूप में द्वारका के कुछ माटी नगर में हुआ था। मान्यता है कि अक्षय तृतीया का व्रत करने से उसे फल स्वरूप राजयोग मिला था। तब से वृषभ संक्रांति के दिन व्रत की बहुत मान्यता है। #शुभ कामनाएँ 🙏
शुभ कामनाएँ 🙏 - Souomtitm 15TE 2026 @ वृषभ संक्रांति पर सूर्य की किरणें बिखेरें.. हमेशा आपके जीवन में शांति, समृद्धि और खुशी। वृषभ संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाये Souomtitm 15TE 2026 @ वृषभ संक्रांति पर सूर्य की किरणें बिखेरें.. हमेशा आपके जीवन में शांति, समृद्धि और खुशी। वृषभ संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाये - ShareChat